महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 23 नवंबर 2025
भारतीय स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग को लेकर एक गंभीर और जटिल बहस उभर रही है, हालांकि वास्तविकता यह है कि आज भी देश के लगभग सभी स्कूलों—चाहे वे सरकारी हों या निजी—कक्षा के दौरान मोबाइल फोन रखना या इस्तेमाल करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यह प्रतिबंध वर्षों से बिना किसी व्यापक नीति, शोध या सार्वजनिक विमर्श के लागू है, और इसे शिक्षा जगत का एक बड़ा वर्ग सही भी मानता है। उनका कहना है कि भारत जैसे देश में जहां बच्चों में पढ़ने-लिखने की बुनियादी क्षमता, गणितीय कौशल और सामाजिक व्यवहार पहले से ही कमजोर हो रहे हैं, वहां मोबाइल फोन जैसी अत्यधिक आकर्षक और ध्यान भटकाने वाली तकनीक स्कूलों के भीतर प्रवेश कर गई तो स्थिति और खराब हो जाएगी। मोबाइल फोन आज मनोरंजन, गेमिंग, सोशल मीडिया, रील्स और वीडियो की दुनिया का सबसे आसान और तेज़ रास्ता बन चुका है, और बच्चा चाहे जितना भी अनुशासित हो, इस आकर्षण से बच पाना कठिन है। इसके अलावा भारत में स्क्रीन लत, साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री तक पहुंच, ऑनलाइन गेमिंग के खतरे, आर्थिक असमानता के कारण उत्पन्न सामाजिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के उदाहरण तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे माता-पिता और शिक्षकों की चिंता स्वाभाविक है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि मोबाइल फोन केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सीखने और ज्ञान तक पहुंच का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने यह कठोर अनुभव किया कि लाखों बच्चे केवल इसलिए शिक्षा से कट गए क्योंकि उनके पास मोबाइल फोन या इंटरनेट उपलब्ध नहीं था। उस समय अधिकांश भारतीय परिवारों के लिए मोबाइल फोन ही ऑनलाइन शिक्षा का एकमात्र साधन बना, और यही उपकरण उनके बच्चों को स्कूल से जुड़े रखने की कोशिश करता रहा। यह अनुभव बताता है कि मोबाइल फोन को पूरी तरह स्कूल शिक्षा से अलग कर देना, आधुनिक वास्तविकताओं और भविष्य की आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ करना है। दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, नौकरियां, सेवाएं, सीखने की पद्धतियां, यहां तक कि सामाजिक संपर्क भी तकनीक आधारित हो चुके हैं, ऐसे में यह उम्मीद करना कि बच्चे बिना डिजिटल उपकरणों के भविष्य के लिए तैयार हो जाएंगे, व्यवहारिक नहीं लगता। भारत की नई शिक्षा नीति NEP 2020 भी डिजिटल लर्निंग, तकनीकी कौशल और नवाचार आधारित शिक्षा पर जोर देती है, जिससे यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारतीय स्कूलों को नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण तरीके से मोबाइल उपयोग पर विचार करना चाहिए।
भारतीय संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश की शिक्षा प्रणाली सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यधिक विषम है। कुछ निजी स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड, टैबलेट आधारित शिक्षा, डिजिटल लैब और हाई-स्पीड इंटरनेट आम बात है, जबकि दूसरी ओर लाखों सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं—जैसे बिजली, डेस्क, टॉयलेट और शिक्षक—भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। यदि मोबाइल उपयोग की अनुमति दी जाती है, तो वह बच्चों के बीच आर्थिक विभाजन को और गहरा कर सकती है—जिनके पास महंगे स्मार्टफोन और तेज़ इंटरनेट होगा, वे डिजिटल शिक्षा का लाभ उठा सकेंगे, जबकि बाकी बच्चे पिछड़ जाएंगे। साथ ही भारत में साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन नैतिकता, डिजिटल जिम्मेदारी और अभिभावक जागरूकता का ढांचा अभी बहुत कमजोर है। अधिकांश अभिभावक और शिक्षक यह नहीं जानते कि बच्चे ऑनलाइन क्या देखते हैं, किसके संपर्क में आते हैं, कौन सी जानकारी साझा करते हैं, और किस तरह के जोखिमों का सामना कर सकते हैं। ऐसे में मोबाइल की अनुमति देना कई नए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक खतरे भी पैदा कर सकता है।
इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि मोबाइल को हमेशा के लिए प्रतिबंधित रख पाना संभव नहीं है और न ही यह समझदारी होगी। एक मध्य मार्ग की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है—जहां मोबाइल फोन पर अनियंत्रित छूट न मिले, लेकिन तकनीक को पूरी तरह दीवार के बाहर भी न रखा जाए। इसके लिए सुझाव दिए जाते हैं कि कक्षा के भीतर बच्चों के व्यक्तिगत मोबाइल फोन पर प्रतिबंध जारी रहे, लेकिन स्कूल नियंत्रित टैबलेट, साझा उपकरण या शिक्षक की निगरानी में मोबाइल का उपयोग शैक्षणिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। इसके साथ ही डिजिटल सुरक्षा, साइबर नैतिकता, तकनीकी जिम्मेदारी और ऑनलाइन व्यवहार को औपचारिक रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, जिससे बच्चे केवल तकनीक का उपयोग ना सीखें, बल्कि यह भी समझें कि इसका उपयोग सोचने, सहयोग करने और जिम्मेदार निर्णय लेने में कैसे किया जाए। इस मॉडल का उद्देश्य तकनीक को शिक्षा का सहयोगी बनाना है, न कि उसका विकल्प या बाधा।
आखिरकार यह बहस केवल मोबाइल फोन की अनुमति या प्रतिबंध की नहीं है, बल्कि उस दिशा की है जिसमें भारत अपनी अगली पीढ़ी को ले जाना चाहता है। यदि स्कूल बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखेंगे, तो वे डिजिटल भविष्य की आवश्यक कौशलों—जैसे रिसर्च क्षमता, ऑनलाइन जानकारी का विश्लेषण, डिजिटल संचार, नवाचार और तकनीकी दक्षता—से वंचित रह जाएंगे। वहीं यदि मोबाइल उपयोग बिना नियंत्रण के अनुमति दे दी गई, तो शिक्षा का अनुशासन, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। इसलिए भारत को एक संतुलित नीति की आवश्यकता है। प्रश्न अब यह नहीं होना चाहिए कि मोबाइल फोन स्कूलों में होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उन्हें कैसे, कब और किस उद्देश्य से शामिल किया जाए, ताकि भारत अपनी नई पीढ़ी को केवल जानकार ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार, संतुलित और तैयार डिजिटल नागरिक बना सके।





