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BBC तक के पत्रकारों से बदसलूकी, प्रदर्शनकारियों पर हमले; श्याम मीरा सिंह ने सांप्रदायिक साजिश नाकाम की

दिल्ली में पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोकने और हिरासत में लेने की घटनाओं पर सवाल; टोपी पहनकर हिंदुओं को गालियां देने वाले व्यक्ति को वीडियो के जरिए पकड़वाया, हिंदू-मुस्लिम टकराव टला।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026

दिल्ली में चुनावी पारदर्शिता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और कथित वोट चोरी के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आई हैं। BBC के संवाददाताओं दिलनवाज़ पाशा और शाहनवाज़ अहमद को रिपोर्टिंग से रोका गया, NDTV के वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने पुलिस से सवाल पूछ रहे कम-से-कम छह पत्रकारों को हिरासत में लेकर वैन में धकेले जाने की जानकारी साझा की, जबकि पत्रकार श्याम मीरा सिंह के साथ भी मारपीट और दुर्व्यवहार हुआ। महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और मारपीट की घटनाएं सामने आई हैं। इसी बीच, श्याम मीरा सिंह ने वीडियो रिकॉर्ड कर उस व्यक्ति को पकड़वाया, जो गोल टोपी पहनकर हिंदुओं को गालियां दे रहा था और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहा था। सामने आए घटनाक्रम में समय रहते हस्तक्षेप से संभावित हिंदू-मुस्लिम टकराव टल गया। इन घटनाओं ने दिल्ली पुलिस की भूमिका, पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

BBC के पत्रकारों को भी रिपोर्टिंग से रोका गया

BBC ने बताया कि 11 अक्टूबर को उसके संवाददाता दिलनवाज़ पाशा और शाहनवाज़ अहमद दोपहर करीब एक बजे दिल्ली के पालिका बाजार इलाके में प्रदर्शन की कवरेज कर रहे थे। इसी दौरान कुछ लोग वहां पहुंचे, आक्रामक व्यवहार किया और दोनों पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने से रोकने लगे। BBC के अनुसार, उन लोगों के हाथों में माइक और फोन भी थे। BBC ने यह भी बताया कि दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से पत्रकारों को रिपोर्टिंग में बाधा पहुंचाए जाने की खबरें मिल रही थीं और कुछ स्थानों पर पत्रकारों को रोकने वाले लोग प्रदर्शनकारियों पर हमले भी कर रहे थे।

पत्रकारों का काम घटनास्थल पर मौजूद रहकर जानकारी जुटाना, सवाल पूछना और जनता तक तथ्य पहुंचाना है। किसी खबर से असहमति होने पर उसका जवाब दिया जा सकता है, लेकिन पत्रकारों को धमकाकर या उनका काम रोककर घटनाओं को जनता तक पहुंचने से रोकना प्रेस की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता है। BBC के संवाददाताओं के साथ हुई घटना ने सवाल खड़ा किया है कि राजधानी में पत्रकार कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के साथ अपना काम कर पा रहे हैं।

पुलिस से सवाल पूछने वाले पत्रकारों को हिरासत में लिया गया

NDTV के वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने X पर वीडियो साझा कर बताया कि एक पत्रकार को हिरासत में लिए जाने के बारे में पुलिस से सवाल पूछ रहे कम-से-कम छह अन्य पत्रकारों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लेकर वैन में धकेल दिया। जैन के मुताबिक, जब उन्होंने पुलिस से सवाल किया तो एक अधिकारी ने कहा, “यह कुछ पूछने का सही समय नहीं है।”

सवाल यह है कि पुलिस से जवाब मांगने का सही समय आखिर कौन तय करेगा? यदि किसी पत्रकार को कानून के तहत हिरासत में लिया गया था, तो पुलिस को कार्रवाई का आधार स्पष्ट करना चाहिए। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल पूछना पत्रकारिता का बुनियादी हिस्सा है। पत्रकारों को हिरासत में लेने और रिपोर्टिंग रोकने की घटनाएं प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती हैं।

श्याम मीरा सिंह के साथ मारपीट, महिला पत्रकारों से भी बदसलूकी

पत्रकार श्याम मीरा सिंह के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की घटना भी सामने आई है। इसके अलावा महिला पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की, मारपीट और कपड़े फाड़े जाने की घटनाओं की शिकायतें सामने आई हैं। इन घटनाओं को लेकर पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।

महिला पत्रकारों को भीड़ के बीच रिपोर्टिंग करने, सवाल पूछने और घटनाओं को कैमरे में दर्ज करने का पूरा अधिकार है। उनके साथ मारपीट या अभद्रता किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। पुलिस को ऐसी घटनाओं की जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

वीडियो से सामने आया सांप्रदायिक तनाव भड़काने का मामला

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान श्याम मीरा सिंह ने एक ऐसे व्यक्ति का वीडियो रिकॉर्ड किया, जो गोल टोपी पहनकर हिंदुओं को गालियां दे रहा था। वीडियो सामने आने के बाद उस व्यक्ति को पकड़ लिया गया। इस घटनाक्रम ने प्रदर्शन के बीच सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

