मुंबई 25 अक्टूबर 2025
मुंबई के आज़ाद मैदान में वह दृश्य देखने को मिला, जिसने पूरे देश की वैज्ञानिक चेतना को झकझोर दिया है। देशभर के PhD शोधार्थी, जो भारत के नवाचार और विकास की रीढ़ हैं, सड़कों पर बैठे हैं — न किसी राजनीतिक लाभ के लिए, न किसी विशेषाधिकार की मांग के लिए, बल्कि अपनी दो साल से बकाया फेलोशिप के लिए। ये वही छात्र हैं जो खेती, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र में दिन-रात रिसर्च कर रहे हैं ताकि भारत का भविष्य बेहतर बने, किसानों का जीवन सुधरे, और नई तकनीकें गांव-गांव तक पहुंचें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि वही विद्यार्थी, जो ज्ञान के मंदिर में दीप जला रहे हैं, अब भूख और अपमान के अंधेरे में बैठने को मजबूर हैं।
सरकार की बेरुखी, शोध का अपमान
यह विरोध केवल कुछ हज़ार रुपये की फेलोशिप का नहीं है, बल्कि यह नीतिगत संवेदनहीनता के खिलाफ एक मौन युद्ध है। दो वर्षों से इन्हें न तो उनके स्टाइपेंड मिले हैं और न ही किसी मंत्रालय ने उनकी समस्याओं को प्राथमिकता दी है। विकसित देश — चाहे वह अमेरिका हो, चीन या यूरोपीय संघ के सदस्य देश — अपने शोधार्थियों को राष्ट्रनिर्माण की धुरी मानते हैं। वहाँ शिक्षा और अनुसंधान को “राष्ट्र की निवेश योजना” समझा जाता है, जबकि भारत में यह राजनीतिक बजट का बोझ बनकर रह गया है।
राजनीतिक लाभ के लिए धन है, शिक्षा के लिए नहीं
विडंबना देखिए — चुनाव से पहले मुफ्त वितरण योजनाओं और राजनीतिक रिश्वत के लिए अरबों रुपये की घोषणाएँ होती हैं, लेकिन जब बात आती है देश के युवा वैज्ञानिकों की, तो सरकार के खज़ाने खाली हो जाते हैं।
यह दृश्य भारत के लिए शर्मनाक है — वह भारत जो चंद्रयान भेज सकता है, G20 की मेज़बानी कर सकता है, लेकिन अपने शोधार्थियों को दो वक़्त की रोटी की सुरक्षा नहीं दे सकता।
अशिक्षित नेतृत्व, बौद्धिक पतन
यह आंदोलन केवल एक वित्तीय समस्या नहीं, बल्कि एक बौद्धिक संकट का प्रतीक है। जब राजनीति में शिक्षा और तर्क की जगह नारे और जाति ने ले ली हो, तब समाज में विज्ञान और शोध की उपेक्षा होना स्वाभाविक है।
आज जो युवा रिसर्च स्कॉलर सड़कों पर बैठा है, वही कल भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकता था। लेकिन जिस देश में अशिक्षित और अज्ञानप्रिय नेतृत्व को ही पुरस्कार मिलता हो, वहां तर्क, विज्ञान और नवाचार की मौत धीरे-धीरे तय हो जाती है।
आज़ाद मैदान बना ‘विचारों का रणभूमि’
आजाद मैदान केवल एक विरोध स्थल नहीं, बल्कि भारत के विवेक की परीक्षा-भूमि बन गया है। यहां बैठे विद्यार्थी सरकार से नहीं, समाज से सवाल पूछ रहे हैं —क्या हमें अब भी लगता है कि ज्ञान का कोई मूल्य नहीं? क्या शोध केवल भाषणों का विषय रह जाएगा? और क्या भारत अपने ही मेधावी बच्चों को निराशा के गर्त में धकेलता रहेगा?
यह आंदोलन चेतावनी है, गुहार नहीं
यह विरोध एक चेतावनी है — अगर भारत ने अपने शोधार्थियों, वैज्ञानिकों और नवप्रवर्तकों को सम्मान नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ियां ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि ब्रेन डेथ का सामना करेंगी। आज जिन छात्रों को “फेलोशिप” नहीं मिल रही, कल वही “देश की फेल” कहानी लिख सकते हैं।
भारत का भविष्य केवल रॉकेट और बजट में नहीं, बल्कि उन दिमागों में छिपा है जो आज आज़ाद मैदान में बैठे हैं — भूखे, अपमानित, लेकिन अब भी देश के सपने देख रहे हैं।




