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सोने की चमक में डूबता भारत: बढ़ते आयात, गिरता रुपया और बाहरी कर्ज का विस्फोट—आख़िर कब टूटेगा यह आर्थिक चक्रव्यूह?

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प्रोफेसर शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 29 नवंबर 2025

भारत आज एक गहरे आर्थिक चक्रव्यूह में फँसा हुआ है, जिसकी जड़ें सिर्फ रुपये के गिरने में नहीं, बल्कि उसकी अनियंत्रित आयात-भूख में दबी हुई हैं। देश जिस तरह सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, लग्जरी वस्तुओं और उपभोग-प्रधान उत्पादों के आयात पर निर्भर हो गया है, उसने उसकी बाहरी आर्थिक स्थिति को खतरनाक ढंग से कमजोर कर दिया है। रुपया 89.50 के पार जा चुका है, और हर सप्ताह नए निचले स्तर पर गिर रहा है, पर राजनीतिक-आर्थिक बहसें सिर्फ “रुपया 90 कब पहुँचेगा” पर अटकी हुई हैं। असली सवाल यह है कि भारत की आर्थिक प्रणाली आज बाहरी उधार, आयात आधारित खपत और निर्यात में ठहराव के दम पर कितनी दूर चल सकती है? जून 2025 तक भारत का बाहरी कर्ज 747.2 अरब डॉलर पर जा पहुँचा — एक साल में 69 अरब डॉलर की बढ़ोतरी। 2014 में डॉलर 60.95 रुपये में मिलता था, और ग्यारह साल बाद वह 90 के करीब है। GDP चाहे जितनी चमके, अगर वह वृद्धि विदेशी उधार और आयात में डूबे समाज पर खड़ी है, तो वह खोखली है। यह मॉडल किसी भी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक सहारा नहीं दे सकता।

भारत के आर्थिक संकट का सबसे खतरनाक प्रतीक बना है स्विट्जरलैंड। भारत–EFTA व्यापार समझौते को भले ही “ऐतिहासिक उपलब्धि” बताकर पेश किया जाए, लेकिन जमीन पर सच्चाई यह है कि वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने स्विट्जरलैंड को सिर्फ 1.51 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि उससे 22.4 अरब डॉलर का आयात कर लिया—यानि 21 अरब डॉलर का जबड़ा तोड़ घाटा! और यह घाटा लगभग पूरी तरह सोने के कारण है। दुनिया का सबसे बड़ा सोना रिफाइनिंग केंद्र स्विट्जरलैंड भारत को पॉलिश्ड सोना बेच कर अरबों डॉलर कमा रहा है, जबकि भारत का उपभोक्ता और ज्वेलरी उद्योग इसे गले लगाकर खरीद रहा है। पिछले चार सालों में भारत–स्विट्जरलैंड व्यापार की वार्षिक वृद्धि भले ही 4.62% रही हो, पर इसका पूरा फायदा स्विट्जरलैंड को हुआ। भारत सिर्फ खरीद रहा है, बेच नहीं रहा। इसका नतीजा है चालू खाते का घाटा बढ़ना, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और रुपया लगातार कमज़ोर होना। सोने का आयात इतना बेकाबू है कि वह अकेला ही बाहरी आर्थिक संतुलन बिगाड़ने में सक्षम हो चुका है।

चीन के साथ स्थिति इससे भी भयावह है। वित्त वर्ष 2024–25 का भारत–चीन व्यापार घाटा 99 अरब डॉलर तक पहुँच गया है—ऐसे समय में जब भारत चीन से एक बूंद कच्चा तेल भी नहीं खरीदता। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर पार्ट्स, दवाइयों का कच्चा माल और हजारों तरह के उपभोक्ता उत्पाद चीन से भारत में बाढ़ की तरह आ रहे हैं। सरकार चाहे बातचीत करे, रोक लगाए, ड्यूटी बढ़ाए, “आत्मनिर्भरता” के नारे दे—लेकिन हकीकत यह है कि घरेलू उद्योग न गुणवत्ता में प्रतिस्पर्धी है, न कीमत में। पिछले एक साल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 16 अरब डॉलर निकाल लिए, जिससे रुपये को और बड़ा झटका लगा। आयात महंगा हुआ, महंगाई बढ़ी, विदेशी कर्ज की लागत बढ़ी, और फिर रुपये पर नया दबाव… यह दुष्चक्र हर महीने और गहराता जा रहा है।

सबसे चिंता की बात यह है कि इस आयात में बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह गैर-जरूरी वस्तुओं का है—सोना, चांदी, स्मार्टफोन, प्रीमियम टीवी, लग्जरी घड़ियाँ, ब्रांडेड कपड़े-जूते, महंगे फर्नीचर, खिलौने, चॉकलेट, ड्राई फ्रूट्स… यह सभी उपभोग बढ़ाते हैं, पर अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करते। ये न उत्पादन बढ़ाते हैं, न निर्यात को सहारा देते हैं, न रोजगार को। सरकार कई बार आयात शुल्क बढ़ाकर, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर लगाकर, इलेक्ट्रॉनिक्स पर प्रतिबंधों के जरिए इनके आयात को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन नतीजा शून्य। और सबसे चौंकाने वाली बात—जब सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाया, तब सोने को “छूट” दे दी गई! यह बताता है कि नीति-निर्माताओं में सोने के आयात को रोकने की इच्छाशक्ति ही नहीं। इसका कारण वे प्रभावशाली कारोबारी नेटवर्क हैं जिनके हाथों में यह कारोबार केंद्रित है और जिन पर सरकार हाथ डालना नहीं चाहती।

सच्चाई यह है कि रुपये का 90 या 100 पर पहुँचना कोई आकस्मिक हादसा नहीं है। यह उन दशकों पुरानी गलत प्राथमिकताओं का नतीजा है, जिसने भारत को उपभोग-प्रधान, आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था में बदल दिया है। भारत ने निर्यात-आधारित विकास मॉडल को कभी गंभीरता से अपनाया ही नहीं। जब तक भारत गैर-जरूरी आयात पर कठोर अंकुश नहीं लगाएगा, घरेलू विनिर्माण को वास्तविक रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं बनाएगा, और निर्यात की झोली को सिर्फ दवाओं, कपड़े और पेट्रोलियम उत्पादों से आगे नहीं बढ़ाएगा—तब तक यह देश कमजोर रुपये, बढ़ते बाहरी कर्ज और अस्थिर आर्थिक भविष्य से निकल नहीं सकता।

7–8% GDP वृद्धि सुनने में शानदार लगती है, लेकिन अगर इसकी कीमत विदेशी कर्ज, गिरते रुपये और कमजोर होती आर्थिक संप्रभुता के रूप में चुकानी पड़े, तो यह वृद्धि एक झूठी चमक है। भारत को अब यह तय करना होगा कि वह स्विट्जरलैंड के सोने में चमकता रहेगा या अपनी आर्थिक संप्रभुता को बचाएगा। अगर हमने अपनी उपभोक्तावादी भूख को नियंत्रित न किया, तो जिस चमक को हम आज हाथ में लेकर घूम रहे हैं, वही एक दिन रुपये के ताबूत में कील बन जाएगी।

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