श्याम मीरा सिंह ने मौके पर व्यक्ति की हरकत को रिकॉर्ड किया और पुलिस को सूचना दी। इस कार्रवाई से समय रहते हस्तक्षेप का रास्ता खुला और संभावित हिंदू-मुस्लिम टकराव को टालने में मदद मिली। व्यक्ति की पहचान हिंदू के रूप में सामने आने की जानकारी भी इस घटनाक्रम के साथ जुड़ी है। धार्मिक पहचान का भ्रम पैदा करके दूसरे समुदाय के खिलाफ नफरत भड़काने की कोशिश सामाजिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

दिल्ली में प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया, SIR और कथित वोट चोरी से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। ऐसे समय में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाली किसी भी हरकत से मूल मुद्दे पीछे छूट सकते हैं और आम लोगों के बीच टकराव बढ़ सकता है। इस घटना ने यह भी दिखाया कि मौके पर मौजूद पत्रकारों की सतर्कता और वीडियो रिकॉर्डिंग किसी गंभीर स्थिति को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

साक्षी जोशी ने पहले ही उठाए थे सवाल

पत्रकार साक्षी जोशी ने कहा कि उन्होंने 9 अक्टूबर की रात जंतर-मंतर पर दक्षिणपंथी समूह से जुड़े लोगों को बेखौफ घूमते हुए दिखाया था। उनके मुताबिक, अगले दिन सामने आई घटनाओं ने उनकी पहले की रिपोर्ट को सही साबित किया। उन्होंने पूरे घटनाक्रम में साठगांठ होने का आरोप भी लगाया।

इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका की जांच जरूरी है। पुलिस को बताना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ टकराव के दौरान उसने क्या कार्रवाई की, किन लोगों को हिरासत में लिया गया और कथित हमलावरों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए। पुलिस और किसी संगठन के बीच मिलीभगत का निष्कर्ष ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है, लेकिन सामने आई शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों पर हमले

11 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के इंदिरा चौक इलाके में दक्षिणपंथी समूह से जुड़े कुछ लोगों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, कई लोगों ने खुद को ‘हनुमान सेना दिल्ली’ का सदस्य बताया। समूह के कुछ सदस्यों पर प्रदर्शनकारियों को गालियां देने, थप्पड़ मारने और उनका पीछा करने के आरोप लगे। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में एक युवती को धक्का देकर गिराते और एक अन्य प्रदर्शनकारी पर हमला करते हुए देखा गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, घटनास्थल से करीब 50 मीटर दूर पुलिसकर्मी तैनात थे। जब एक अधिकारी से पूछा गया कि प्रदर्शनकारियों के साथ हो रही घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जा रहा है, तो उन्होंने कहा, “हम देख रहे हैं कि क्या किया जा सकता है।”

कुछ प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस और दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े लोग उनके पीछे पड़े थे। पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि कथित हमलों के संबंध में क्या शिकायतें दर्ज हुईं और आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

राहुल गांधी ने अमित शाह और दिल्ली पुलिस की आलोचना की

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने घटनाक्रम को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली पुलिस की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस गुंडागर्दी पर उतर आई है और RSS-BJP से जुड़े लोगों को महिलाओं तथा युवाओं के खिलाफ हिंसा करने की छूट दी जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार जितना दमन करेगी, युवाओं और छात्रों का गुस्सा उतना ही बढ़ेगा।

राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को कांग्रेस, INDIA गठबंधन और युवाओं के दोबारा सड़कों पर उतरने की घोषणा भी की। विपक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित वोट चोरी से जुड़े सवालों को दबाया नहीं जा सकता।

दिल्ली पुलिस दे जवाब

रिपोर्टों के अनुसार, संबंधित इलाकों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद कनॉट प्लेस में भीड़ जुटने और प्रदर्शनकारियों के साथ टकराव की घटनाएं सामने आईं। पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिबंधों के बावजूद भीड़ कैसे जुटी और कथित हिंसा रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए।

BBC के पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोके जाने, श्रीनिवासन जैन द्वारा पत्रकारों की हिरासत का विवरण साझा किए जाने, श्याम मीरा सिंह के साथ मारपीट और महिला पत्रकारों से दुर्व्यवहार की घटनाओं पर दिल्ली पुलिस को जवाब देना चाहिए। कितने पत्रकार हिरासत में लिए गए? उन्हें किस कानूनी आधार पर रोका गया? क्या उनकी शिकायतें दर्ज हुईं? प्रदर्शनकारियों पर हमले के आरोपों में क्या कार्रवाई हुई? और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले व्यक्ति को पकड़ने के मामले में पुलिस ने क्या कदम उठाए?

पत्रकारों का काम सवाल पूछना है, न कि पुलिस या किसी भीड़ की सुविधा के अनुसार चुप रहना। जब पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोका जाता है या उनके साथ मारपीट होती है, तो जनता का सूचना पाने का अधिकार भी प्रभावित होता है।

दिल्ली में प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही जरूरी है। पुलिसकर्मी हों या किसी संगठन से जुड़े लोग—यदि किसी ने कानून तोड़ा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र में कानून का राज तभी विश्वसनीय होगा, जब पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को बिना भय के अपना काम करने और अपनी बात रखने की सुरक्षा मिले।

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