राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 4 नवंबर 2026
आप बाजार से समोसा खरीदते हैं, दूध पीते हैं, किसी बड़े रेस्टोरेंट में खाना खाते हैं या ऑनलाइन फूड ऑर्डर करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा की जांच करने का अधिकार किसके पास है? राज्य सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पास या केंद्र की नियामक संस्था FSSAI के पास?
महाराष्ट्र में यही सवाल अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच अधिकारों की बड़ी लड़ाई बन गया है। राज्य सरकार ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की व्यवस्था को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है। महाराष्ट्र का आरोप है कि केंद्र ने खाद्य कारोबारों की जांच और कार्रवाई के लिए समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिससे राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त और उनके अधिकारियों के अधिकार सीमित हो रहे हैं।
इस मामले में महाराष्ट्र की ओर से खाद्य सुरक्षा आयुक्त तुकाराम मुंढे ने याचिका दायर की है। मुंढे को खाद्य कारोबारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए जाना जाता है। उनके नेतृत्व में राज्य में कई चर्चित रेस्टोरेंट, मिठाई की दुकानों, डेयरियों और दूध विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है। अब सवाल यह है कि क्या केंद्र की नई व्यवस्था राज्य के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के अधिकारों को सीमित कर रही है या बड़े कारोबारों की निगरानी के लिए एक समान राष्ट्रीय प्रणाली बनाने की कोशिश है?
खाद्य सुरक्षा कानून में राज्य की क्या भूमिका है?
देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 लागू है। इस कानून के तहत FSSAI राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा के मानक तय करता है। वहीं, राज्यों में इन नियमों को लागू कराने और खाद्य कारोबारों की निगरानी की जिम्मेदारी राज्य की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर होती है।
कानून के मुताबिक, राज्य का खाद्य सुरक्षा आयुक्त पूरे राज्य में इस व्यवस्था का प्रमुख होता है। वह जिलों में डेजिग्नेटेड ऑफिसर नियुक्त करता है और अलग-अलग क्षेत्रों में फूड सेफ्टी ऑफिसर (FSO) तैनात किए जाते हैं।
खाद्य कारोबारों की जांच करना, शिकायतों पर कार्रवाई करना, खाद्य पदार्थों के नमूने लेना और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में आवश्यक कदम उठाना इन अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
यानी कानून की मूल व्यवस्था में रोजमर्रा की जांच और कार्रवाई के लिए राज्य के अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित की गई है।
12 मई 2023 का FSSAI आदेश बना विवाद की जड़
महाराष्ट्र सरकार की आपत्ति का प्रमुख आधार FSSAI का 12 मई 2023 का आदेश है। इस आदेश में कहा गया कि केंद्रीय लाइसेंस वाले खाद्य कारोबारों की जांच केंद्र के फूड सेफ्टी ऑफिसर करेंगे।
राज्य के अधिकारी ऐसे कारोबारों की जांच केवल तीन विशेष परिस्थितियों में कर सकते हैं—
* आपात स्थिति: किसी बड़ी घटना या आपातकाल में तत्काल कार्रवाई जरूरी हो।
* राज्य का विशेष अभियान: राज्य सरकार विशेष जांच अभियान चलाए, जिसके लिए खाद्य सुरक्षा आयुक्त की पूर्व अनुमति और FSSAI के क्षेत्रीय निदेशक को पहले से सूचना देना जरूरी हो।
* VIP ड्यूटी: किसी VIP ड्यूटी के दौरान कम समय में कार्रवाई आवश्यक हो।
इन परिस्थितियों में राज्य के अधिकारी जांच और नमूने लेने की कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन उन्हें इसकी रिपोर्ट केंद्रीय लाइसेंसिंग अथॉरिटी को भेजनी होगी। आगे की कार्रवाई और अपील की प्रक्रिया भी केंद्र की अथॉरिटी के अधीन रखी गई है।
महाराष्ट्र सरकार का सवाल है कि जब खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राज्य के अधिकारी जांच और कार्रवाई के लिए नियुक्त किए जाते हैं, तो केंद्रीय संस्था अपने आदेश से उनके अधिकारों पर ऐसी सीमाएं कैसे लगा सकती है?
महाराष्ट्र सरकार के चार बड़े आरोप
महाराष्ट्र सरकार ने अपनी याचिका में FSSAI की व्यवस्था पर चार प्रमुख आपत्तियां उठाई हैं।
1\. समानांतर नियामक व्यवस्था खड़ी करने का आरोप
राज्य सरकार का कहना है कि खाद्य सुरक्षा कानून में राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त को जांच अधिकारियों की नियुक्ति और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बावजूद FSSAI ने केंद्रीय लाइसेंस वाले कारोबारों की जांच के लिए अलग व्यवस्था बना दी।
महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ खाद्य सुरक्षा अधिकारी के अनुसार, कानून में केंद्रीय FSO की नियुक्ति के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उनका सवाल है कि जब कानून राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त को अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार देता है, तो FSSAI के CEO के आदेश से अलग केंद्रीय जांच व्यवस्था कैसे बनाई जा सकती है?
