राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | सतना/भोपाल | 23 अप्रैल 2026
मध्य प्रदेश के सतना जिले से आई एक दर्दनाक खबर ने एक बार फिर कुपोषण के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। यहां एक जुड़वां बच्ची की कुपोषण के कारण मौत हो गई, जबकि उसका भाई अभी भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है और उसे गंभीर हालत में रीवा रेफर किया गया है। डॉक्टरों के मुताबिक दोनों बच्चे गंभीर कुपोषण (सेवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन) की श्रेणी में थे और उनका वजन सामान्य से बहुत कम पाया गया था। इलाज के दौरान बच्ची ने दम तोड़ दिया, जिससे पूरे इलाके में शोक और आक्रोश का माहौल है।
इस घटना ने राज्य में चल रही पोषण योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, जिनमें करीब 1.36 लाख बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं। इतना ही नहीं, राज्य के 55 में से 45 जिले “रेड ज़ोन” में आते हैं, यानी वहां कुपोषण की स्थिति बेहद चिंताजनक है। 7.7 प्रतिशत की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जो यह संकेत देती है कि समस्या सिर्फ किसी एक इलाके तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक है।
इस बीच, एक और मामला चर्चा में है जिसने लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया है। हाल ही में एक बैठक के दौरान अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर काजू, बादाम और किशमिश पर हजारों रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जहां एक तरफ बच्चे पर्याप्त भोजन के अभाव में जान गंवा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर खर्च का यह तरीका क्या दर्शाता है। लोगों का कहना है कि अगर योजनाओं का पैसा सही तरीके से जमीनी स्तर तक पहुंचे, तो शायद ऐसी घटनाएं रोकी जा सकती हैं।
विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधा है और कहा है कि कुपोषण खत्म करने के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। उनका आरोप है कि सिस्टम में खामियां और भ्रष्टाचार के कारण असली जरूरतमंद तक मदद नहीं पहुंच पा रही। हालांकि, सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि कुपोषण के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और कई योजनाएं लागू हैं, जिनका असर धीरे-धीरे दिखाई देगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि कुपोषण सिर्फ भोजन की कमी नहीं, बल्कि जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ी बड़ी समस्या है। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है, जहां सही पोषण, समय पर इलाज और देखभाल की कमी बच्चों के जीवन पर भारी पड़ती है।
सतना की यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है—क्या हमारी व्यवस्थाएं उन बच्चों तक सही समय पर पहुंच पा रही हैं, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? फिलहाल, जवाब तलाशने की जरूरत है, क्योंकि हर देरी किसी और मासूम की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।




