नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल का बयान आज सिर्फ़ एक टिप्पणी नहीं—देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के फेफड़ों में घुसता हुआ सीधा सवाल है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि आप हर मुद्दे को सैनिटाइज़ कर दें, सच्चाई छिपा दें, आंकड़ों को लॉक कर दें और गलत जानकारी फैलाएँ, तो आप भारत का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। और यही हो रहा है। यह आज के भारत की भयावह हकीकत है। सिब्बल ने जिस मंच की बात की—जहां जनता को सही जानकारी दी जा सके—ठीक वही मंच सत्ता के इशारे पर कमजोर किया जा रहा है, और लोकतंत्र को भ्रम के अंधेरे में ढकेलने का अभियान चल रहा है।
लेकिन असली सवाल अभी बाकी है—जब देश में वोट चोरी के आरोप खुलकर सामने आ रहे हैं, तब चुनाव आयोग डेटा क्यों नहीं सार्वजनिक कर रहा? सब जानते हैं कि लोकतंत्र की रीढ़ पारदर्शिता है। और जब उसी पारदर्शिता को दफ़ना दिया जाए, जब वोटिंग मशीनों के आँकड़े महीनों तक दबा दिए जाएं, जब गड़बड़ियों की जांच “फाइलों में सड़ने” भेज दी जाए—तो यह सिर्फ़ प्रशासनिक चूक नहीं होती, यह लोकतंत्र की हत्या होती है। आज देश के लोग पूछ रहे हैं: क्या चुनाव आयोग स्वयं को सत्ता का एक्सटेंशन बना चुका है?
इससे भी बड़ा संकट यह है कि जनता को असली मुद्दों से दूर रखा जा रहा है। देश को रिकॉर्ड बेरोज़गारी, गिरती अर्थव्यवस्था, शिक्षा–स्वास्थ्य के संकट और तकनीक में पिछड़ते कदमों पर ध्यान देना चाहिए था। लेकिन जनता को मंदिर–मस्जिद की नौटंकी और नकली राष्ट्रवाद के इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। समस्या यह नहीं कि लोग धर्म मानते हैं—समस्या यह है कि उन्हें धर्म के नाम पर डराया, भड़काया और बहकाया जा रहा है। इसे विकास का रास्ता नहीं, राष्ट्र की सामूहिक बुद्धि का दिवालियापन कहा जाएगा।
और हद तो तब हो जाती है जब कुछ लोग मुसलमानों को ‘देशभक्ति का सर्टिफिकेट’ बाँटने निकल पड़ते हैं। यह कैसा विचित्र दौर है? देशभक्ति अब मन की भावना नहीं, बल्कि राजनीतिक ठेकेदारों के ठप्पे का मोहताज बना दी गई है? जो लोग खुद मंचों पर नाटकबाज़ राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करते हैं, वही आज 20 करोड़ लोगों पर देशभक्ति का पैमाना सेट कर रहे हैं। यह न केवल अपमानजनक है बल्कि सीधे-सीधे समाज को तोड़ने वाली राजनीति है। देशभक्ति कभी धर्म–जाति में बँटी नहीं है—और न कभी बाँटी जा सकती है।
सच यह है कि यह पूरा नैरेटिव देश को विकास से दूर रखने, जनता की जागरूकता कमजोर करने, और सत्ता को मनमानी करने देने का एक संगठित प्रोजेक्ट है। जब जनता मुद्दों से भटक जाती है, जब उसे तकनीक, रोज़गार और शिक्षा की बजाय ‘हम–वो’ की लड़ाई में धकेल दिया जाता है, तब विकास मर जाता है।
आज सिब्बल ने जो कहा, वह सिर्फ़ राजनीतिक चेतावनी नहीं—यह एक राष्ट्रीय अलार्म है। देश को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र सवालों से चलता है, अंधभक्ति से नहीं। विकास डेटा पर खड़ा होता है, सबूतों पर टिकता है—न कि धार्मिक नारे और झूठे गौरवगान पर।
अब समय है कि देश यह पूछे—अगर सच्चाई छिपाई जाएगी, अगर डेटा रोका जाएगा, अगर वोट चोरी को कवर किया जाएगा—तो विकसित भारत कैसे बनेगा? यह सवाल सिर्फ़ विपक्ष का नहीं, हर नागरिक का है। क्योंकि अगर यह चुप्पी जारी रही, तो आज जो धोखा हो रहा है, कल वही हमारी आने वाली पीढ़ियों की बर्बादी में बदल जाएगा। अब बहस जरूरी नहीं—लड़ाई जरूरी है।




