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NEP 2020 और स्कूलों की हकीकत: सुविधाओं के अभाव में शिक्षा से दूर होती छात्राएं

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 7 फरवरी 2026

नई शिक्षा नीति 2020 के वादों और हकीकत का बड़ा फासला

नई शिक्षा नीति नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 को लागू किए कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ी गंभीर समस्याएँ अब भी सामने आ रही हैं। नीति का लक्ष्य समग्र और समावेशी शिक्षा प्रणाली को सुनिश्चित करना था, जिसमें छात्राओं की स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा से जुड़ी मूलभूत ज़रूरतों का ध्यान रखा जाए। इसके बावजूद, स्कूल स्तर पर बुनियादी सुविधाओं का व्यापक अभाव अब भी कई हिस्सों में दिख रहा है, खासकर शौचालय, स्वच्छता और माहवारी (मेनस्ट्रुअल) से जुड़ी सुविधाओं के मामले में। इस कमी के कारण न केवल छात्राएं असुविधा महसूस कर रही हैं, बल्कि कई बार उनके स्कूल छोड़ देने तक की स्थिति तक पहुंच चुकी है।

आधिकारिक फैसले के बावजूद सुविधाओं की गिरावट

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने स्पष्ट किया है कि माहवारी स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाएँ छात्रों के “जीवन के अधिकार” का हिस्सा हैं, और यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (अधिकार को जीवन और गरिमा के तहत) के अंतर्गत सुरक्षित है। न्यायालय ने सभी स्कूलों — चाहे सरकारी हों या निजी — में मुफ़्त में बायोडिग्रेडेबल सेनिटरी पैड उपलब्ध कराने, अलग-थलग और कार्यशील शौचालय, निरंतर पानी की आपूर्ति और साबुन की व्यवस्था करने का आदेश दिया है। इसके अलावा न्यायालय ने मेनस्ट्रुअल स्वच्छता प्रबंधन (MHM) केंद्रों की स्थापना, सुरक्षित डिस्पोजल प्रणालियाँ, तथा जागरूकता कार्यक्रमों को अनिवार्य कर दिया है।

वास्तविकता: स्कूलों में सुविधाएँ अभी भी अपर्याप्त

इन अधिकारिक आदेशों और नीतिगत वादों के बावजूद, ज़मीन पर स्थितियाँ चिंताजनक बनी हुई हैं। कई विद्यालयों में आज भी छात्राओं के लिए अलग-अलग और कार्यशील शौचालय नहीं हैं, या यदि हैं भी तो उनमें पानी, साबुन और गोपनीयता की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इसी तरह सेनेटरी नैपकिन या स्वच्छता सामग्री का नि:शुल्क उपलब्ध होना भी कई जगहों पर पालन नहीं हो रहा है। इन सबके कारण छात्राओं को माहवारी के दौरान स्कूल से अनुपस्थित होना पड़ता है, या कई बार वे शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं, खासकर ग्रामीण और कम संसाधित इलाक़ों में।

शिक्षा से जुड़े वजूद को चुनौती: पढ़ाई और गरिमा दोनों पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि शौचालयों और स्वच्छता सुविधाओं का अभाव सीधे तौर पर छात्राओं की पढ़ाई और उनके आत्म-विश्वास को प्रभावित करता है। माहवारी जैसी प्राकृतिक स्थिति में भी सुरक्षित, निजी और स्वच्छ सुविधाओं के प्रावधान का न होना छात्राओं के लिए एक बड़ी बाधा बनता है, जिससे उनकी उपस्थिति एवं शैक्षणिक भागीदारी में गिरावट आती है। शिक्षा से जुड़ी यह समस्या केवल अव्यवस्था या बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं है, बल्कि यह लैंगिक समानता और शिक्षा में बराबरी के अधिकार का सवाल भी बन चुकी है।

नीति की दिशा और सुधार की ज़रूरतें

हालाँकि NEP 2020 में लैंगिक समावेशन और छात्राओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के कई प्रावधान शामिल हैं, वास्तविकता यह है कि नीति को ज़मीन पर प्रभावी रूप से लागू करना अभी भी बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों और शिक्षा कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल नीतिगत घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं — अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय प्रशासन के बीच जागरूकता, निगरानी, समय-समय पर निरीक्षण, तथा संसाधनों का सुनिश्चित वितरण भी आवश्यक है ताकि छात्राओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और बाधारहित अध्ययन वातावरण प्रदान किया जा सके।

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