दिल्ली के मेहरौली-बदरपुर रोड पर स्थित एक मदरसे के ध्वस्तीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। अदालत में मामला पहुंचते ही बहस ने गंभीर और संवेदनशील मोड़ ले लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि जिस संरचना को गिराया जा रहा है, उस पर वक्फ ट्रिब्यूनल में मामला लंबित है और अंतिम फैसले से पहले ही कार्रवाई शुरू कर दी गई, जो कानून के खिलाफ है। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर यह कोई ऐतिहासिक संरचना होती, तो अदालत इस पर विस्तार से सुनवाई करती। लेकिन प्रथम दृष्टया यह एक अवैध ढांचा है, जो झुग्गी क्षेत्र में बना हुआ है। CJI ने यह भी कहा कि अब तक इसे ‘मदरसा’ कहा जा रहा था, लेकिन अचानक ‘मस्जिद’ शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा, जो सवाल खड़े करता है।
मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि अतिरिक्त जमीन मदरसा चलाने के लिए दी गई थी, न कि किसी और उद्देश्य के लिए। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर मदरसा गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए है, तो फिर उसी प्रक्रिया को रोकने के लिए याचिकाएं क्यों दाखिल की जा रही हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अलग-अलग याचिकाकर्ता बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं और यह भी अदालत को भली-भांति पता है कि ये याचिकाएं किनके इशारे पर दाखिल हो रही हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ तौर पर यह दर्शाता दिखा कि शिक्षा और गरीब बच्चों के अधिकारों को लेकर अदालत गंभीर है, लेकिन कानून के नाम पर किसी भी तरह की गलत या भ्रामक दलील को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह मामला अब केवल एक ढांचे के ध्वस्तीकरण का नहीं, बल्कि कानून, नीयत और सामाजिक जिम्मेदारी के टकराव का रूप ले चुका है।




