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फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ‘हैंगिंग’ ही रहेगा मौत की सजा देने का तरीका

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अगस्त 2026

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा है। अदालत ने 18 अगस्त 2026 को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फांसी देकर मौत की सजा देने की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फांसी की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखने वाला सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला अभी भी बाध्यकारी है। अदालत ने यह भी कहा कि अभी ऐसा कोई निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि घातक इंजेक्शन जैसे दूसरे तरीके फांसी की तुलना में अधिक मानवीय हैं।

मामला क्या था?

यह याचिका वर्ष 2017 में दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। इसी प्रावधान में मौत की सजा को फांसी के जरिए लागू करने का प्रावधान था।

अब नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में इसका समान प्रावधान धारा 393(5) के रूप में मौजूद है।

याचिका में मूल सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति को मौत की सजा देने के लिए सिर्फ एक ही तरीका—फांसी निर्धारित करना संविधान के उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता से वंचित करने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और उचित होनी चाहिए।

क्या फांसी ‘मानवीय’ तरीका है?

याचिका के पीछे मूल बहस यही थी कि मौत की सजा को लागू करने का तरीका भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और मानवीय व्यवहार की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

दुनिया के कई देशों में मौत की सजा देने के तरीके अलग-अलग रहे हैं। इनमें घातक इंजेक्शन, गैस, गोली मारना और अन्य तरीके शामिल हैं। भारत में हालांकि मौत की सजा को लागू करने का पारंपरिक तरीका फांसी रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले में यह स्वीकार नहीं किया कि उपलब्ध वैज्ञानिक सामग्री के आधार पर कोई दूसरा तरीका फांसी से निश्चित रूप से अधिक मानवीय है।

पिछला फैसला बना आधार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले का भी हवाला दिया। अदालत के मुताबिक, जब तक उस फैसले को पलटने का कोई ठोस आधार नहीं है, वह न्यायिक रूप से बाध्यकारी रहेगा।

इसका मतलब यह है कि फिलहाल भारत में मौत की सजा पाए दोषियों के लिए फांसी देने की व्यवस्था कानूनी रूप से कायम रहेगी।

लेकिन बहस खत्म नहीं हुई

सुप्रीम कोर्ट का फैसला फांसी को कानूनी रूप से बरकरार रखता है, लेकिन मौत की सजा की नैतिकता और उसे लागू करने के तरीके पर बहस खत्म नहीं करता।

एक तरफ तर्क है कि जघन्यतम अपराधों में मौत की सजा समाज और पीड़ितों के लिए न्याय का एक रूप है। दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ता यह सवाल उठाते रहे हैं कि राज्य को किसी व्यक्ति का जीवन समाप्त करने का अधिकार किस सीमा तक होना चाहिए और यदि मौत की सजा दी भी जाए तो उसका तरीका कितना मानवीय हो।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल सवाल मौत की सजा को खत्म करने का नहीं, बल्कि उसे लागू करने के तरीके की संवैधानिक वैधता का था।

फैसले के बाद स्थिति साफ है—भारत में मौत की सजा देने का मौजूदा कानूनी तरीका फांसी ही रहेगा। लेकिन फांसी कितनी मानवीय है और क्या भविष्य में इससे बेहतर तरीका संभव है, इस पर कानूनी, वैज्ञानिक और नैतिक बहस जारी रहने की पूरी संभावना है।

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