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क्या भरोसेमंद PSLV कमजोर पड़ रहा है? 9 महीने में दूसरी विफलता क्यों? 16 सैटेलाइट बर्बाद

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अवधेश कुमार | नई दिल्ली | 13 जनवरी 2026

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक बार फिर गहरा झटका लगा है। देश का सबसे भरोसेमंद माना जाने वाला PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) मिशन फिर असफल हो गया है। इस बार इस नाकामी की कीमत 16 सैटेलाइट के पूरी तरह नष्ट होने के रूप में चुकानी पड़ी है। यह घटना इसलिए ज्यादा चिंता पैदा कर रही है क्योंकि सिर्फ 9 महीनों के भीतर यह दूसरी विफलता है, और हैरानी की बात यह है कि दोनों बार रॉकेट के तीसरे चरण (थर्ड स्टेज) में ही तकनीकी गड़बड़ी सामने आई है। इससे ISRO की तकनीकी तैयारी और समीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

12 जनवरी 2026 को सुबह करीब 10.17 बजे PSLV-C62 रॉकेट को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया। लॉन्च के शुरुआती कुछ मिनटों तक सब कुछ सामान्य दिखा। पहला और दूसरा चरण बिल्कुल तय योजना के मुताबिक काम करते रहे, जिससे उम्मीद जगी कि मिशन सफल रहेगा। लेकिन जैसे ही रॉकेट का तीसरा चरण सक्रिय हुआ, तकनीकी खराबी आ गई। रॉकेट अपने तय रास्ते से भटक गया और सैटेलाइट को सही कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। नतीजा यह हुआ कि एक भी सैटेलाइट को ऑर्बिट में स्थापित नहीं किया जा सका और सभी 16 सैटेलाइट अंतरिक्ष में बेकार हो गए।

दूसरी असफलता, वही तीसरा चरण

यह पहला मौका नहीं है जब PSLV के तीसरे चरण ने पूरे मिशन को डुबो दिया हो। इससे पहले मई 2025 में PSLV-C61 मिशन भी इसी तरह असफल हुआ था। उस समय भी थर्ड स्टेज में तकनीकी खराबी आई थी, जिसके चलते महत्वपूर्ण मौसम और पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह EOS-09 को उसकी तय कक्षा तक नहीं पहुंचाया जा सका था। उस विफलता के बाद सुधार और समीक्षा के दावे किए गए थे, लेकिन अब 9 महीनों में फिर वही गलती दोहराई गई, जिससे इन दावों की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

लगातार एक ही चरण में समस्या सामने आना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं डिज़ाइन, टेस्टिंग या गुणवत्ता नियंत्रण में गंभीर कमी रह गई है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सुधारों को कागजों तक ही सीमित रखा गया।

16 सैटेलाइट की भारी बर्बादी

PSLV-C62 मिशन में शामिल सैटेलाइट सिर्फ सरकारी प्रयोगों तक सीमित नहीं थे। इनमें भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) का उन्नत Anvesha (EOS-N1) सैटेलाइट भी शामिल था, जिसे पृथ्वी की निगरानी और सुरक्षा से जुड़े कामों के लिए तैयार किया गया था। इसके अलावा ध्रुवा स्पेस, TakeMe2Space और कुछ अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के कई छोटे सैटेलाइट भी इस मिशन का हिस्सा थे, जिनका उद्देश्य वैज्ञानिक शोध, तकनीकी प्रयोग और व्यावसायिक सेवाएं देना था।

इन सैटेलाइट्स के नष्ट होने का मतलब सिर्फ तकनीकी असफलता नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की आर्थिक क्षति, सालों की मेहनत और शोध का खत्म हो जाना भी है। खासकर निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए यह झटका ज्यादा बड़ा है, क्योंकि वे भारत को वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में मजबूत खिलाड़ी बनाने की उम्मीद से इन मिशनों से जुड़ी थीं।

PSLV की साख पर उठते सवाल

PSLV को लंबे समय तक ISRO की रीढ़ माना जाता रहा है। तीन दशकों से अधिक समय तक इस रॉकेट ने 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर के साथ काम किया और भारत के कई ऐतिहासिक मिशनों—जैसे चंद्रयान, मंगलयान और आदित्य-L1—में अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी PSLV को भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल माना जाता था। लेकिन अब लगातार दूसरी विफलता ने इस भरोसे को झटका दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या तकनीकी परीक्षण और सिमुलेशन पर्याप्त नहीं थे? क्या तीसरे चरण में कोई बुनियादी डिजाइन या नियंत्रण से जुड़ी समस्या है? और क्या पिछली विफलता के बाद सुधार आधे-अधूरे रह गए?

ये सवाल सिर्फ ISRO ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के सामने खड़े हो गए हैं।

आगे की राह क्या है?

ISRO ने कहा है कि वह इस विफलता से जुड़े सभी डेटा का गहराई से विश्लेषण कर रहा है और जल्द ही विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी। एजेंसी का दावा है कि गलती की जड़ तक पहुंचकर जरूरी सुधार किए जाएंगे, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। लेकिन सच्चाई यह है कि 16 सैटेलाइट की बर्बादी और 9 महीनों में दो बार PSLV की विफलता ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की विश्वसनीयता, तैयारी और समीक्षा प्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि ISRO इस संकट से क्या सबक लेता है और भरोसे को दोबारा कैसे मजबूत करता है।

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