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भारत पर कर्ज़ संकट: विश्वगुरु के दावों के बीच बढ़ता आर्थिक बोझ, जनता भुगतेगी कीमत

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नई दिल्ली, 3 अक्टूबर 2025

भारत की अर्थव्यवस्था एक नाजुक दौर से गुजर रही है। सरकार “विश्वगुरु” बनने के दावों के साथ वैश्विक मंच पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन देश पर बढ़ता कर्ज़, महंगाई, और बेरोज़गारी का तिहरा संकट आम जनता की जिंदगी को कठिन बना रहा है। यह स्थिति न केवल आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाती है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी गंभीर चुनौतियाँ खड़ी करती है।

केंद्र सरकार का कर्ज़: खतरनाक स्तर पर

31 मार्च 2025 तक केंद्र सरकार की कुल देनदारी ₹185.27 लाख करोड़ (₹185.27 ट्रिलियन) तक पहुंच चुकी है, जैसा कि वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। यह भारत की अनुमानित जीडीपी का लगभग 81% है, जो एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब कर्ज़-जीडीपी अनुपात 80% से अधिक होता है, तो यह आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिम पैदा करता है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि सरकारी राजस्व का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 25–30%) ब्याज भुगतान में चला जाता है। नतीजतन, शिक्षा, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय कर्ज़: वर्ल्ड बैंक का सबसे बड़ा कर्ज़दार

वर्ल्ड बैंक की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत इस संस्था का सबसे बड़ा कर्ज़दार देश है, जिस पर कुल $24.4 बिलियन (लगभग ₹2.05 लाख करोड़) का कर्ज़ है। यह इंडोनेशिया ($21.3 बिलियन), यूक्रेन ($16.6 बिलियन), कोलंबिया ($16.4 बिलियन), और ब्राज़ील ($15.5 बिलियन) जैसे देशों से अधिक है। भारत का कुल बाह्य कर्ज़ जून 2025 तक $747.2 बिलियन (लगभग ₹62.7 लाख करोड़) तक पहुंच चुका है, जो जीडीपी का 19.1% है। हालांकि, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ($692 बिलियन, सितंबर 2025) इस कर्ज़ को 92–95% तक कवर करता है, जो कुछ हद तक राहत देता है। फिर भी, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि यह कर्ज़ गैर-उत्पादक क्षेत्रों (जैसे राजकोषीय घाटे को पाटने) में खर्च होता है, तो यह दीर्घकालिक आर्थिक संकट को जन्म दे सकता है।

महंगाई और बेरोज़गारी: जनता की दोहरी मार

कर्ज़ के साथ-साथ, महंगाई और बेरोज़गारी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। अगस्त 2025 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति 6.2% थी, जो रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के 4% (±2%) लक्ष्य से अधिक है। दाल, सब्जियां, और ईंधन की कीमतों में लगातार वृद्धि ने गरीब और मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति को कमजोर किया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के अनुसार, अगस्त 2025 में शहरी बेरोज़गारी दर 7.8% और ग्रामीण क्षेत्रों में 4.5% थी, जो औसतन 5.1% की राष्ट्रीय दर दर्शाती है। हालांकि, ये आंकड़े अनौपचारिक क्षेत्र में रोज़गार की कमी को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं करते, जहां लाखों युवा अस्थायी या अल्प-वेतन वाली नौकरियों पर निर्भर हैं।

नीतिगत असमानता और राजनीतिक विवाद

आलोचकों का आरोप है कि सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। बिहार के भागलपुर में 1,030 एकड़ वन भूमि को ₹1 वार्षिक किराए पर एक निजी कंपनी को देने का मामला इसका उदाहरण है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज़ के कारण किसानों की आत्महत्याओं में 7% की वृद्धि हुई है। कॉरपोरेट कर्ज़ माफी (जैसे, ₹14.5 लाख करोड़ के गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का समायोजन, जैसा कि RBI ने 2023–24 में बताया) और किसानों की अनदेखी ने सामाजिक असंतोष को बढ़ाया है।

विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा है। कांग्रेस ने ट्वीट किया: “विश्वगुरु का ढोंग करने वाली सरकार ने भारत को वर्ल्ड बैंक का सबसे बड़ा कर्ज़दार बनाया। यह कर्ज़ जनता की मेहनत से चुकाया जाएगा।” यह बयान जनता के गुस्से को दर्शाता है, लेकिन सरकार का तर्क है कि कर्ज़ का उपयोग बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में किया जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक लाभ होगा।

आगे का रास्ता

कर्ज़, महंगाई, और बेरोज़गारी का यह तिहरा संकट 2029 के आम चुनावों में प्रमुख मुद्दा बन सकता है। जनता अब खोखले वादों से तंग आ चुकी है और ठोस नीतिगत सुधार चाहती है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि सरकार को कर्ज़ का उपयोग उत्पादक क्षेत्रों (जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, कौशल विकास) में करना चाहिए और छोटे उद्यमों 및 किसानों को राहत देनी चाहिए। यदि नीतियां केवल कॉरपोरेट हितों और अंतरराष्ट्रीय कर्ज़ों के इर्द-गिर्द घूमती रहीं, तो भारत की “आर्थिक स्वतंत्रता” एक दूर का सपना बनकर रह जाएगी।

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