अवधेश कुमार । नई दिल्ली 10 दिसंबर 2025
छत्तीसगढ़ के खैरागढ़- छुईखदान- गंडई इलाके में उस वक्त हलचल मच गई जब माओवादी संगठन का कुख्यात कमांडर और एक करोड़ रुपये का इनामी नक्सली रामधेर मज्जी अचानक हथियार डालकर सामने आ गया। मज्जी के आत्मसमर्पण ने न सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी सफलता दिलाई बल्कि माओवादी संगठन के भीतर हड़कंप मचा दिया है। लंबे समय से — हिडमा जैसे टॉप कमांडरों से भी अधिक क्रूर और रणनीतिक माना जाने वाला मज्जी — लगातार पुलिस ऑपरेशन, बढ़ती घेराबंदी और एनकाउंटर के डर से दबाव में था। अंततः उसने 12 साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया, जो माओवादी नेटवर्क के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
मज्जी की टीम में कई प्रशिक्षित महिला और पुरुष कैडर शामिल थे, जिनके पास AK-47, SLR और INSAS जैसे हथियार मिले। यह समर्पण इस बात का संकेत है कि MMC ज़ोन में माओवादी ढांचा तेजी से कमजोर पड़ रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि मज्जी का सरेंडर “लाल आतंक” की रीढ़ तोड़ने वाली सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है, क्योंकि वह न सिर्फ जमीनी ऑपरेशन का मास्टरमाइंड था, बल्कि तीन राज्यों में फैले नक्सली नेटवर्क को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी भी था।
सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, मज्जी बेहद खतरनाक, कठिन और गुप्त तरीके से काम करने वाला कमांडर था। उसने वर्षों तक जंगलों में अपनी पकड़ बनाई रखी, बड़े हमलों की योजना बनाई, और पुलिस पर कई बार घात लगाकर हमले करवाए। इसलिए उसका हथियार डालना माओवादी नेतृत्व के लिए मनोवैज्ञानिक चोट की तरह है। बताया जा रहा है कि उसके आत्मसमर्पण के बाद कई और छोटे कैडरों के मनोबल पर असर पड़ा है और वे भी पुलिस संपर्क में आने लगे हैं।
सरकार ने आत्मसमर्पण को “माओवादी उन्मूलन अभियान की ऐतिहासिक उपलब्धि” बताया है। पुनर्वास योजना के तहत मज्जी और उसके साथियों को कानूनी प्रक्रिया के बाद मुख्यधारा में लाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। प्रशासनिक अधिकारी मानते हैं कि यदि आने वाले समय में इस स्तर के और कमांडर हथियार डाल देते हैं, तो लाल गलियारा पूरी तरह खत्म होने की दिशा में कदम रख देगा।
रामधेर मज्जी का सरेंडर यह साफ संदेश देता है कि अब जंगल का आतंक ढह रहा है—और माओवादी संगठन में भगदड़ जैसी स्थिति बन चुकी है। यह आत्मसमर्पण सिर्फ एक नक्सली का नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के कमजोर पड़ने का संकेत है।




