ओपिनियन | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 22 अगस्त 2026
एथेनॉल नीति: एक समस्या का समाधान या कई नई समस्याएं?
भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति इसलिए शुरू की थी ताकि कच्चे तेल के आयात पर देश की निर्भरता कम हो, किसानों को अतिरिक्त बाजार मिले और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो। विचार अपने आप में गलत नहीं था। लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके पूरे असर से तय होती है। आज सवाल यह है कि क्या एथेनॉल नीति को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले उसके असर का पूरा हिसाब किया गया? गन्ना, चीनी, चावल, मक्का, पानी, पशु चारा और खाद्य सुरक्षा—इन सभी पर इस नीति का असर पड़ रहा है। जिस नीति को पेट्रोल का आयात कम करने के उपाय के रूप में देखा गया था, वह अब खाद्य कीमतों और किसानों की लागत से भी जुड़ गई है। इसलिए अब केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिल सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि एथेनॉल के कारण देश को कुल आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत कितनी चुकानी पड़ रही है।
चीनी की कीमत बढ़ रही है, सवाल एथेनॉल पर भी
भारत आजादी के बाद से लंबे समय तक चीनी का बड़ा उत्पादक और कई वर्षों में निर्यातक देश रहा है। ऐसे में देश का फिर से चीनी आयात की ओर बढ़ना गंभीर सवाल खड़े करता है। चीनी की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार 18 अगस्त 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 52.3 रुपये प्रति किलो थी, जो एक साल पहले की तुलना में लगभग 13 प्रतिशत अधिक है। जुलाई में भी खुदरा कीमतों में करीब 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
यह बढ़ोतरी केवल घर के बजट को प्रभावित नहीं करती। मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ, चॉकलेट, आइसक्रीम, बेकरी और दूसरी खाद्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ती है। यानी चीनी महंगी होती है तो उसका असर केवल चाय में डालने वाली चीनी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बाजार में बिकने वाले कई तैयार उत्पादों की कीमत पर भी पड़ता है। ऐसे समय में जब आम परिवार पहले से महंगाई का सामना कर रहा है, सरकार को यह देखना होगा कि ऊर्जा नीति के कारण खाद्य महंगाई तो नहीं बढ़ रही।
खाद्य या ईंधन—पहले प्राथमिकता तय करनी होगी
एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का रस, शीरा यानी मोलासिस और दूसरे कृषि उत्पादों का इस्तेमाल होता है। जब गन्ने का एक हिस्सा चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल बनाने में चला जाता है तो स्वाभाविक रूप से चीनी के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। सामान्य परिस्थितियों में यह असर बहुत बड़ा नहीं भी हो सकता, लेकिन जब चीनी का उत्पादन कम हो और बाजार में मांग बनी रहे, तब थोड़ी कमी भी कीमतों को ऊपर ले जा सकती है।
यही वह जगह है जहां “फूड बनाम फ्यूल” का सवाल सामने आता है। जिस जमीन पर खाद्य उत्पादन हो सकता है और जिस पानी से खेती होती है, उसका एक हिस्सा अगर ईंधन बनाने में इस्तेमाल होने वाली फसलों के लिए लगाया जाता है तो सरकार को यह तय करना होगा कि देश की पहली जरूरत क्या है—सस्ता भोजन या सस्ता ईंधन। ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन खाद्य सुरक्षा उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार के लिए पेट्रोल की कीमत जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण रोटी, चावल, दाल, दूध और दूसरी जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमत है।
चीनी का स्टॉक घटा तो आयात करना पड़ा
चीनी के शुरुआती स्टॉक में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका जताई गई है। सरकार ने बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए करीब 10 लाख टन चीनी आयात करने की तैयारी की है। देश में सालाना चीनी की मांग लगभग 280 लाख टन के आसपास बताई जा रही है। इसका अर्थ साफ है—अगर घरेलू उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक मांग के मुकाबले कमजोर पड़ते हैं तो भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर देखना पड़ेगा।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पहले लंबे समय तक चीनी निर्यात करने वाले देशों में रहा है। यदि देश को अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए चीनी आयात करनी पड़ रही है, तो हमें अपनी पूरी गन्ना और एथेनॉल नीति पर फिर से विचार करना चाहिए।
एथेनॉल के लिए कितना कृषि उत्पादन जा रहा है?
