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राहुल के 7 घंटे के धरने का असर: पैलेट गन मामले में पुलिस ने दर्ज की FIR

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अगस्त 2026

साहिल की शिकायत पर FIR नहीं, थाने के बाहर बैठे राहुल

दिल्ली में 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पैलेट गन से घायल हुए 19 वर्षीय छात्र साहिल लोहचब के मामले ने शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी साहिल की शिकायत पर FIR दर्ज कराने की मांग को लेकर दिल्ली में धरने पर बैठ गए। करीब सात घंटे तक चले धरने के बाद पुलिस ने आखिरकार संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर FIR दर्ज कर ली। सवाल यह है कि अगर शिकायत में गंभीर चोट और आंख की रोशनी जाने जैसी बात सामने थी, तो FIR दर्ज करने में इतना समय क्यों लगा?

आंख की रोशनी गई, फिर भी FIR के लिए संघर्ष

साहिल लोहचब की उम्र महज 19 साल है। 20 जुलाई को संसद की ओर निकले प्रदर्शन के दौरान पैलेट लगने से उनकी एक आंख की रोशनी चली गई। साहिल का आरोप था कि उन्होंने पुलिस में शिकायत देकर कार्रवाई और FIR की मांग की, लेकिन उनकी शिकायत पर मामला दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद राहुल गांधी ने मामले को सीधे पुलिस और सरकार के सामने उठाने का फैसला किया। राहुल गांधी साहिल और उनकी मां के साथ पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और FIR दर्ज करने की मांग की।

पहले थाने से डीसीपी कार्यालय तक पहुंचे राहुल

मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। राहुल गांधी पहले मंदिर मार्ग थाने पहुंचे, लेकिन वहां शिकायत दर्ज नहीं होने के बाद वे संसद मार्ग स्थित डीसीपी कार्यालय पहुंचे। पुलिस अधिकारियों से बातचीत के बावजूद तत्काल FIR दर्ज नहीं हुई। इसके बाद राहुल गांधी ने वहीं धरना शुरू कर दिया। उनका साफ कहना था कि जब एक युवक की आंख की रोशनी चली गई है और वह पुलिस से शिकायत कर चुका है, तो उसके मामले में FIR दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी है।

सात घंटे बाद बदला पुलिस का रुख

राहुल गांधी के करीब सात घंटे के धरने के बाद पुलिस ने आखिरकार FIR दर्ज कर ली। पुलिस की इस कार्रवाई ने पूरे मामले को नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ दे दिया है। अब जांच का सवाल यह है कि 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल किस परिस्थिति में किया गया, किसके आदेश पर किया गया और क्या बल प्रयोग तय नियमों के मुताबिक था। FIR दर्ज होने के बाद इन सवालों की जांच का रास्ता खुल गया है।

CRPF की जांच में पैलेट गन के इस्तेमाल का खुलासा

इस मामले में पहले ही केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF की जांच सामने आ चुकी है। जांच के मुताबिक कनॉट प्लेस इलाके में तैनात रैपिड एक्शन फोर्स के एक जवान ने पैलेट गन से सात राउंड फायर किए थे। इनमें से पांच राउंड प्रदर्शनकारियों को लगे, जबकि दो जमीन पर गिरे। जांच में यह भी सामने आया कि बल प्रयोग के लिए क्रमिक प्रक्रिया अपनाने के निर्देश थे और पैलेट गन जैसे हथियार का इस्तेमाल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

अस्पतालों के रिकॉर्ड ने भी बढ़ाए सवाल

पैलेट गन से चोट लगने की बात केवल प्रदर्शनकारियों के आरोप तक सीमित नहीं है। RTI के जरिए सामने आए अस्पतालों के रिकॉर्ड के अनुसार लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में नौ लोगों का पैलेट या प्रोजेक्टाइल चोटों का इलाज हुआ, जबकि सफदरजंग अस्पताल में भी एक व्यक्ति का इलाज दर्ज है। यानी दो बड़े अस्पतालों के रिकॉर्ड में कम से कम 10 लोगों के पैलेट संबंधी चोटों के इलाज की पुष्टि होती है।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भी मामला

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अदालत ने घायलों के इलाज से जुड़े रिकॉर्ड के साथ-साथ सुरक्षा बलों के गोला-बारूद लॉग, CCTV फुटेज और दूसरे महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। 20 जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े मामलों की जांच क्राइम ब्रांच के पास है, जबकि बल प्रयोग की परिस्थितियों की जांच के लिए हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी भी काम कर रही है।

अब सवाल सिर्फ FIR का नहीं, जवाबदेही का है

FIR दर्ज होने के बाद राहुल गांधी का तत्काल लक्ष्य पूरा हुआ, लेकिन असली सवाल अब शुरू होता है। जांच में यह तय करना होगा कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन चलाने की जरूरत वास्तव में थी या नहीं, आदेश किस स्तर से आया, नियमों का पालन हुआ या नहीं और जिन लोगों को चोट लगी, उनकी जिम्मेदारी किसकी बनती है। खास तौर पर उस 19 वर्षीय छात्र के मामले में, जिसकी एक आंख की रोशनी चली गई, अब केवल FIR दर्ज होना पर्याप्त नहीं होगा।

धरने ने खोल दिया बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने दिल्ली पुलिस और सरकार के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी गंभीर शिकायत पर कार्रवाई के लिए एक घायल छात्र को नेता प्रतिपक्ष के साथ धरने पर बैठना जरूरी है? अगर सात घंटे के राजनीतिक दबाव के बाद FIR दर्ज हो सकती है, तो फिर साहिल की शिकायत पहले ही क्यों नहीं दर्ज की गई? अब जांच सिर्फ पैलेट गन चलाने की नहीं, बल्कि FIR में हुई देरी की भी होनी चाहिए। क्योंकि कानून का भरोसा तभी कायम रहेगा, जब शिकायत लेकर थाने पहुंचने वाले आम नागरिक को न्याय के लिए सड़क पर उतरने की जरूरत न पड़े।

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