एबीसी नेशनल न्यूज | 4 फरवरी 2026
बुधवार को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐसा क्षण सामने आने जा रहा है, जिसे आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा। ममता बनर्जी, एक निर्वाचित और कार्यरत मुख्यमंत्री, स्वयं अदालत में खड़ी होकर देश के सबसे बड़े संवैधानिक मंच पर अपनी बात रखेंगी। यह कोई सामान्य राजनीतिक या कानूनी घटना नहीं है। यह सत्ता, साहस और संविधान के बीच सीधा संवाद है। Supreme Court of India की चौखट पर बुधवार को सिर्फ़ एक मुक़दमा नहीं सुना जाएगा, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को परखने वाला एक ऐतिहासिक दृश्य सामने होगा।
सत्तर वर्ष की उम्र पार कर चुकी एक महिला, जो सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी आम आदमी की धड़कन पहचानती है, अब क़ानून की भाषा में सवाल उठाएगी। वह SIR और Election Commission of India के सामने खड़ी होकर उन प्रक्रियाओं पर सवाल रखेगी, जिन पर देश के चुनावी ढांचे और जनता का भरोसा टिका है। यह टकराव किसी व्यक्ति बनाम संस्था का नहीं है, बल्कि उस विश्वास का है, जो हर नागरिक मतदान के दिन अपने साथ लेकर बूथ तक पहुँचता है।
यह लड़ाई केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है। यह उस विचार की रक्षा की लड़ाई है, जिसमें वोट की ताक़त को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है। ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार साबित किया है कि वह अकेली भी खड़ी हों, तो पीछे हटने वालों में नहीं हैं। सत्ता का दबाव हो, राजनीतिक हमले हों या संस्थागत चुनौतियाँ—वह सीधे अदालत में उतरकर यह संदेश देती हैं कि लोकतंत्र की रक्षा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस और साहसी क़दमों से होती है।
बुधवार का यह दृश्य “एब्सोल्यूट सिनेमा” इसलिए नहीं कहलाएगा कि कैमरे चमकेंगे या सुर्ख़ियाँ बनेंगी, बल्कि इसलिए कि इतिहास अपनी आँखों के सामने बनता हुआ दिखाई देगा। एक मुख्यमंत्री, एक वकील की तरह दलीलें रखेगी; एक महिला, मज़बूत इरादों के साथ खड़ी होगी; और एक नागरिक, संविधान की किताब को अपनी ढाल बनाकर सवाल पूछेगा। यह दृश्य याद दिलाएगा कि लोकतंत्र तब ज़िंदा रहता है, जब सत्ता खुद को जवाबदेह मानकर सामने आती है।
जो लोग इसे किसी एक दल बनाम दूसरे दल की लड़ाई मान रहे हैं, वे असली मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। यह उस लोकतांत्रिक और चुनावी आत्मा की रक्षा का क्षण है, जो भारत को भारत बनाती है। Bharatiya Janata Party से राजनीतिक टकराव अपनी जगह है, लेकिन अदालत में उठने वाला हर सवाल देश के हर मतदाता से जुड़ा है—उसके अधिकार, उसकी आवाज़ और उसके भविष्य से।
बुधवार को अदालत में जो कुछ भी घटेगा, वह सिर्फ़ क़ानूनी बहस भर नहीं होगा। वह एक साफ़ संदेश होगा—कि लोकतंत्र की रखवाली के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती, पद साहस को सीमित नहीं करता, और डर सच्चाई का रास्ता नहीं रोक पाता। इस संघर्ष में साथ खड़ा होना किसी एक नेता के समर्थन से कहीं बड़ा है; यह भारत के लोकतांत्रिक चरित्र और उसके संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़े होने का निर्णय है।




