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I-PAC प्रकरण — ममता को कानून अपने हाथ में लेने की आदत, सुप्रीम कोर्ट दखल दे : ED

अरिंदम बनर्जी | 12 जनवरी 2026

नई दिल्ली/कोलकाता | पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुंच गया है। I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) कोलकाता प्रकरण में ED ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जांच के दौरान कानून को अपने हाथ में लेने का एक स्पष्ट पैटर्न बना लिया है, जिससे संवैधानिक जांच एजेंसियों के कामकाज में सीधा और गंभीर हस्तक्षेप हो रहा है।

ED ने अपनी याचिका में कहा है कि I-PAC से जुड़े मामलों में जब एजेंसी कानूनी प्रक्रिया के तहत छापेमारी और पूछताछ कर रही थी, उसी समय राज्य प्रशासन और सत्तारूढ़ दल के नेताओं की सक्रिय दखलअंदाजी सामने आई। एजेंसी का दावा है कि इस हस्तक्षेप के कारण न केवल जांच की प्रक्रिया बाधित हुई, बल्कि सबूतों से छेड़छाड़, अधिकारियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बिगड़ने का वास्तविक खतरा भी पैदा हुआ। ED ने इस पूरे घटनाक्रम को “संस्थागत जांच में अभूतपूर्व हस्तक्षेप” करार दिया है।

याचिका में ED ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए कहा है कि कोलकाता हाई कोर्ट में चल रही कार्यवाही के दौरान जिस तरह का माहौल बना, उससे निष्पक्ष और स्वतंत्र सुनवाई संभव नहीं रह गई है। एजेंसी का कहना है कि यदि किसी राज्य का शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठा नेतृत्व जांच एजेंसियों के काम में सीधे हस्तक्षेप करेगा, तो भविष्य में किसी भी संवैधानिक संस्था के लिए कानून के दायरे में रहकर काम करना असंभव हो जाएगा।

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ED के सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। TMC का आरोप है कि ED केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है और पश्चिम बंगाल सरकार को राजनीतिक बदले की भावना से निशाना बनाया जा रहा है। पार्टी का दावा है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी शासित राज्यों को डराने और दबाव में लेने के लिए किया जा रहा है।

यह विवाद अब केवल I-PAC या किसी एक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, और संघीय ढांचे की मर्यादाओं से जुड़ा एक बड़ा संवैधानिक सवाल बन चुका है। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि ऐसे मामलों में राज्य सरकार की भूमिका की सीमा क्या है और जांच एजेंसियों को किस हद तक न्यायिक संरक्षण मिलना चाहिए।

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