भारत में एथेनॉल उत्पादन की क्षमता पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ी है। देश में करीब 1,822 करोड़ लीटर सालाना एथेनॉल उत्पादन क्षमता और लगभग 499 डिस्टिलरी होने की बात सामने आई है। महाराष्ट्र लगभग 396 करोड़ लीटर, उत्तर प्रदेश 331 करोड़ लीटर और कर्नाटक करीब 270 करोड़ लीटर क्षमता के साथ प्रमुख राज्य हैं।
एथेनॉल उत्पादन में चीनी और शीरे के अलावा मक्का और भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के चावल का भी इस्तेमाल होता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार FCI का चावल एथेनॉल उत्पादन में महत्वपूर्ण हिस्सा रखता है। यहां सवाल केवल एथेनॉल उत्पादन का नहीं है। सवाल यह है कि क्या खाद्य भंडार में रखे अनाज को ईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल करना लंबे समय में सही नीति है?
अगर देश में पर्याप्त अनाज है और वह खराब होने की स्थिति में है, तो उसका वैकल्पिक उपयोग समझ में आता है। लेकिन अगर वही अनाज भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी हो सकता है, तो उसे ईंधन में बदलने से पहले बहुत सावधानी बरतनी होगी।
FCI के चावल को लेकर भी गंभीर सवाल
जून 2025 से जून 2026 के बीच FCI द्वारा एथेनॉल डिस्टिलरी को करीब 63.5 लाख टन चावल दिए जाने की जानकारी सामने आई है। इसकी कीमत करीब 14,596.78 करोड़ रुपये बताई गई है। यह चावल लगभग 2,250 से 2,320 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा गया, जो औसत खरीद लागत से काफी कम थी।
अगर सरकारी संस्था किसान से अनाज खरीदने में अधिक पैसा खर्च करती है और फिर उसी अनाज को काफी कम कीमत पर ईंधन उद्योग को देती है, तो यहां सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ का सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसी नीति में पारदर्शिता जरूरी है। सरकार को यह साफ करना चाहिए कि इस पूरी प्रक्रिया में जनता के पैसे का कितना इस्तेमाल हुआ और देश को इससे वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिला।
एथेनॉल उत्पादन बढ़ा, लेकिन क्या उपभोक्ता को फायदा मिला?
2014 के बाद देश की डिस्टिलरी क्षमता में लगभग पांच गुना वृद्धि की बात सामने आई है। यह निवेश और उद्योग के लिए अच्छी खबर हो सकती है। लेकिन किसी भी उद्योग का विस्तार अपने आप में जनता के लिए लाभ का प्रमाण नहीं होता। असली सवाल यह है कि इस विस्तार से आम उपभोक्ता को क्या मिला?
अगर एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को लाभ होता है, लेकिन दूसरी ओर चीनी महंगी होती है, खाद्य वस्तुओं की कीमत बढ़ती है, पानी की खपत बढ़ती है और सरकार को अनाज सस्ता देकर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, तो पूरी नीति का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
एथेनॉल पेट्रोल जितनी ऊर्जा नहीं देता
एथेनॉल को लेकर एक तकनीकी सवाल भी है जिसे आम उपभोक्ता के सामने साफ शब्दों में रखा जाना चाहिए। एथेनॉल जलता है, लेकिन उसमें पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है। सामान्य तौर पर एथेनॉल की ऊर्जा सामग्री पेट्रोल की तुलना में लगभग एक-तिहाई कम मानी जाती है।
इसका मतलब यह है कि समान दूरी तय करने के लिए वाहन को एथेनॉल मिश्रित ईंधन से कुछ परिस्थितियों में अधिक मात्रा में ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। E10 में यह अंतर सीमित हो सकता है, जबकि E20 में प्रभाव अधिक महसूस हो सकता है। इसलिए केवल यह कहना कि पेट्रोल में अधिक एथेनॉल मिलाने से देश का तेल आयात कम होगा, पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी देखना होगा कि वाहन की वास्तविक माइलेज, उपभोक्ता की लागत और इंजन की दीर्घकालीन स्थिति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
पानी का सवाल सबसे बड़ा है
भारत में एथेनॉल नीति की सबसे कम चर्चा होने वाली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण समस्या पानी है। गन्ना पानी की अधिक खपत वाली फसल है। ऐसे देश में जहां कई इलाके पहले ही भूजल संकट का सामना कर रहे हैं, वहां गन्ने के उत्पादन को बढ़ाकर उसे ईंधन में बदलने की नीति पर गंभीर पर्यावरणीय अध्ययन होना चाहिए।
