अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 8 जनवरी 2026
यमन से जुड़ी एक अहम और बेहद संवेदनशील खबर सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति में हलचल मचा दी है। सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने दावा किया है कि सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) के प्रमुख और दक्षिणी यमन के अलगाववादी नेता ऐदुरूस अल-जुबैदी यमन से भागकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) चले गए हैं। सऊदी गठबंधन का कहना है कि अल-जुबैदी ने शांति वार्ता में शामिल होने के बजाय चुपचाप देश छोड़ने का रास्ता चुना, जिससे यमन में चल रही शांति कोशिशों को बड़ा झटका लगा है।
सऊदी गठबंधन के अनुसार, अल-जुबैदी यमन के अदन शहर से रात के अंधेरे में एक नाव के ज़रिये निकले। यह पूरी यात्रा बेहद गोपनीय तरीके से की गई। नाव उन्हें अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में स्थित सोमालिलैंड के बंदरगाह बेरबेरा तक ले गई। वहां से वह एक विमान में सवार हुए और फिर UAE पहुंच गए। गठबंधन का दावा है कि इस दौरान विमान की पहचान से जुड़े सिस्टम कुछ समय के लिए बंद रखे गए, ताकि उड़ान की निगरानी न हो सके। इस दावे ने पूरे घटनाक्रम को और भी रहस्यमय बना दिया है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब यमन के हालात पहले से ही बेहद नाज़ुक हैं। लंबे समय से युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट झेल रहा यमन अब एक नए राजनीतिक टकराव की ओर बढ़ता दिख रहा है। अल-जुबैदी उन नेताओं में गिने जाते हैं, जो दक्षिणी यमन को अलग देश बनाने की मांग करते रहे हैं। उनकी अगुवाई वाला STC संगठन लंबे समय से UAE समर्थित माना जाता है, जबकि सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा है। ऐसे में अल-जुबैदी का अचानक देश छोड़ना सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ते मतभेदों को साफ तौर पर उजागर करता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच हूती विरोधी नेतृत्व परिषद ने अल-जुबैदी को औपचारिक रूप से बाहर कर दिया है। यमन की सरकारी समाचार एजेंसी ‘सबा’ के मुताबिक, अल-जुबैदी पर देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि उसने सऊदी अरब में होने वाली एक अहम राजनीतिक और शांति वार्ता में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था। परिषद का कहना है कि जब यमन की एकता और भविष्य को लेकर अहम फैसले लिए जा रहे थे, तब अल-जुबैदी ने न केवल दूरी बनाई, बल्कि अपनी अलग राजनीतिक रणनीति पर काम शुरू कर दिया। इसी के बाद उसे नेतृत्व परिषद से निष्कासित करने का फैसला लिया गया।
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलकी ने इस पूरे मामले पर सख्त बयान दिया। उन्होंने बताया कि अल-जुबैदी को अन्य नेताओं के साथ सऊदी अरब के लिए उड़ान भरनी थी, लेकिन वह आखिरी समय पर विमान में नहीं चढ़ा। सऊदी अरब को खुफिया जानकारी मिली थी कि अल-जुबैदी ने बख्तरबंद वाहन, लड़ाकू गाड़ियां, भारी और हल्के हथियार तथा गोला-बारूद इकट्ठा कर लिया था। इसके बाद से ही माना जा रहा है कि वह किसी अज्ञात स्थान पर फरार हो गया, और फिलहाल उसके यमन में मौजूद होने की कोई ठोस पुष्टि नहीं है।
हालात उस वक्त और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए, जब सऊदी अरब ने यमन में 15 से अधिक ठिकानों पर जोरदार हवाई हमले किए। ये हमले मुख्य रूप से STC से जुड़े ठिकानों पर किए गए, जिसे UAE का करीबी संगठन माना जाता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि सऊदी अरब ने उन हथियारों की खेप को भी निशाना बनाया, जो कथित तौर पर अमीरात से भेजी गई थीं। इन हमलों के बाद यह साफ संकेत मिला कि सऊदी अरब अब अल-जुबैदी और उसके गुट के खिलाफ खुलकर सख्त रुख अपना चुका है।
बढ़ते दबाव और बदलते समीकरणों के बीच UAE ने भी यमन से अपनी सेना वापस बुला ली है। माना जा रहा है कि सऊदी अरब के दबाव और हूती-विरोधी खेमे के भीतर बढ़ते मतभेदों के चलते अमीरात को यह फैसला लेना पड़ा। इस कदम ने सऊदी अरब और UAE के रिश्तों में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया है। दोनों देश भले ही सार्वजनिक तौर पर हूती विद्रोहियों के खिलाफ एकजुट दिखते हों, लेकिन यमन के भविष्य, सत्ता संतुलन और प्रभाव क्षेत्र को लेकर उनके हित अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ यमन तक सीमित नहीं है। लाल सागर क्षेत्र, अरब प्रायद्वीप की राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है। यमन का संकट अब उस टकराव का खुला मंच बनता जा रहा है—जहां एक तरफ सऊदी अरब यमन की एकता और केंद्रीय सत्ता को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर UAE समर्थित गुट दक्षिणी यमन की अलग पहचान और नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ते रहे हैं।
इस पूरे राजनीतिक और सैन्य टकराव का सबसे बड़ा खामियाजा यमन की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। वर्षों से युद्ध, भूख, बीमारी और असुरक्षा झेल रहे लोग शांति की एक छोटी-सी उम्मीद पर टिके हुए हैं। लेकिन नेताओं और क्षेत्रीय ताकतों की इस सत्ता की लड़ाई ने हालात को और उलझा दिया है। अल-जुबैदी का देश छोड़कर भागना सिर्फ एक नेता के फरार होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गहरे संकट की तस्वीर है, जिसमें यमन आज भी फंसा हुआ है—जहां अमन और स्थिरता की राह सत्ता, हथियार और विदेशी हितों के बीच कहीं खोती जा रही है।




