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कश्मीर एकजुटता दिवस और पाकिस्तान की नीति का विरोधाभास

डॉ शुजात अली कादरी | राष्ट्रीय अध्यक्ष, मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन | 5 फरवरी 2026

नई दिल्ली। हर वर्ष 5 फरवरी को पाकिस्तान “कश्मीर एकजुटता दिवस” मनाता है। इस अवसर पर पूरे देश में सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने कश्मीर मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की जाती है। पाकिस्तान के नेता और विभिन्न संगठन इस दिन कश्मीर के लोगों के अधिकारों और आत्मनिर्णय की बात करते हुए समर्थन जताते हैं। यह दिन पाकिस्तान की राजनीतिक और कूटनीतिक गतिविधियों का अहम हिस्सा बन चुका है, जहां कश्मीर को एक मानवीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

लेकिन इस दिन से जुड़ी चर्चाओं के साथ एक विरोधाभास भी अक्सर सामने आता है। विश्लेषकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिन अधिकारों की बात पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर करता है, वही अधिकार उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में पूरी तरह दिखाई नहीं देते। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में रहने वाले लोगों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इन क्षेत्रों के नागरिकों को पूर्ण लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने और प्रशासनिक निर्णयों में सीमित भागीदारी जैसी समस्याएं बार-बार सामने आती रही हैं।

गिलगित-बाल्टिस्तान के संदर्भ में यह मुद्दा और स्पष्ट दिखाई देता है, जहां के लोगों को पाकिस्तान की राष्ट्रीय संसद के चुनावों में सीधे भाग लेने का अधिकार नहीं है। स्थानीय स्तर पर अधिकारों और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की मांग करने वाले समूहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई बार अपनी आवाज उठाई है। रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे मामलों में विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण, कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और निगरानी जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं, जिससे वहां लोकतांत्रिक माहौल को लेकर चिंता बढ़ती है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी राजनीतिक अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सरकारी नीति से अलग राय रखने वाले नेताओं या संगठनों पर कानूनी कार्रवाई और दबाव की शिकायतें समय-समय पर सामने आती हैं। स्थानीय पत्रकारों और नागरिक समाज के लोगों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन और स्वतंत्र विचार व्यक्त करने की सीमाएं तय कर दी जाती हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।

मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी इन क्षेत्रों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की स्थिति पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने प्रशासन वाले क्षेत्रों में लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों का कितना सम्मान करता है। कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की आवाज तभी अधिक प्रभावी मानी जाएगी, जब वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भी नागरिक अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।

“कश्मीर एकजुटता दिवस” सिर्फ एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसा अवसर भी है जो क्षेत्रीय राजनीति, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़े कई सवालों को सामने लाता है। यह दिन एक तरफ कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाने का प्रयास दिखाता है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रशासन वाले इलाकों में लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति पर चर्चा को भी जन्म देता है।

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