अंतरराष्ट्रीय/ व्यापार | अजित साही | ABC NATIONAL NEWS | तेहरान | 27 अप्रैल 2026
ईरान इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में भी महसूस किया जा रहा है। हाल के हफ्तों में अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद हालात काफी बदल गए हैं। हालांकि एक अस्थायी युद्धविराम के बाद राजधानी तेहरान में बाजार, कैफे और सड़कें फिर से खुलने लगी हैं, लेकिन यह “सामान्य स्थिति” अब पहले जैसी नहीं रही। लोगों के व्यवहार, खरीदारी और खर्च करने के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। तेहरान के बाजारों में आज भी सामान मौजूद है, लेकिन लोगों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब लोग जरूरत और इच्छा के बीच फर्क समझते हुए सिर्फ जरूरी चीजें ही खरीद रहे हैं। पहले जहां लोग आराम से शॉपिंग करते थे, वहीं अब हर खरीदारी सोच-समझकर की जा रही है। एक स्थानीय निवासी के शब्दों में, “अब सवाल यह नहीं कि क्या चाहिए, बल्कि यह है कि क्या वाकई जरूरी है।” यह बदलाव सीधे तौर पर बढ़ती महंगाई और अनिश्चित भविष्य की चिंता को दर्शाता है।
सरकार ने भी हालात को देखते हुए अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा कदम यह है कि जरूरी चीजों—जैसे गेहूं, दवाइयां, मेडिकल उपकरण और बच्चों के दूध—के लिए सस्ती दर पर विदेशी मुद्रा फिर से उपलब्ध कराई जा रही है। सरकार ने करीब 3.5 अरब डॉलर तक का फंड इन जरूरी सामानों के आयात के लिए तय किया है। यह सामान 285,000 रियाल प्रति डॉलर की दर से खरीदा जाएगा, जो खुले बाजार की दर (करीब 1.55 मिलियन रियाल प्रति डॉलर) से काफी कम है। इससे साफ है कि सरकार महंगाई को काबू में रखने और आम लोगों को राहत देने की कोशिश कर रही है।
दरअसल, कुछ समय पहले सरकार ने सस्ती मुद्रा की इस व्यवस्था को खत्म करने की योजना बनाई थी, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार बढ़ने और पारदर्शिता की कमी की शिकायतें सामने आ रही थीं। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। खुद सरकारी अधिकारियों ने माना है कि इस फैसले के बाद जरूरी चीजों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई, जिससे आम लोगों पर भारी दबाव पड़ा। यही वजह है कि सरकार को अब आंशिक रूप से अपनी पुरानी नीति पर लौटना पड़ा है।
इसके साथ ही सरकार लोगों को आर्थिक राहत देने के लिए नकद सहायता और इलेक्ट्रॉनिक कूपन बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। फिलहाल हर व्यक्ति को महीने में 10 डॉलर से भी कम की मदद मिलती है, जो बढ़ती महंगाई के सामने काफी कम साबित हो रही है। ऐसे में सरकार नए विकल्प तलाश रही है ताकि लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।
खाद्य सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ी है। इसी वजह से सरकार ने अपने संप्रभु कोष, यानी नेशनल डेवलपमेंट फंड से करीब 1 अरब डॉलर निकालने का फैसला किया है। इस पैसे से चीनी, चावल, मक्का, सोयाबीन, मांस और चिकन जैसे जरूरी खाद्य पदार्थ आयात किए जाएंगे ताकि देश में इनकी कमी न हो। सरकार का कहना है कि देश के पास अभी पर्याप्त विदेशी मुद्रा और सोने का भंडार है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है।
युद्ध का असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार और उद्योगों पर भी पड़ा है। इंटरनेट बंदी और बुनियादी ढांचे पर हमलों के कारण लाखों नौकरियां प्रभावित हुई हैं। कई फैक्ट्रियां, खासकर स्टील प्लांट जैसी इकाइयां, हमलों के कारण ठप हो गई हैं। इसके अलावा करीब दो महीने से चल रही इंटरनेट बंदी ने व्यापार, शिक्षा और रोजमर्रा के कामकाज को भी प्रभावित किया है। लोग अब इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए महंगे विकल्पों का सहारा ले रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक परेशानी और बढ़ रही है।
स्थिति का असर लोगों के जीवनशैली पर साफ दिखाई दे रहा है। लोग बाहर खाना कम कर रहे हैं, यात्रा टाल रहे हैं और खर्चों में कटौती कर रहे हैं। कुछ लोग तो भविष्य की चिंता में खाने-पीने का सामान जमा करना भी शुरू कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा कि कुछ साल पहले जहां एक परिवार का खाना लाखों रियाल में आता था, आज एक व्यक्ति का खाना उससे कई गुना महंगा हो गया है।
हालांकि सरकार यह भरोसा दिला रही है कि देश में खाद्य संकट नहीं आएगा, क्योंकि ईरान की सीमाएं इराक, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे देशों से जुड़ी हैं, जहां से आयात जारी रखा जा सकता है। इसके अलावा सीमावर्ती राज्यों को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं ताकि वे कम प्रक्रिया के साथ जरूरी सामान मंगा सकें।
ईरान इस समय एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है—एक तरफ युद्ध का दबाव और दूसरी तरफ जनता की जरूरतें। सरकार नीतियों में बदलाव कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आम आदमी की जिंदगी पहले से ज्यादा मुश्किल हो गई है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ये कदम हालात को कितना संभाल पाते हैं और क्या ईरान इस संकट से स्थिरता की ओर बढ़ पाता है।




