राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | जयपुर | 8 अक्टूबर 2026
अजमेर सेंट्रल जेल से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जेल की सुरक्षा और कैदियों की निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाली 37 वर्षीय जेलर दिव्या चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने जेल में बंद दो महिला कैदियों को अपने घर के कामकाज में मदद के लिए जेल से बाहर ले जाने की कोशिश की। अब वही जेलर उसी जेल में बंद हैं, जहां कभी वह कैदियों की निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती थीं।
मामला 12 जुलाई का बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार दिव्या चौधरी ने अजमेर सेंट्रल जेल की महिला सुधार गृह में बंद दो महिला कैदियों को अपने साथ जेल से बाहर ले जाने की कोशिश की। इनमें किरण उर्फ सेठा, जो उम्रकैद की सजा काट रही है, और सना, जो विचाराधीन कैदी है, शामिल थीं।
जांच एजेंसियों के अनुसार दिव्या अपने पति से अलग रह रही थीं और अपनी दो छोटी बेटियों तथा करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित किराये के मकान और नौकरी की जिम्मेदारियों को संभालने में कठिनाई महसूस कर रही थीं। आरोप है कि इसी वजह से उन्होंने जेल में बंद दोनों महिलाओं से घरेलू काम कराने का रास्ता चुना।
बताया गया है कि 12 जुलाई को जब वह दोनों कैदियों को जेल से बाहर ले जाने की कोशिश कर रही थीं, तब जेल कर्मचारियों ने इसका विरोध किया। इसके बावजूद कथित तौर पर उन्होंने दोनों महिलाओं को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया। मामले की जानकारी सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर जांच शुरू की गई।
आंतरिक जांच के बाद पुलिस में मामला दर्ज किया गया और दिव्या चौधरी को कोटा से गिरफ्तार किया गया। अब वह उसी अजमेर जेल में बंद हैं, जहां कभी वह अधिकारी के तौर पर कैदियों की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी निभाती थीं।
इस मामले ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और अधिकारियों द्वारा अपने पद के संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जेल अधिकारियों के पास कैदियों की आवाजाही, सुरक्षा और निगरानी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी ने अपने पद का इस्तेमाल व्यक्तिगत घरेलू काम के लिए कैदियों को जेल से बाहर ले जाने में किया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी मामला बन सकता है।
पुलिस का आरोप है कि जेलर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए दोनों महिला कैदियों को घरेलू काम के लिए बाहर ले जाने की कोशिश की। हालांकि, मामले में सामने आए आरोपों का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगा।
इस घटना का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यही है कि जिस अधिकारी की जिम्मेदारी कैदियों को कानून और जेल नियमों के दायरे में रखना थी, वही अब कथित तौर पर उन्हीं नियमों के उल्लंघन के आरोप में जेल में बंद है।
अजमेर का यह मामला जेल प्रशासन के लिए भी बड़ा सवाल छोड़ गया है—अगर जेल के भीतर तैनात अधिकारी ही कैदियों की सुरक्षा व्यवस्था और नियमों को अपने निजी काम के लिए इस्तेमाल करने लगें, तो जेल व्यवस्था की निगरानी कौन करेगा?