आज अगर पानी की कमी बढ़ती है और आने वाले वर्षों में कुछ क्षेत्रों में खेती प्रभावित होती है तो उसका असर केवल किसान पर नहीं पड़ेगा। इसका असर खाद्य कीमतों, रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरों की खाद्य आपूर्ति तक पहुंचेगा। इसलिए एथेनॉल नीति का मूल्यांकन केवल पेट्रोल पंप तक सीमित रखकर नहीं किया जा सकता।
अमेरिका से मक्का और पशु चारे का सवाल
भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार को लेकर भी एथेनॉल नीति का एक नया पक्ष सामने आया है। अमेरिका अपने मक्का और उससे बने पशु चारे के लिए भारतीय बाजार में अधिक पहुंच चाहता है। भारत ने अमेरिकी मक्का आधारित DDGS यानी पशु चारे के आयात के लिए करीब 5 लाख टन का कोटा मंजूर किया है।
यहां भारत को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना होगा। अमेरिका अपने कृषि उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर सब्सिडी देता है। यदि सस्ता अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत में आता है तो उसका असर भारतीय किसानों पर पड़ सकता है। छोटे किसान अमेरिकी कृषि उद्योग से सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। इसलिए व्यापार समझौते करते समय केवल विदेशी मुद्रा या व्यापार घाटे को नहीं, बल्कि भारतीय किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी ध्यान में रखना होगा।
20 प्रतिशत एथेनॉल लक्ष्य पर फिर विचार जरूरी
मेरी राय में भारत को 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य पर जल्दबाजी में आगे नहीं बढ़ना चाहिए। लक्ष्य बनाना गलत नहीं है, लेकिन लक्ष्य पूरा करने के लिए यदि चीनी महंगी होती है, खाद्य अनाज का इस्तेमाल ईंधन में होता है, पानी का दबाव बढ़ता है और उपभोक्ता को ईंधन से अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तो नीति की समीक्षा जरूरी है।
सरकार को यह भी देखना चाहिए कि एथेनॉल के लिए ऐसी फसल और तकनीक विकसित हो जिससे भोजन और ईंधन के बीच टकराव कम हो। गैर-खाद्य स्रोतों, कृषि अवशेषों और ऐसी तकनीकों पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है जिनमें खाद्य सुरक्षा प्रभावित न हो।
नीति को राजनीति नहीं, आंकड़ों से तय करना होगा
आज जरूरत किसी नीति को केवल इसलिए सही या गलत बताने की नहीं है क्योंकि उसे किसी सरकार ने शुरू किया था। मनमोहन सिंह सरकार के समय शुरू हुई ऊर्जा और जैव-ईंधन से जुड़ी पहलों का उद्देश्य भी यही था कि भारत तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करे और किसानों को अतिरिक्त बाजार मिले। उस दौर की नीतियों की खासियत यह थी कि ऊर्जा, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और योजना को एक साथ देखने की कोशिश की जाती थी। आज भी उसी व्यापक सोच की जरूरत है।
भारत जैसे बड़े देश में ऊर्जा नीति को कृषि नीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पेट्रोल सस्ता करने की कोशिश अगर चीनी महंगी कर देती है तो उसका हिसाब होना चाहिए। एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की कोशिश अगर पानी का संकट बढ़ाती है तो उसका हिसाब होना चाहिए। सरकारी चावल सस्ते में डिस्टिलरी को देने से खजाने को नुकसान होता है तो उसका भी हिसाब होना चाहिए।
अब एक स्वतंत्र और पूरी समीक्षा की जरूरत है
भारत को एथेनॉल नीति की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। नीति आयोग को इसके आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन करना चाहिए। जरूरत पड़े तो विशेषज्ञों, किसानों, ऑटोमोबाइल कंपनियों, वैज्ञानिकों, उपभोक्ता संगठनों और अर्थशास्त्रियों की संयुक्त समिति बनाई जानी चाहिए।
मेरी राय में जब तक ऐसी व्यापक समीक्षा पूरी न हो, तब तक 20 प्रतिशत मिश्रण के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में सावधानी बरतनी चाहिए। अगर किसी नीति का लाभ और नुकसान दोनों हैं तो सरकार को जनता के सामने पूरा हिसाब रखना चाहिए। देश की ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर खाद्य सुरक्षा और किसान की सुरक्षा को कमजोर नहीं किया जा सकता।
भारत को ऐसा ईंधन चाहिए जो देश को ऊर्जा के मामले में मजबूत बनाए, लेकिन इसके लिए जनता को महंगी चीनी, महंगा भोजन, कम माइलेज और बढ़ते पानी के संकट की कीमत न चुकानी पड़े। एथेनॉल का प्रयोग तभी सफल माना जाएगा जब उससे देश, किसान, उपभोक्ता और पर्यावरण—चारों को फायदा हो। फिलहाल सबसे जरूरी काम है—रुकना, आंकड़ों को देखना और पूरी नीति का ईमानदारी से पुनर्मूल्यांकन करना।