2\. राज्य के अधिकारियों की कार्रवाई पर पाबंदी
महाराष्ट्र का दूसरा आरोप है कि 2023 के आदेश ने राज्य के अधिकारियों के अधिकार सीमित कर दिए हैं। यदि किसी केंद्रीय लाइसेंस वाले खाद्य कारोबार के खिलाफ शिकायत राज्य के अधिकारी के पास आती है, तब भी वे सामान्य परिस्थितियों में सीधे जांच नहीं कर सकते।
राज्य सरकार का तर्क है कि इससे स्थानीय स्तर पर शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई प्रभावित होती है। खाद्य सुरक्षा का उल्लंघन किसी राज्य में हो रहा है, लेकिन जांच और कार्रवाई का नियंत्रण केंद्र के पास चला जाता है।
3\. FoSCoS पोर्टल के जरिए केंद्रीय व्यवस्था का विस्तार
FSSAI का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म फूड सेफ्टी कंप्लायंस सिस्टम (FoSCoS) भी विवाद का हिस्सा है। महाराष्ट्र सरकार का आरोप है कि इस पोर्टल की व्यवस्था और लाइसेंसिंग प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में खाद्य कारोबार केंद्रीय लाइसेंसिंग अथॉरिटी के दायरे में आ गए हैं।
राज्य के अधिकारियों के मुताबिक, पहले केंद्रीय लाइसेंस मुख्य रूप से उन कारोबारों के लिए जरूरी था, जिनका संचालन कई राज्यों में फैला हो या जो बड़े पैमाने पर उच्च जोखिम वाले खाद्य पदार्थों का उत्पादन और कारोबार करते हों।
बाद में पांच सितारा होटल, रेस्टोरेंट, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, न्यूट्रास्यूटिकल्स और प्रोप्राइटरी फूड जैसे कारोबार भी इस व्यवस्था के दायरे में आए।
प्रोप्राइटरी फूड ऐसे खाद्य पदार्थ होते हैं, जिनके लिए नियमों में अलग से कोई विशिष्ट मानक निर्धारित नहीं किए गए हैं। महाराष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि इस श्रेणी के व्यापक इस्तेमाल से छोटे कारोबारियों तक पर केंद्रीय लाइसेंसिंग व्यवस्था लागू होने का खतरा पैदा हुआ था। समोसे और मिक्सचर जैसे पारंपरिक भारतीय स्नैक्स बनाने वाले छोटे कारोबारियों को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी थी। बाद में FSSAI ने भारतीय स्नैक्स को इस दायरे से छूट दी।
4\. बिना सार्वजनिक राय-मशविरे के बदले गए लाइसेंस के नियम
महाराष्ट्र सरकार ने 13 मार्च 2026 को जारी FSSAI के आदेश पर भी सवाल उठाया है। इस आदेश के तहत खाद्य कारोबारों के टर्नओवर के आधार पर लाइसेंस की सीमाएं बदल दी गईं।
पहले लाइसेंस की व्यवस्था इस प्रकार थी—
* 12 लाख रुपये तक सालाना कारोबार: सामान्य रजिस्ट्रेशन।
* 12 लाख से 20 करोड़ रुपये तक: राज्य सरकार का लाइसेंस।
* 20 करोड़ रुपये से अधिक: केंद्रीय लाइसेंस।
नई व्यवस्था में सीमाएं बदलकर इस प्रकार कर दी गईं—
* 1.5 करोड़ रुपये तक सालाना कारोबार: सामान्य रजिस्ट्रेशन।
* 1.5 करोड़ से 50 करोड़ रुपये तक: राज्य सरकार का लाइसेंस।
* 50 करोड़ रुपये से अधिक: केंद्रीय लाइसेंस।
इस बदलाव से केंद्रीय लाइसेंस की सीमा 20 करोड़ से बढ़कर 50 करोड़ रुपये हो गई। पहली नजर में इससे अधिक कारोबार राज्य के लाइसेंसिंग दायरे में आ सकते हैं। लेकिन महाराष्ट्र सरकार की आपत्ति बदलाव की प्रक्रिया पर है। उसका आरोप है कि नियमों में संशोधन से पहले आवश्यक सार्वजनिक राय-मशविरा नहीं किया गया।
महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट से क्या मांगा?
राज्य सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में तीन प्रमुख राहतों की मांग की है—
* 2011 के लाइसेंसिंग नियमों, 2018 के भर्ती नियमों और 2026 के संशोधनों के विवादित प्रावधानों को रद्द किया जाए।
* मुख्य याचिका पर अंतिम फैसला आने तक 12 मई 2023 के FSSAI आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जाए।
* FoSCoS पोर्टल का पूरा डेटा और रिकॉर्ड राज्य के अधिकारियों को वापस उपलब्ध कराया जाए।
राज्य सरकार का कहना है कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उसे जो अधिकार दिए गए हैं, केंद्रीय आदेशों और पोर्टल की व्यवस्था के जरिए उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता।
जमीन पर जांच और मुकदमे में कैसे पैदा हो रही है परेशानी?
