एबीसी डेस्क 10 दिसंबर 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर पिछले एक दशक से बहस जारी है, लेकिन हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और विपक्ष के आरोपों के बाद यह मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है। सु्प्रिया श्रीनेत द्वारा उठाए गए सवालों और कांग्रेस व विपक्ष के अन्य नेताओं की ओर से दिए गए तर्कों के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विदेश नीति और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन को लेकर सरकार घिरती जा रही है। मोदी की अब तक की 94 विदेश यात्राएँ, जिनमें से लगभग 85% संसद सत्रों के दौरान हुईं, एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि क्या प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं में संसद और घरेलू लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ पीछे छूट रही हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब देश के अंदर गंभीर संकट खड़े होते हैं, तब भी प्रधानमंत्री विदेश दौरों और इवेंट-केंद्रित कूटनीति को तरजीह देते हैं।
संसद सत्रों के दौरान 11 बार विदेश यात्राएँ—जनादेश की अवहेलना या कूटनीति की मजबूरी?
2014 में सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार संसद सत्र के दौरान विदेश यात्राएँ कीं। अगस्त 2014 का मानसून सत्र हो या 2015 का शीतकालीन सत्र—कई बार महत्वपूर्ण गृह व संसदीय बहसों के बीच प्रधानमंत्री देश से बाहर रहे। मार्च 2015 के बजट सत्र के दौरान सेशेल्स, मॉरीशस और श्रीलंका की तीन देशों की यात्रा हो, या 2015 के शीतकालीन सत्र में फ्रांस और ब्रिटेन का दौरा—इन यात्राओं ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए। विपक्ष लगातार कहता रहा है कि जब संसद चल रही हो, तब प्रधानमंत्री का देश से बाहर होना लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ है। 2016 के बजट सत्र में बेल्जियम, अमेरिका और सऊदी अरब की यात्रा, 2018 के मानसून सत्र में अफ्रीकी देशों का दौरा, 2019 और 2020 के बजट सत्रों के दौरान जापान और अमेरिका का कार्यक्रम, और हाल के वर्षों में 2025 के बजट व मानसून सत्रों के दौरान फ्रांस, अमेरिका, मॉरीशस, ब्रिटेन और मालदीव की यात्राएँ—ये सभी दर्शाती हैं कि विदेश यात्रा का कैलेंडर संसद की तिथियों से बहुत कम प्रभावित होता है।
जब देश संकट में था, तब प्रधानमंत्री विदेश में—विपक्ष का तीखा आरोप
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जवाबदेही किसके प्रति है: भारतीय जनता के प्रति या विदेश नीति के इवेंट्स के प्रति? विपक्ष ने कई उदाहरण दिए हैं, जहाँ देश बड़े संकट से गुजर रहा था, लेकिन प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर थे। सबसे पहले पुलवामा का उदाहरण—14 फरवरी 2019 को 40 CRPF जवान शहीद हुए, पूरा देश सदमे में था, पर प्रधानमंत्री जिम कॉर्बेट में डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहे थे और कुछ ही दिनों बाद दक्षिण कोरिया के दौरे पर चले गए। कोविड महामारी का मामला और भी गंभीर था—जनवरी 2020 में भारत में पहला कोविड केस सामने आ चुका था, देश में विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री 22–24 फरवरी को सिडनी में ऑस्ट्रेलिया-भारत बिजनेस फोरम में शामिल थे। यह वह समय था जब महामारी की रोकथाम की तैयारी सबसे आवश्यक थी।
मणिपुर हिंसा एक और बड़ा उदाहरण है। मई 2023 से अप्रैल 2024 तक मणिपुर जलता रहा, हजारों लोग विस्थापित हुए, हालात गृहयुद्ध जैसे बने, पर प्रधानमंत्री अमेरिका, फ्रांस, UAE, ब्रिटेन और ग्रीस सहित 14 देशों की विदेश यात्राएँ करते रहे। वे मणिपुर जाने के लिए 17 महीने तक नहीं निकले—और जब गए भी, तो सिर्फ 2 घंटे के लिए। इसी अवधि में जब देंश में पहलवानों का आंदोलन उबल रहा था और बालासोर ट्रेन हादसे में 280 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी थी, तब प्रधानमंत्री अमेरिका दौरे पर थे, जिस पर 22 करोड़ से अधिक का खर्च हुआ—जो अब तक की सबसे महंगी एकल यात्रा मानी जाती है।
राजनीतिक संदेश: देश की जनता इंतज़ार करती रही, प्रधानमंत्री इवेंट्स में व्यस्त रहे
विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक शैली इवेंट-केंद्रित है—जहाँ घरेलू संकटों को प्राथमिकता न देकर विदेशी मंचों को अधिक अहमियत दी जाती है। पहलगाम आतंकी हमले के समय प्रधानमंत्री सऊदी अरब में थे; लौटने के बावजूद जम्मू-कश्मीर न जाकर बिहार में चुनावी कार्यक्रम करने चले गए। नवंबर 2025 में दिल्ली आतंकी हमले के दौरान वे भूटान के राजा का जन्मदिन मनाने पहुँचे—जो विपक्ष के अनुसार प्रधानमंत्री की “संवेदनशीलता और जवाबदेही में कमी” का बड़ा उदाहरण है। ये घटनाएँ एक व्यापक सवाल खड़ा करती हैं—क्या सरकार की विदेश नीति घरेलू नैतिक और लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों पर हावी हो रही है? और क्या प्रधानमंत्री का विदेश दौरा कार्यक्रम देश की आंतरिक स्थिति से पूरी तरह असंबद्ध है?
94 यात्राओं का बोझ और एक राष्ट्र का सवाल—प्रधानमंत्री किसके लिए प्राथमिकता तय कर रहे हैं?
सुप्रिया श्रीनेत, राहुल गांधी और कई विपक्षी नेताओं के उठाए गए सवाल आज केवल राजनीतिक आरोप नहीं रह गए—यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुके हैं। प्रधानमंत्री की 94 विदेश यात्राओं में से अधिकांश या तो संसद सत्र के दौरान हुईं या घरेलू संकटों के सबसे गंभीर समय पर। विदेश नीति निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा, संसद, राज्यों के संकट और देश की संवेदनशील स्थितियाँ उससे कम महत्वपूर्ण हैं? देश अब यह उत्तर मांग रहा है कि जब 140 करोड़ लोगों का नेतृत्व आपका कर्तव्य है, तब विदेश यात्राओं और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच प्राथमिकता संतुलित क्यों नहीं दिखाई देती? यह सिर्फ यात्राओं का डेटा नहीं—यह प्रधानमंत्री की जवाबदेही और देश की लोकतांत्रिक परंपराओं पर उठता एक गहरा सवाल है।




