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क्वांटम की उलझी दुनिया सुलझाने में भारत की बड़ी खोज! एक सही समय का ‘फ्लिप’ बचा सकता है क्वांटम कनेक्शन

विज्ञान और तकनीक/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 14 सितंबर 2026

पहले आसान भाषा में समझिए—आखिर खोज क्या हुई?

बेंगलुरु के रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने क्वांटम विज्ञान की एक बड़ी समस्या पर काम करते हुए एक बेहद दिलचस्प तरीका खोजा है। उन्होंने दिखाया है कि क्वांटम कणों के बीच बना खास जुड़ाव, जिसे क्वांटम एंटैंगलमेंट कहा जाता है, सही समय पर एक छोटे से ‘फ्लिप ऑपरेशन’ की मदद से ज्यादा समय तक बचाया जा सकता है। इसे ऐसे समझिए जैसे दो लोग एक-दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हों और बाहर का शोर उनके बीच का तालमेल बिगाड़ रहा हो। वैज्ञानिकों ने ऐसा तरीका खोजने की कोशिश की है जिसमें सही समय पर एक छोटा हस्तक्षेप करके उस तालमेल को कुछ और समय तक बनाए रखा जा सके। और सबसे रोचक बात यह है कि वही फ्लिप अलग-अलग समय पर करने से अलग परिणाम मिल सकते हैं—कहीं यह एंटैंगलमेंट को बचा सकता है, कहीं उसके खत्म होने में देरी कर सकता है और कुछ परिस्थितियों में उसे जल्दी खत्म भी कर सकता है।

क्वांटम एंटैंगलमेंट को ऐसे समझिए जैसे दो कणों की ‘गहरी दोस्ती’

क्वांटम एंटैंगलमेंट सुनने में बहुत मुश्किल शब्द लगता है, लेकिन इसे बहुत आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए दो बेहद छोटे कण किसी खास प्रक्रिया के बाद इस तरह जुड़ जाते हैं कि उनकी क्वांटम अवस्थाएं एक-दूसरे से संबंधित हो जाती हैं। यानी उन्हें पूरी तरह दो अलग चीजों की तरह समझना मुश्किल होता है। दोनों का व्यवहार एक साझा व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। यही खास जुड़ाव क्वांटम तकनीक के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्वांटम कंप्यूटर में ऐसी ही क्वांटम अवस्थाओं का इस्तेमाल जानकारी को संभालने और गणना करने के लिए किया जाता है। इसलिए वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल हमेशा से रहा है—अगर यह जुड़ाव इतनी महत्वपूर्ण चीज है, तो इसे ज्यादा देर तक सुरक्षित कैसे रखा जाए?

सबसे बड़ी परेशानी है बाहर की दुनिया

क्वांटम कण बहुत संवेदनशील होते हैं। उन्हें अपने आसपास के वातावरण से जितना ज्यादा संपर्क होता है, उनकी विशेष क्वांटम अवस्था उतनी ही कमजोर होने लगती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि कोई बहुत नाजुक चीज लगातार शोर, गर्मी या दूसरे बाहरी प्रभावों के बीच रखी हो। धीरे-धीरे उसकी मूल स्थिति बिगड़ने लगती है। क्वांटम विज्ञान में इस प्रक्रिया को डिकोहेरेंस कहा जाता है। जब एंटैंगलमेंट इतना कमजोर हो जाए कि वह अचानक खत्म हो जाए, तो इसे ‘एंटैंगलमेंट सडन डेथ’ कहा जाता है। क्वांटम कंप्यूटर के लिए यह बड़ी चुनौती है, क्योंकि अगर क्वांटम जानकारी ज्यादा देर तक सुरक्षित नहीं रहेगी, तो ऐसी मशीनों को भरोसेमंद तरीके से काम कराना मुश्किल होगा।

यहीं से शुरू हुआ भारतीय वैज्ञानिकों का प्रयोग

रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की टीम ने इस समस्या को समझने के लिए प्रकाश के कण यानी फोटॉन का इस्तेमाल किया। फोटॉन में एक खास गुण होता है जिसे पोलराइजेशन कहते हैं। इसे बहुत सरल तरीके से ऐसे समझिए कि प्रकाश की तरंगों की दिशा को अलग-अलग अवस्था में रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग पोलराइजेशन अवस्थाओं को लेकर प्रयोग किया और एक अवस्था को दूसरी में बदलने वाला ‘फ्लिप’ लगाया। इसके लिए उन्होंने वेवप्लेट नाम के ऑप्टिकल उपकरण का इस्तेमाल किया। लेकिन इस प्रयोग में असली कमाल यह नहीं था कि वैज्ञानिक प्रकाश की अवस्था बदल सकते हैं—यह तो पहले से संभव है। असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि फ्लिप को ठीक किस समय किया जाए ताकि एंटैंगलमेंट के खत्म होने की प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सके।

एक ही फ्लिप, लेकिन समय बदलते ही नतीजा बदल गया

अब इस खोज की सबसे दिलचस्प बात सामने आती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि फ्लिप ऑपरेशन का असर इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कब किया गया। अगर सही समय चुना जाए तो एंटैंगलमेंट के अचानक खत्म होने को रोका जा सकता है। किसी दूसरे समय पर वही प्रक्रिया एंटैंगलमेंट को खत्म होने में देरी कर सकती है। और कुछ परिस्थितियों में वही ऑपरेशन एंटैंगलमेंट को जल्दी खत्म भी कर सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि वैज्ञानिकों के हाथ में सिर्फ एक ‘स्विच’ नहीं आया, बल्कि उन्हें यह संकेत मिला कि क्वांटम सिस्टम के व्यवहार को नियंत्रित करने में समय खुद एक महत्वपूर्ण हथियार हो सकता है।

