अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 5 नवंबर 2025
यूरोप आज कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है — अवैध आव्रजन से लेकर रूस-यूक्रेन संघर्ष की बढ़ती चिंताएँ और जलवायु परिवर्तन से पैदा हुए नए संकट तक। ऐसे समय में एक अनोखा और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला भूभाग यूरोप की सीमाओं का प्राकृतिक प्रहरी बनकर उभर रहा है — पीटलैंड, यानी दलदली पीट वाले विशाल क्षेत्र। ये दलदली इलाके सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र नहीं, बल्कि अब इन्हें सीमा सुरक्षा रणनीति का भाग माना जाने लगा है।
यूरोप के उत्तरी हिस्सों में फैले ये पीटलैंड कई जगहों पर प्राकृतिक बफर ज़ोन की तरह खड़े हैं। इनका भूगोल ऐसा है कि सैनिकों, अवैध घुसपैठियों और तस्करों की आवाजाही को बेहद कठिन और धीमा बना देता है। विशेषकर फिनलैंड और बाल्टिक देशों की सीमाओं पर यह प्राकृतिक रक्षा दीवार की तरह प्रभावी हैं—जहाँ दलदली धरातल भारी सैन्य वाहनों और बड़े समूहों को आगे बढ़ने ही नहीं देता। सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भूभाग किसी भी संभावित हमले या घुसपैठ को समय में रोककर प्रतिक्रिया के अवसर को बढ़ा देता है, बिना किसी अतिरिक्त लागत या तकनीकी साधन के।
यही नहीं, पीटलैंड जल सुरक्षा और जन प्रवासन नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभाते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप के कई क्षेत्रों में बाढ़, सूखे और कृषि हानि से लोगों का विस्थापन बढ़ा है। विस्थापन बढ़ने पर सीमाओं पर दबाव और असुरक्षा दोनों बढ़ते हैं। पीटलैंड पानी को धरती में पकड़कर रखते हैं, भूजल को संतुलित रखते हैं और बाढ़ के जोखिम को घटाते हैं—यानी ये आर्थिक और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित कर अप्राकृतिक प्रवासन को कम कर देते हैं। सुरक्षा विश्लेषणों के अनुसार, यदि पीटलैंड नष्ट होते हैं तो उन क्षेत्रों में सबसे पहले आव्रजन संकट और सीमा जोखिम बढ़ते हुए दर्ज हुए हैं।
यूरोप के कई देशों ने अब समझ लिया है कि रक्षा का भविष्य सिर्फ हथियारों, बाड़ों और सैटेलाइट निगरानी तक सीमित नहीं। प्रकृति भी एक रणनीतिक सहयोगी बन सकती है। इसी सोच के तहत आयरलैंड, स्कॉटलैंड, स्वीडन और जर्मनी जैसे देश बड़े पैमाने पर पीटलैंड पुनर्स्थापन कार्यक्रम चला रहे हैं—इन्हें सुखाने की बजाय फिर से जलयुक्त किया जा रहा है ताकि वे रक्षा और पर्यावरण—दोनों के लिए अधिक कारगर बने रहें। ऐसा इसलिए भी क्योंकि पीटलैंड दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक कार्बन भंडार हैं—अर्थात ये जलवायु सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं।
यूरोपीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इको-सेक्योरिटी मॉडल रक्षा नीति का स्थाई हिस्सा बनेगा। यूरोप की “प्रकृति आधारित सुरक्षा” की यह रणनीति दर्शाती है कि सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि ऐसी प्राकृतिक भौगोलिक बाधाएँ भी जरूरी हैं, जो बिना संघर्ष के खतरे को रोक दें। इस दृष्टि से पीटलैंड सिर्फ दलदली इलाके नहीं — यूरोप की नई सुरक्षा रेखा, एक मौन प्रहरी हैं जो धरती और इंसान दोनों की रक्षा कर रहे हैं।




