अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अगस्त 2026
ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार हुई दोगुनी
ICIMOD की रिपोर्टों के मुताबिक हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया लगातार तेज हो रही है। वर्ष 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की दर दोगुनी होने की बात रिपोर्ट में सामने आई है। वर्ष 1975 के बाद से कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है।
यह केवल पहाड़ों तक सीमित पर्यावरणीय बदलाव नहीं है। हिंदूकुश हिमालय से निकलने वाली नदियां एशिया के विशाल हिस्से की जल व्यवस्था का आधार हैं। इस क्षेत्र से जुड़ा पानी नीचे रहने वाली आबादी की खेती, पीने के पानी और आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
करीब दो अरब लोगों के लिए खतरे की घंटी
हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। यही ग्लेशियर एशिया की कम से कम दस प्रमुख नदी प्रणालियों के स्रोत हैं। इनके पानी पर अरबों लोगों की आजीविका निर्भर करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित लगभग 78 प्रतिशत ग्लेशियर क्षेत्र ऊंचाई के साथ बढ़ते तापमान यानी elevation-dependent warming के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। ICIMOD के महानिदेशक पेमा ग्यात्शो ने इसे वास्तविक समय में सामने आ रहा संकट बताया है।
हर इलाके में खतरा एक जैसा नहीं
ग्लेशियरों के नुकसान का असर पूरे हिमालय में एक समान नहीं है। ICIMOD के अनुसार पूर्वी Hengduan Shan पर्वतों में कुछ क्षेत्रों ने केवल तीन दशकों में अपने ग्लेशियर क्षेत्र का 33 प्रतिशत तक हिस्सा खो दिया है।
वहीं सबसे बड़ा कुल ग्लेशियर क्षेत्र नुकसान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में केंद्रित है। इन तीनों बेसिन में क्षेत्र के 74 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं। इसका अर्थ है कि ग्लेशियरों में होने वाला बदलाव भारत, नेपाल, भूटान, चीन और बांग्लादेश समेत पूरे क्षेत्र की जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
नेपाल में 26 अगस्त को क्या हुआ?
26 अगस्त को नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती हिमालयी इलाके में अचानक पानी और मलबे का बेहद तेज बहाव आया। Bhote Koshi और Trishuli घाटियों में बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हुए।
शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, हिमालय में ग्लेशियर का करीब 600 मीटर चौड़ा हिस्सा टूटकर लगभग 1.2 किलोमीटर नीचे घाटी में गिरा। इसके बाद बर्फ और चट्टानों का मलबा आगे बढ़ा और रास्ते में बड़ी मात्रा में अन्य सामग्री भी अपने साथ लेता गया।
ग्लेशियर टूटा, मलबे ने नदी रोकी और फिर आया सैलाब
संभावित घटनाक्रम को समझें तो ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा नीचे गिरने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा घाटी में पहुंचा। इससे नदी का रास्ता अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो गया और पानी उसके पीछे जमा होने लगा। जब पानी का दबाव इस प्राकृतिक अवरोध से अधिक हो गया तो जमा पानी और मलबा अचानक नीचे की ओर बह निकला।
ऐसी स्थिति में सामान्य बाढ़ की तुलना में कहीं ज्यादा विनाशकारी मलबा-प्रवाह पैदा हो सकता है। हालांकि इस आपदा का अंतिम वैज्ञानिक कारण और घटनाक्रम विस्तृत जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
हिमालय पहले से ही भूकंपीय और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। इसके ऊपर तेजी से बढ़ता तापमान ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से कुछ जगहों पर नई ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं, जबकि बर्फ और चट्टानों की अस्थिरता अचानक भूस्खलन और मलबे के प्रवाह का खतरा बढ़ा सकती है।
इसलिए भविष्य की चुनौती केवल ग्लेशियरों के पिघलने की निगरानी तक सीमित नहीं रहेगी। ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों, पहाड़ी ढलानों और नदी घाटियों को एक साथ निगरानी प्रणाली में शामिल करना होगा।
नेपाल की तबाही भारत के लिए भी चेतावनी
नेपाल की नदियां आगे चलकर भारत में प्रवेश करती हैं। इसलिए हिमालय में होने वाली किसी बड़ी घटना का प्रभाव सीमा के इस पार भी पहुंच सकता है। नेपाल में बाढ़ के बाद भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में नदियों के जलस्तर को लेकर चिंता इसका उदाहरण है।
भारत को नेपाल, भूटान और अन्य हिमालयी देशों के साथ मिलकर ग्लेशियर निगरानी, सैटेलाइट डेटा, मौसम पूर्वानुमान और रियल-टाइम बाढ़ चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी। आपदा के बाद राहत जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पहाड़ों में खतरे का संकेत मिलते ही नीचे बसे लोगों को समय रहते चेतावनी मिल जाए।
चेतावनी महीनों पहले थी, अब कार्रवाई की जरूरत
ICIMOD की रिपोर्टें साफ संकेत देती हैं कि हिमालय तेजी से बदल रहा है। नेपाल की मौजूदा त्रासदी को केवल एक अलग प्राकृतिक आपदा मानकर आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस व्यापक संकट की चेतावनी हो सकती है जिसमें जलवायु परिवर्तन, कमजोर होते ग्लेशियर, अस्थिर पहाड़ और तेजी से बढ़ता मानवीय निर्माण एक-दूसरे के खतरे को बढ़ा रहे हैं।
हिमालय केवल बर्फ और पहाड़ों का विस्तार नहीं है। यह दक्षिण एशिया की जल-व्यवस्था की रीढ़ है। ग्लेशियर सुरक्षित रहे तो नदियां सुरक्षित रहेंगी—और नदियां सुरक्षित रहीं तो करोड़ों लोगों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।




