श्रीनगर, 24 अक्टूबर 2025
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आज का दिन ऐतिहासिक साबित हुआ। लंबे अरसे के बाद राज्यसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने अपने पुराने जनाधार और संगठनात्मक शक्ति का शानदार प्रदर्शन करते हुए चार में से तीन सीटों पर विजय हासिल की। इस चुनाव में बीजेपी ने भी हार के बावजूद अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाबी पाई, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता सत शर्मा ने एक सीट पर जीत दर्ज की। इस जीत ने जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस को नई ऊर्जा दी है, वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में स्थानीय ताकतें अब भी सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस का शेर दहाड़ा – तीन सीटों पर धमाकेदार जीत
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस चुनाव में अपने तीन उम्मीदवारों — चौधरी मोहम्मद रमजान, सज्जाद किचलू और शम्मी ओबेरॉय — को विजयी बनाकर अपने राजनीतिक प्रभुत्व का लोहा मनवाया। इन तीनों नेताओं की जीत ने यह साबित कर दिया कि फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में पार्टी अब भी घाटी और जम्मू दोनों इलाकों में मजबूत पकड़ रखती है। चुनाव परिणामों से साफ झलकता है कि पार्टी की जड़ें अब भी जनता के बीच गहरी हैं, और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक इस जीत ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने संगठनात्मक स्तर पर बेहतर तालमेल और गठबंधन प्रबंधन का प्रदर्शन किया, जिसका नतीजा यह रहा कि उसने तीनों सीटों पर आरामदायक बढ़त से जीत दर्ज की।
बीजेपी के सत शर्मा ने दिखाई राजनीतिक कुशलता, बचाई पार्टी की लाज
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सत शर्मा ने पार्टी को सम्मानजनक स्थिति दिलाई। शर्मा ने जम्मू क्षेत्र से सीट जीतकर यह संदेश दिया कि भले ही बीजेपी को घाटी में कठिनाई हो, लेकिन जम्मू में उसका आधार अभी भी मजबूत है। बीजेपी ने इस चुनाव में अपने तीन उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी केवल एक सीट पर ही जीत दर्ज कर पाई। सत शर्मा की जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए राहत की खबर है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में बीजेपी की उपस्थिति बनाए रखना उसके लिए रणनीतिक दृष्टि से आवश्यक है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बीजेपी को आगामी विधानसभा या लोकसभा चुनावों में सफलता चाहिए, तो उसे अब घाटी में नए सिरे से जनसंपर्क अभियान चलाना होगा।
राजनीतिक संदेश और भविष्य की संभावनाएं
इन चुनाव परिणामों का राजनीतिक संदेश बहुत स्पष्ट है — जम्मू-कश्मीर की जनता ने राष्ट्रीय पार्टियों की बजाय स्थानीय प्रतिनिधित्व पर भरोसा जताया है। यह जीत केवल सीटों की संख्या नहीं है, बल्कि यह घाटी के मूड और मतदाताओं के मनोविज्ञान का प्रतीक है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जिस तरीके से चुनावी रणनीति बनाई और वोटों का बंटवारा रोका, वह काबिले तारीफ है। वहीं, बीजेपी को यह समझना होगा कि विकास के वादों के साथ-साथ स्थानीय सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह परिणाम जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो सकता है — जहां राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ताकतों का संतुलन आने वाले वर्षों में नीतिगत दिशा तय करेगा।
दिल्ली तक पहुंचा असर – विपक्ष में बढ़ी हलचल, गठबंधन की चर्चाएं तेज
इन नतीजों ने केवल जम्मू-कश्मीर की राजनीति नहीं, बल्कि दिल्ली के सत्ता गलियारों को भी प्रभावित किया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस की इस बड़ी जीत से विपक्षी गठबंधन INDIA के हौसले बुलंद हुए हैं। फारूक अब्दुल्ला पहले ही INDIA गठबंधन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, और इस जीत से उनका कद और बढ़ गया है। कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों का मानना है कि अगर घाटी में बीजेपी को कमजोर करना है, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे क्षेत्रीय दलों को मजबूत बनाना ही एकमात्र विकल्प है। वहीं, बीजेपी के रणनीतिकार अब नतीजों की समीक्षा कर रहे हैं और माना जा रहा है कि अगले चुनाव से पहले पार्टी जम्मू-कश्मीर में संगठनात्मक फेरबदल कर सकती है।
आगे का रास्ता – विकास, स्थिरता और संवाद की नई उम्मीद
इन परिणामों के बाद उम्मीद की जा रही है कि राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर से चुने गए ये चारों प्रतिनिधि अब शांति, विकास और स्थिरता की दिशा में एकजुट होकर काम करेंगे। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि वे अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग को संसदीय मार्ग से आगे बढ़ाएंगे। वहीं, सत शर्मा का कहना है कि वे प्रधानमंत्री मोदी के “नया जम्मू-कश्मीर” विज़न को आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। दोनों पक्षों की यह वैचारिक भिन्नता आने वाले महीनों में संसद में गूंजेगी — और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है कि मतभेद होते हुए भी संवाद और विकास की राह खुली रहती है।
जम्मू-कश्मीर के राज्यसभा चुनाव परिणाम केवल चार सीटों की कहानी नहीं हैं — ये राज्य की राजनीतिक दिशा, जनभावनाओं और भविष्य के चुनावी समीकरणों की झलक हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जहां तीन सीटों की जीत से अपनी वापसी दर्ज कराई है, वहीं बीजेपी के सत शर्मा ने यह साबित किया है कि पार्टी अभी भी इस भूमि से बाहर नहीं हुई है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह जीत घाटी और जम्मू के राजनीतिक संवाद को किस दिशा में मोड़ती है — क्या यह स्थिरता की ओर कदम है या नए संघर्ष की भूमिका? आने वाले महीनों में यह तय होगा।




