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इंडिया गठबंधन की हार: असल सच को दबाकर ‘समीक्षा’ लिखने वाले पत्रकारों की समीक्षा कौन करेगा?

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अवधेश कुमार । नई दिल्ली 16 नवंबर 2025

बिहार चुनाव 2025 के बाद इंडिया गठबंधन की हार पर देशभर में समीक्षा बैठकों, टीवी बहसों और अख़बारी कॉलमों की बाढ़ आ गई। सीनियर से लेकर जूनियर तक, हर पत्रकार ने अपने-अपने ढंग से विपक्ष को ‘सलाह’ देनी शुरू कर दी—कहीं संगठन पर उंगली, कहीं स्थानीय कैंडिडेट की कमजोरी, कहीं गठबंधन तालमेल को दोष। लेकिन हैरत की बात ये है कि इन तमाम विश्लेषणों में किसी भी पत्रकार ने एक ईमानदार सवाल नहीं उठाया—क्या विपक्ष की हार संगठनात्मक कमी से ज्यादा एक सुनियोजित चुनावी इकोसिस्टम की जीत थी?

कहाँ है वो विश्लेषण जो कहे कि विपक्ष ने इस बार शिक्षा, रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार और संविधान बचाने जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा? कहाँ है वो लेख जो साफ लिखे कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने नफरत फैलाने वाले भाषण नहीं दिए, हर जगह शांति, न्याय और विकास की बात की? क्या किसी पत्रकार ने ये कहा कि विपक्ष के बड़े नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से साफ दूरी बनाए रखी और जनता के असली मुद्दों पर एक साफ-सुथरा एजेंडा पेश किया?

दूसरी ओर क्या किसी मुख्यधारा के विश्लेषक ने ये लिखा कि BJP ने इस चुनाव में ध्रुवीकरण, नफरती भाषण, धार्मिक भावनाओं की घेराबंदी और भावनात्मक उन्माद को चुनावी रणनीति के केंद्र में रखा? क्या किसी रिपोर्ट ने निष्पक्षता से दर्ज किया कि सत्ता पक्ष ने सरकारी मशीनरी का ऐसा बेतहाशा उपयोग किया, जैसे पूरा शासन-तंत्र सिर्फ एक पार्टी की जीत सुनिश्चित करने में लगा हो? क्या किसी टीवी बहस ने ये माना कि मीडिया ने विपक्ष के मुद्दों को दबाया, उन्हें देशद्रोह का ‘टैग’ दिया, और सत्ता पक्ष के हर झूठे नैरेटिव को बिना जांचे परोसा?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी भी विश्लेषक ने चुनाव आयोग की भूमिका पर उंगली उठाई? क्या किसी पत्रकार ने ये हिम्मत दिखाई कि वो लिखे कि ECI ने वोट चोरी, बूथ कैप्चरिंग, गुमनाम मतदाता सूची कटौती, SIR प्रक्रिया के नाम पर लाखों नाम हटाने और विपक्ष की शिकायतों को अनसुना करने में निर्णायक भूमिका निभाई? जब विपक्ष के नेताओं ने खुलकर कहा कि वोटर लिस्ट से नाम गायब हैं, तो चुनाव आयोग ने कितनी कार्रवाई की? कितना सत्यापित किया? जवाब है—कुछ भी नहीं।

लेकिन हमारी “समीक्षाओं” में ये सब नहीं मिलता। क्यों? क्योंकि आसानी उसी में है कि विपक्ष को संगठन, प्रबंधन और रणनीति की कमी का दोष दे दो। असली मुद्दों पर बात करने से लोग बचते हैं, क्योंकि उससे सत्ता नाराज होती है, विज्ञापन बंद होते हैं, और चैनलों के दरवाज़े बंद हो जाते हैं। इसलिए पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा विपक्ष की समीक्षा तो लिखता है, लेकिन सत्ता के ‘असली खेल’ की समीक्षा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

यह चुनाव सिर्फ संगठनों की लड़ाई नहीं थी—यह सत्ता के इकोसिस्टम बनाम विपक्ष की सच्चे मुद्दों की राजनीति की लड़ाई थी। विपक्ष ने मुद्दों पर चुनाव लड़ा, विकास पर लड़ा, संविधान बचाने की बात की, बेरोजगारी और महंगाई उठाई। वहीं सत्ता पक्ष ने भावनाओं, धर्म, डर और मीडिया मैनेजमेंट के सहारे पूरा मैदान पलट दिया।

अगर समीक्षा करनी है, तो पहले सच दर्ज किया जाए—कि विपक्ष मुद्दों पर लड़ रहा था और सत्ता पूरी ताकत से ध्रुवीकरण व मशीनरी के सहारे मुकाबले में थी। उसके बाद चाहे संगठन की कमी गिनो, चाहे स्थानीय नेतृत्व पर सवाल उठाओ—लेकिन असल सच्चाई से भागना नहीं चाहिए।क्योंकि जब समीक्षा सच छुपाती है, तो हार विपक्ष की नहीं होती—हार लोकतंत्र की होती है।

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