पटना/समस्तीपुर, 24 अक्टूबर 2025
बिहार में चुनावी माहौल अपने चरम पर है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान अब लोकतंत्र के उस चरित्र पर सवाल खड़ा कर रहा है जिसे “आचरण संहिता” और “लोकतांत्रिक मर्यादा” कहा जाता है। समस्तीपुर और बेगूसराय में चुनावी रैलियों के दौरान प्रधानमंत्री ने खुले मंच से कहा कि “पैसा मिलता रहे, इसलिए एनडीए सरकार जरूरी है।” यह वाक्य सिर्फ एक चुनावी जुमला नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक मर्यादाओं को चुनौती देता हुआ सीधा रिश्वत देने का सार्वजनिक प्रस्ताव है।
‘पैसा मिलेगा तो वोट दो’ — यह है नया चुनावी नैरेटिव?
मोदी ने अपने भाषण में जनता से कहा कि अगर एनडीए सरकार नहीं बनेगी तो “पैसे मिलना बंद हो जाएगा।” उन्होंने यह संदेश एक योजनाबद्ध तरीके से दिया — यानी सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले लाभों को शर्तों से जोड़कर वोट के बदले में पेश किया। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि यह भाषण “रिश्वत का चुनावी रूपांतरण” है — जहां सरकारी लाभ को वोट के बदले में दिखाया जा रहा है।
चुनाव आयोग की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध
विपक्षी दलों और चुनाव पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि यही बयान किसी अन्य दल के नेता ने दिया होता, तो चुनाव आयोग रातोंरात नोटिस भेज देता। लेकिन जब प्रधानमंत्री खुद इस तरह की घोषणा करते हैं, तो आयोग मौन साध लेता है। यही वजह है कि जनता में अब यह धारणा मजबूत हो रही है कि “चुनाव आयोग अब वोट चोर बन गया है, निष्पक्ष संस्था नहीं रहा।”
‘जननायक’ की उपाधि पर भी कटाक्ष, लेकिन असली जनादेश पर हमला
मोदी ने अपने भाषण में विपक्ष पर यह आरोप लगाया कि वे “जननायक की उपाधि चुरा रहे हैं।” लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि असली चोरी तो जनता के अधिकारों की है — जहां वोट के बदले में योजनाओं और पैसों का लालच देकर लोकतंत्र की आत्मा को बेचा जा रहा है। मोदी का यह बयान न सिर्फ चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता के मूल सिद्धांतों का भी अपमान है।
जनता का सवाल: क्या अब लोकतंत्र सिर्फ ‘कैश बैक पॉलिटिक्स’ बन गया है?
गांवों और कस्बों में इस बयान के बाद चर्चाएं तेज हैं। लोग कह रहे हैं कि जब प्रधानमंत्री खुद “पैसे मिलने” को सरकार के बने रहने से जोड़ते हैं, तो फिर चुनावों की क्या जरूरत है? क्या अब लोकतंत्र का मतलब केवल “कैश-बैक पॉलिटिक्स” रह गया है — जहां वोट भी एक सौदा बन चुका है?
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
महागठबंधन के नेताओं ने इसे लोकतंत्र का मज़ाक बताया है। राजद और कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि मोदी का यह बयान गरीब जनता का अपमान है, क्योंकि यह उन्हें खरीदे जाने वाली वस्तु के रूप में दिखाता है। समाजवादी नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “प्रधानमंत्री खुद मान रहे हैं कि जनता को खरीदने का खेल चल रहा है — और चुनाव आयोग उसकी मूक सहमति दे रहा है।”
लोकतंत्र की आत्मा बनाम सत्ता की भूख
मोदी का यह बयान एक गहरी सच्चाई उजागर करता है — कि सत्ता की भूख अब मर्यादाओं से बड़ी हो चुकी है। “विकास”, “न्याय”, “रोजगार” जैसे मुद्दे गायब हैं, और उनकी जगह “पैसा मिलेगा तो वोट दो” जैसी सौदेबाज़ भाषा ने ले ली है।
भारत के लोकतंत्र के लिए यह पल आत्ममंथन का है। जब प्रधानमंत्री स्वयं वोट को आर्थिक लेनदेन में बदलने की भाषा बोलने लगें, और जब संवैधानिक संस्थाएँ चुप रहें — तब सवाल सिर्फ यह नहीं उठता कि अगली सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह भी कि क्या लोकतंत्र अब भी ज़िंदा है?