महाराष्ट्र सरकार की सबसे गंभीर चिंता जांच और कानूनी कार्रवाई के बीच तालमेल की कमी को लेकर है।
राज्य के एक अधिकारी के मुताबिक, कुछ मामलों में केंद्रीय अधिकारियों ने जांच की, खाद्य पदार्थों के नमूने लिए और बाद में मुकदमे की प्रक्रिया राज्य की अथॉरिटी को सौंप दी। इससे कानूनी कार्रवाई में व्यावहारिक मुश्किलें पैदा होती हैं।
अधिकारी का कहना है कि जब राज्य के अधिकारी ने स्वयं जांच नहीं की होती, तो अदालत में कई बुनियादी सवालों के जवाब देना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए, नमूना किस व्यक्ति से लिया गया, खाद्य कारोबार के मालिक की पहचान कैसे की गई और जांच के दौरान कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई?
राज्य का दावा है कि जांच और मुकदमे की जिम्मेदारी अलग-अलग अधिकारियों के बीच बंटने से कई मामलों में कार्रवाई कमजोर पड़ सकती है और नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों को सजा दिलाना मुश्किल हो सकता है।
टर्नओवर की परिभाषा पर भी सवाल
लाइसेंस की नई सीमाओं को लेकर एक और समस्या सामने आई है। महाराष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि सालाना टर्नओवर की गणना कैसे की जाएगी, इसे लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
क्या टर्नओवर का अर्थ कंपनी की कुल बिक्री है? क्या इसे GST रिटर्न, आयकर रिटर्न या किसी अन्य वित्तीय दस्तावेज के आधार पर तय किया जाएगा? राज्य के अधिकारियों के मुताबिक, इस अस्पष्टता के कारण कारोबारों की सही श्रेणी तय करने में परेशानी हो सकती है।
उनका दावा है कि कुछ बड़े कारोबार भी केवल सामान्य रजिस्ट्रेशन के आधार पर चल सकते हैं, जबकि उनके लिए विधिवत लाइसेंस और उससे जुड़ी शर्तें जरूरी होनी चाहिए।
FSSAI का जवाब—बड़े कारोबारों की निगरानी जरूरी
इस विवाद में FSSAI का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने महाराष्ट्र के खाद्य सुरक्षा विभाग के कामकाज और तुकाराम मुंढे के नेतृत्व की सराहना की है।
हालांकि, उनका तर्क है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में सभी राज्यों में कार्रवाई का स्तर और तरीका एक जैसा नहीं रहा है। राज्यों के भीतर भी निगरानी और प्रवर्तन में असमानता देखने को मिलती है।
केंद्र का पक्ष है कि बड़े खाद्य कारोबारों की निगरानी के लिए एक समान व्यवस्था जरूरी है, ताकि किसी राज्य में नियामक कार्रवाई कमजोर होने पर भी बड़े कारोबार निगरानी से बाहर न रह जाएं।
केंद्र के अधिकारी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी एक अधिकारी के नेतृत्व में बेहतर काम कर रहे राज्य विभाग की व्यवस्था उनके स्थानांतरण के बाद भी उसी तरह प्रभावी बनी रहेगी? उनके मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी की व्यवस्था खाद्य सुरक्षा के मानकों में निरंतरता बनाए रखने में मदद कर सकती है।
तुकाराम मुंढे के अधिकारों से बड़ा है यह विवाद
इस पूरे मामले को केवल तुकाराम मुंढे और FSSAI के बीच टकराव के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असल सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा कानून को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी किसकी होगी और केंद्र तथा राज्यों के बीच अधिकारों का बंटवारा किस तरह काम करेगा।
एक तरफ महाराष्ट्र सरकार का तर्क है कि राज्य के अधिकारियों को स्थानीय कारोबारों की जांच और कार्रवाई का पर्याप्त अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी तरफ केंद्र का कहना है कि बड़े कारोबारों की निगरानी और खाद्य सुरक्षा के राष्ट्रीय मानकों में एकरूपता जरूरी है।
अब बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने यही संवैधानिक और कानूनी प्रश्न है कि FSSAI के आदेशों की सीमा क्या है और क्या केंद्रीय नियामक संस्था राज्य के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के अधिकारों को इस तरह सीमित कर सकती है?
अदालत का फैसला केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर देश के दूसरे राज्यों में खाद्य सुरक्षा की जांच, लाइसेंसिंग और प्रवर्तन व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। फिलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है और अंतिम फैसला आने तक केंद्र तथा महाराष्ट्र सरकार के अपने-अपने दावे ही इस विवाद के दो पक्ष हैं।