यह खोज इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

मान लीजिए भविष्य में कोई क्वांटम कंप्यूटर बहुत जटिल गणना कर रहा है। उस दौरान उसकी क्वांटम जानकारी बाहरी वातावरण के कारण कमजोर होने लगे। अगर वैज्ञानिक यह पता लगा सकें कि किस समय हस्तक्षेप करने से उस जानकारी को ज्यादा देर तक बचाया जा सकता है, तो क्वांटम सिस्टम के काम करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। इसका फायदा भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार और क्वांटम सूचना तकनीक जैसे क्षेत्रों में हो सकता है। खासकर क्वांटम कंप्यूटरों में जानकारी को लंबे समय तक सही अवस्था में रखना बहुत जरूरी है। हालांकि यह शोध अभी किसी व्यावहारिक क्वांटम कंप्यूटर में सीधे इस्तेमाल होने वाला तैयार समाधान नहीं है, लेकिन यह वैज्ञानिकों को एक नया नियंत्रण तरीका जरूर देता है।

क्या इससे क्वांटम कंप्यूटर अब पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगे?

नहीं। इस बात को समझना बहुत जरूरी है। वैज्ञानिकों ने खुद स्पष्ट किया है कि उन्होंने डिकोहेरेंस की पूरी समस्या को खत्म नहीं किया है। उनका काम एक खास तरह के नुकसान, जिसे एम्प्लीट्यूड डैम्पिंग कहा जाता है, से जुड़े मामले पर है। यानी यह खोज क्वांटम विज्ञान की हर समस्या का इलाज नहीं है। लेकिन इसका महत्व इसलिए है क्योंकि इसने यह दिखाया है कि क्वांटम सिस्टम के साथ काम करते समय केवल मजबूत उपकरण या ज्यादा ऑपरेशन ही जरूरी नहीं हैं। सही समय पर किया गया छोटा-सा ऑपरेशन भी बहुत बड़ा फर्क पैदा कर सकता है।

सबसे हैरान करने वाली बात—बार-बार फ्लिप करना जरूरी नहीं

आम तौर पर लगता है कि अगर एक बार किया गया काम फायदा दे रहा है, तो उसे कई बार करने से और ज्यादा फायदा होगा। लेकिन इस प्रयोग ने यहां भी दिलचस्प बात दिखाई। वैज्ञानिकों ने जिस रणनीति का अध्ययन किया, उसमें बार-बार ऐसे ऑपरेशन करने से फायदा नहीं हुआ। कुछ स्थितियों में इससे परिणाम और खराब हो सकते हैं। यानी क्वांटम दुनिया में ‘ज्यादा’ हमेशा ‘बेहतर’ नहीं होता। सही समय पर सही कदम उठाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

भारत के लिए भी बड़ी उपलब्धि

इस शोध को भारत के नेशनल क्वांटम मिशन से वित्तीय सहायता मिली है। रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी और लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर यह अध्ययन किया है। इसके नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका फिजिकल रिव्यू ए में प्रकाशित हुए हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया भर में क्वांटम तकनीक को भविष्य की रणनीतिक तकनीकों में गिना जा रहा है और भारत भी इस क्षेत्र में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ा रहा है।

इसका असली फायदा आने वाले समय में दिखाई देगा

आज यह खोज प्रयोगशाला में फोटॉन और उनकी क्वांटम अवस्थाओं के स्तर पर है, लेकिन इसका सबसे बड़ा महत्व भविष्य के लिए है। अगर आगे के शोध यह दिखाते हैं कि इसी तरह की टाइमिंग तकनीक दूसरे क्वांटम सिस्टम में भी काम कर सकती है, तो वैज्ञानिकों के पास क्वांटम जानकारी को नियंत्रित करने का एक नया तरीका होगा। इससे भविष्य में ऐसी मशीनें बनाने में मदद मिल सकती है जिनमें क्वांटम जानकारी को ज्यादा समय तक संभालना संभव हो। आसान शब्दों में कहें तो वैज्ञानिक अभी क्वांटम दुनिया को ‘अमर’ नहीं बना रहे हैं, लेकिन वे यह सीख रहे हैं कि उसके कमजोर पड़ने और खत्म होने की प्रक्रिया को कैसे मोड़ा जा सकता है।

एक लाइन में पूरी खोज

इस पूरी रिसर्च को अगर बिल्कुल आसान भाषा में समझना हो तो बात इतनी है—क्वांटम कणों का जुड़ाव बहुत नाजुक है, वातावरण उसे तोड़ देता है, लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि सही समय पर किया गया एक छोटा ‘फ्लिप’ उस जुड़ाव के खत्म होने की कहानी बदल सकता है।

और यही इस खोज की सबसे बड़ी खूबी है—क्वांटम दुनिया में अब सिर्फ यह सवाल नहीं है कि ‘क्या करना है’, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है कि ‘कब करना है।’

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