राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
एक तरफ डॉ. मनमोहन सिंह थे, जो इस बात से बेचैन हो गए कि कहीं चुनाव आयोग को यह न लगे कि प्रधानमंत्री उसकी गरिमा का अपमान कर रहे हैं। दूसरी तरफ आज का दौर है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जुड़ा जो वाकया सुनाया है, वह भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान और सत्ता के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस के कानून मंत्री पर कार्रवाई, नेताओं ने आयोग को घेरा
कुरैशी ने बताया कि उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग ने कांग्रेस के चार मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई की थी। इनमें तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी शामिल थे। चुनाव आयोग की कार्रवाई के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आयोग की आलोचना शुरू कर दी।
कुरैशी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे के जरिए मनमोहन सिंह तक संदेश पहुंचाया कि कांग्रेस नेताओं की ओर से चुनाव आयोग के खिलाफ की जा रही बयानबाजी रोकी जानी चाहिए।
अगले ही दिन प्रधानमंत्री का फोन आया। मनमोहन सिंह ने कुरैशी से कहा कि वह उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं।
‘अगर आपको लगता है कि मैं ऐसा कर रहा हूं, तो मैं इस्तीफा दे दूंगा’
कुरैशी के मुताबिक, मुलाकात शुरू होते ही मनमोहन सिंह ने अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि यदि कुरैशी को लगता है कि प्रधानमंत्री चुनाव आयोग के अपमान को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वह पद छोड़ने तक को तैयार हैं।
कुरैशी ने बताया कि प्रधानमंत्री की यह प्रतिक्रिया देखकर वह खुद हिल गए। उन्हें मनमोहन सिंह को समझाने में लगभग 25 मिनट लगे कि उनकी शिकायत प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि उन नेताओं से थी जो चुनाव आयोग की आलोचना कर रहे थे।
यह केवल एक पुरानी राजनीतिक घटना नहीं है। यह उस रवैये की मिसाल है जिसमें प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोग की गरिमा को अपने राजनीतिक हित से अलग रखकर देखा। सत्ता में रहते हुए भी संवैधानिक संस्था के सम्मान को लेकर इतनी गंभीरता दिखाना लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
तब प्रधानमंत्री आयोग के सम्मान को लेकर चिंतित थे, आज आयोग की स्वतंत्रता पर बहस
आज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मौजूदा कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश इस समिति का हिस्सा नहीं हैं।
आलोचकों का कहना है कि ऐसी व्यवस्था में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है। उनका सवाल है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया कितनी संतुलित होनी चाहिए और जनता का भरोसा कैसे कायम रखा जाए।
मनमोहन सिंह के समय की इस घटना और आज के विवादों के बीच तुलना करते हुए मूल सवाल यही है कि सत्ता में बैठा व्यक्ति चुनाव आयोग को किस नजर से देखता है—एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में या अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से काम करने वाली संस्था के रूप में?
ज्ञानेश कुमार के सामने भी भरोसा कायम करने की चुनौती
चुनाव आयोग की निष्पक्षता का फैसला केवल उसके बारे में दिए गए बयानों से नहीं, बल्कि उसके कामकाज से होगा। सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए समान नियम, शिकायतों पर पारदर्शी कार्रवाई और फैसलों के स्पष्ट आधार ही आयोग की विश्वसनीयता मजबूत कर सकते हैं।
मनमोहन सिंह से जुड़ा कुरैशी का यह वाकया आज इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान का सवाल उठाता है। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्थायी होनी चाहिए।
एक प्रधानमंत्री चुनाव आयोग की गरिमा पर सवाल उठने की आशंका से बेचैन था। आज सवाल यह है कि चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर उठ रही चिंताओं का जवाब कैसे देगा। लोकतंत्र में संस्था की ताकत सत्ता से नजदीकी में नहीं, सत्ता से स्वतंत्र रहने में होती है।



