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जस्टिस गोविंद माथुर की चिंता—‘भारत की शक्ल पाकिस्तान जैसी होने लगेगी’, संघ-BJP की राजनीति और लोकतंत्र पर मंडराते खतरे पर सवाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोविंद माथुर के नाम से साझा किए जा रहे बयान ने देश में लोकतंत्र, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति पर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। बयान में कहा गया है, “ये तानाशाही के पदचाप हैं… मैंने अपने 68 वर्ष के जीवन में कभी सोचा नहीं था कि भारत की शक्ल पाकिस्तान जैसी होने लगेगी।” यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब पुलिस की कार्रवाई, पत्रकारों की हिरासत, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पाबंदियों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। संघ और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की आलोचना करने वाले इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बता रहे हैं। हालांकि, इस बयान की मूल रिकॉर्डिंग या प्रामाणिक स्रोत की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे का सुप्रीम कोर्ट पर गंभीर आरोप

न्यायपालिका की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता को लेकर बहस के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे का एक बयान भी चर्चा में है। LiveLaw की 28 सितंबर 2026 की तारीख वाली तस्वीर में उनके नाम से यह कथन प्रकाशित है—“सुप्रीम कोर्ट में इतने भ्रष्ट जज रहे हैं, जिन्होंने न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है।” यह न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही और न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाला आरोप है। हालांकि, इसे दुष्यंत दवे का आरोप और विचार मानकर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि सभी न्यायाधीशों के बारे में स्थापित तथ्य के रूप में।

कुणाल कामरा की टिप्पणी—सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व पर बहस

दूसरी तस्वीर में स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के नाम से सुप्रीम कोर्ट को “ब्राह्मण-बनिया आर्बिट्रेशन सेंटर” कहने वाली टिप्पणी दिखाई गई है। यह कथन न्यायपालिका की सामाजिक संरचना, प्रतिनिधित्व और निष्पक्षता को लेकर उठने वाली आलोचनाओं से जुड़ा है। ऐसी टिप्पणी विवादास्पद है और इसे कामरा के नाम से प्रकाशित कथन के रूप में ही देखा जाना चाहिए। न्यायपालिका की सामाजिक संरचना पर गंभीर चर्चा के लिए न्यायाधीशों की नियुक्तियों, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत प्रक्रियाओं से जुड़े प्रमाणिक आंकड़ों की जरूरत होती है।

लोकतंत्र की कसौटी केवल चुनाव नहीं

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। उसकी मजबूती इस बात से भी तय होती है कि सरकार की आलोचना करने वालों को कितनी स्वतंत्रता मिलती है, पुलिस कानून के अनुसार काम करती है या नहीं, पत्रकार बिना अनुचित बाधा के रिपोर्टिंग कर पाते हैं या नहीं और संवैधानिक संस्थाएं कितनी स्वतंत्रता के साथ अपने दायित्व निभाती हैं।

संघ और भाजपा की राजनीतिक भूमिका पर आलोचकों के सवालों का मूल्यांकन भी इन्हीं कसौटियों पर किया जाना चाहिए। किसी राजनीतिक संगठन के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष निकालने के बजाय सरकारी फैसलों, संस्थागत कार्यप्रणाली और नागरिक अधिकारों पर उनके वास्तविक प्रभाव को देखना जरूरी है।

जंतर-मंतर और पत्रकारों की स्वतंत्रता का सवाल

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों, पत्रकारों की हिरासत और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े विवाद ने शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार पर बहस को तेज किया है। जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक संगठनों के लिए अपनी मांगें उठाने का प्रमुख स्थल रहा है।

प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से सीमित करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसी तरह, पत्रकारों के काम में बाधा डालने या उन्हें हिरासत में लेने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी कार्रवाई की वैधता का आकलन संबंधित आदेशों, परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल

चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, संस्थागत निष्पक्षता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों का उत्तर तथ्यों और निर्धारित प्रक्रियाओं के आधार पर दिया जाना चाहिए। आलोचना का जवाब दबाव या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही से दिया जाना चाहिए।

इमरजेंसी की याद और नागरिक अधिकारों की अहमियत

1975 में घोषित आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वह अध्याय है, जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगे, प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हुई और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आज के हालात की उस दौर से तुलना करते समय दोनों समय की घटनाओं, कानूनी परिस्थितियों और सरकारी फैसलों का तथ्यात्मक आकलन जरूरी है। फिर भी, इमरजेंसी का इतिहास यह याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की रक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

युवाओं, वकीलों और नागरिकों की भूमिका

जस्टिस गोविंद माथुर के नाम से साझा किए जा रहे संदेश में युवाओं, वकीलों और जागरूक नागरिकों से संविधान तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने की अपील की गई है। लोकतंत्र में असहमति, सवाल और आलोचना शासन को जवाबदेह बनाने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। नागरिकों के लिए भी जरूरी है कि वे किसी बयान या आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले उसके स्रोत और तथ्यों की जांच करें।

बड़ा सवाल यही है: क्या देश की संवैधानिक संस्थाओं, स्वतंत्र पत्रकारिता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर उठ रही चिंताओं का जवाब पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही के जरिए दिया जाएगा? लोकतंत्र में सरकार हो, विपक्ष हो, न्यायपालिका हो या कोई राजनीतिक संगठन—हर संस्था और व्यक्ति की भूमिका का मूल्यांकन संविधान, कानून और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

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