राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 सितंबर 2026
मणिपुर में सरकार के भीतर ही बढ़ी बेचैनी
मणिपुर में हिंसा और समुदायों के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब राज्य सरकार के अंदर से ही गंभीर सवाल उठने लगे हैं। उपमुख्यमंत्री लोसी दिको ने कहा है कि नगा लोगों के अपहरण की घटनाओं के बाद उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन ने अपना फोन बंद कर लिया था। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब नगा संगठन किपगेन को पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। दिको ने साफ संकेत दिया कि अगर नगा समुदाय की चिंताओं का समाधान नहीं हुआ तो नगा विधायक बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को दिए जा रहे अपने समर्थन पर दोबारा विचार कर सकते हैं। यानी मणिपुर में मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि सरकार के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ता दिखाई दे रहा है।
नगा विधायक नाराज, बीजेपी के लिए बढ़ी चुनौती
लोसी दिको नगा पीपुल्स फ्रंट से जुड़े हैं और उनकी पार्टी फिलहाल बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ है। दूसरी ओर नेमचा किपगेन बीजेपी विधायक हैं और कुकी समुदाय से आती हैं। मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से हैं। ऐसे में सरकार के भीतर तीन प्रमुख समुदायों से जुड़े राजनीतिक समीकरण बेहद संवेदनशील हो जाते हैं। नगा नेताओं की नाराजगी अगर आगे बढ़ती है और समर्थन वापस लेने या उस पर पुनर्विचार की स्थिति बनती है तो सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। दिको का बयान इसी बढ़ते असंतोष का संकेत माना जा रहा है।
अपहरण के बाद फोन बंद होने का दावा क्यों गंभीर?
नगा लोगों के अपहरण जैसी घटनाओं के बाद एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा फोन बंद कर दिए जाने का दावा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि यह दिको का बयान है और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि जब राज्य में पहले से ही तनाव और हिंसा का माहौल हो, तब जिम्मेदार पद पर बैठे नेताओं के बीच संवाद कितना प्रभावी है। अगर सरकार के ही एक उपमुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से ऐसी स्थिति पर चिंता जताते हैं तो यह प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के बीच पैदा हो रहे तनाव की ओर भी इशारा करता है।
2027 का चुनाव भी फंस सकता है?
दिको ने सीधे चेतावनी दी है कि अगर पहाड़ी जिलों में हिंसा जारी रही तो 2027 में विधानसभा चुनाव कराना मुश्किल हो सकता है। यह बयान बेहद गंभीर है, क्योंकि चुनाव के लिए केवल मतदान की तारीख तय करना पर्याप्त नहीं होता। सभी इलाकों में लोगों की सुरक्षित आवाजाही, मतदान केंद्रों तक पहुंच, उम्मीदवारों का प्रचार और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था जरूरी होती है। अगर किसी बड़े हिस्से में लगातार हिंसा और तनाव बना रहता है तो चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती
मणिपुर सरकार को अब एक साथ दो मोर्चों पर जवाब देना होगा। एक तरफ नगा संगठनों की नाराजगी और उनकी मांगें हैं, तो दूसरी तरफ कुकी और मैतेई समुदायों के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव है। किसी एक पक्ष को लेकर उठाया गया कदम दूसरे पक्ष की नाराजगी बढ़ा सकता है। इसलिए सरकार के सामने सिर्फ राजनीतिक प्रबंधन नहीं, बल्कि ऐसा समाधान निकालने की चुनौती है जिस पर अलग-अलग समुदाय भरोसा कर सकें।
क्या बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है?
लोसी दिको का यह संकेत कि नगा विधायक सरकार को दिए समर्थन पर पुनर्विचार कर सकते हैं, बीजेपी के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। फिलहाल इसे सरकार गिरने की स्थिति के रूप में देखना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह साफ है कि सरकार के भीतर असंतोष का मुद्दा अब सार्वजनिक हो चुका है। अगर नगा संगठनों की मांगें, अपहरण की घटनाएं और पहाड़ी जिलों की हिंसा लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका असर सरकार की स्थिरता और अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी दोनों पर पड़ सकता है।
अब सवाल सिर्फ हिंसा रोकने का नहीं, भरोसा बचाने का है
मणिपुर की सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि सरकार लोगों के बीच भरोसा कैसे वापस लाती है। लगातार तनाव के बीच अगर समुदायों को लगता है कि उनकी शिकायतें नहीं सुनी जा रहीं तो राजनीतिक असंतोष और गहरा सकता है। लोसी दिको के बयान ने सरकार को साफ संकेत दे दिया है कि समय तेजी से निकल रहा है। 2027 का चुनाव सामने है और उससे पहले अगर मणिपुर में शांति, सुरक्षा और राजनीतिक भरोसा बहाल नहीं हुआ तो सरकार के सामने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ बड़ा राजनीतिक संकट भी खड़ा हो सकता है।




