देश के राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह से नफरत, हिंसा और वैचारिक आतंक का माहौल पनप रहा है, उस पर कांग्रेस सांसद तंजू पुनिया ने बेबाक और आक्रामक लहजे में तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल दागा कि — “देश में आखिर कौन सी विचारधारा चलेगी — जूते की या कलम की?” इस एक सवाल ने जैसे पूरे सत्ता प्रतिष्ठान को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पुनिया ने कहा कि “जूते की विचारधारा” वाले वो लोग हैं, जो देश की आज़ादी की लड़ाई में कभी शामिल नहीं हुए, जिन्होंने संविधान की प्रतियां जलाईं, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की शव यात्रा तक का अपमान किया, और अब भी उस सोच को ज़िंदा रखे हुए हैं जो समाज के कमजोर तबकों को ऊपर उठते नहीं देखना चाहती। ये वही ताकतें हैं जो आज भी चाहती हैं कि दलित, पिछड़े, गरीब और मजदूर वर्ग दोयम दर्जे की ज़िंदगी जीते रहें, ताकि सत्ता पर सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का कब्जा कायम रहे।
पुनिया ने “कलम की विचारधारा” को देश के असली मार्गदर्शन के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब की सोच यही थी कि समाज के हर वंचित व्यक्ति के हाथ में कलम हो, ताकि वह अपने भाग्य को खुद लिख सके और अपने बच्चों का भविष्य संवार सके। उन्होंने कहा, “जिस देश में कलम की ताकत बढ़ेगी, वहां जूते की हिंसा और डर की राजनीति हार जाएगी।” पुनिया ने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण राजनीतिक बहस नहीं है, बल्कि एक वैचारिक युद्ध है — एक तरफ संविधान में आस्था रखने वाले, सामाजिक न्याय के पक्षधर लोग हैं, और दूसरी तरफ वे हैं जो इतिहास के हर मोड़ पर वंचित वर्गों की तरक्की के खिलाफ खड़े हुए।
सांसद पुनिया ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट परिसर में मुख्य न्यायाधीश (CJI) गवई पर हुए हमले को लेकर भी सत्ताधारी दल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह देश की न्यायपालिका, संविधान और उस विचार पर हमला है जो बराबरी और न्याय की बात करती है। उन्होंने कहा, “CJI गवई पर हमला कोई साधारण हिंसा नहीं, बल्कि यह बाबा साहेब की विचारधारा पर हमला है। यह वही सोच है जो नहीं चाहती कि दलित, पिछड़े और शोषित वर्ग समाज में सम्मानपूर्वक खड़े हों।” पुनिया ने केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर देश के सर्वोच्च न्यायालय तक में अगर हिंसा और हमले पहुंच रहे हैं, तो फिर देश के आम नागरिक की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
बिहार की स्थिति पर बोलते हुए तंजू पुनिया का लहजा और तल्ख हो गया। उन्होंने कहा कि बिहार में आज शिक्षा और अवसर दोनों ही तबकों में बंट गए हैं। दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं दी जाती, अगर मिलती भी है तो बीच में बंद कर दी जाती है, यह कहकर कि “फंड नहीं है।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय में जब जीरो फीस एडमिशन नीति थी, तब हर गरीब बच्चा बिना किसी वित्तीय दबाव के पढ़ सकता था। लेकिन अब स्थिति यह है कि कॉलेज में दाखिला लेने से पहले ही छात्रों से 2 लाख से 10 लाख रुपये तक की फीस ली जाती है और बाद में रिम्बर्समेंट का वादा किया जाता है। पुनिया ने तीखे अंदाज में कहा, “अगर किसी गरीब बच्चे के पास इतने पैसे होते, तो वो सरकारी योजना का इंतजार क्यों करता? वो तो और बेहतर कॉलेज में पढ़ने चला जाता!”
उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब योजनाबद्ध ढंग से किया जा रहा है ताकि दलितों, पिछड़ों और वंचितों को उसी स्तर पर रोके रखा जाए जहाँ वे सिर्फ संघर्ष करें, लेकिन आगे न बढ़ सकें। शिक्षा, रोजगार और स्कॉलरशिप जैसी योजनाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। पुनिया ने कहा कि यह “नीतिगत भेदभाव” नहीं बल्कि “संवैधानिक विश्वासघात” है। यह उसी मानसिकता का हिस्सा है जो चाहती है कि सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में रहे और समाज का बड़ा हिस्सा स्थायी तौर पर निर्भर बना रहे।
कांग्रेस सांसद ने आगे कहा कि आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि सरकार की नीतियाँ किस दिशा में जा रही हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी सर्वेक्षण (NSS) की रिपोर्ट बताती है कि देश में लगभग 20 लाख दलित किसान परिवार ऐसे हैं जो प्रति व्यक्ति दिन के मात्र 50 रुपये से कम पर जीवित हैं। यह आंकड़ा सिर्फ गरीबी का नहीं, बल्कि उस अपमान का प्रतीक है जो समाज के सबसे मेहनती वर्ग को भुगतना पड़ रहा है। वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि दलितों के खिलाफ अपराध में बिहार देश में दूसरे स्थान पर है। यानी सरकारें भाषणों में चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें करें, जमीनी सच्चाई यह है कि दलितों पर अत्याचार और भेदभाव आज भी चरम पर हैं।
बीजेपी पर निशाना साधते हुए पुनिया ने कहा कि यह पार्टी दलितों का इस्तेमाल सिर्फ चुनावों में करती है। उन्होंने कहा, “BJP दलितों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है, चुनाव खत्म होते ही ये वही लोग उन्हें भूल जाते हैं जिनके वोट से सत्ता में आए थे। ये लोग बाबा साहेब का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनके सिद्धांतों की हत्या करते हैं। बीजेपी के लिए दलित सिर्फ एक संख्या है, संवेदना नहीं।” उन्होंने कहा कि सत्ता का यह घमंड, यह सामाजिक असंवेदनशीलता और यह पाखंड ही देश को पीछे धकेल रहा है।
अंत में तंजू पुनिया ने कहा कि कांग्रेस आज भी वही लड़ाई लड़ रही है जो बाबा साहेब ने शुरू की थी — संविधान बचाने की लड़ाई, सामाजिक न्याय की लड़ाई और कलम की ताकत की लड़ाई। उन्होंने कहा, “हम उस भारत के लिए लड़ रहे हैं जहाँ हर बच्चे के हाथ में कलम होगी, जहाँ जूते से डराने वाले नहीं बल्कि ज्ञान से दिशा देने वाले लोग होंगे। यह देश कलम से बदलेगा, जूते से नहीं।”




