मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 31 अगस्त 2026
सनी देओल की फिल्म ‘Batwara 1947’ उम्मीद के मुताबिक बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन नहीं कर पाई और अब फिल्म की असफलता की वजह को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अभिनेत्री शबाना आजमी ने फिल्म के कमजोर प्रदर्शन की एक संभावित वजह यह बताई कि शायद दर्शक सनी देओल को एक मुस्लिम किरदार में आसानी से स्वीकार नहीं कर पाए। सनी देओल की दशकों से बनी हुई स्क्रीन इमेज एक ऐसे अभिनेता की रही है, जो एक्शन, राष्ट्रवाद और दमदार संवादों वाले किरदारों के लिए पहचाने जाते हैं। ऐसे में उनका सिकंदर मिर्जा नाम के मुस्लिम किरदार में नजर आना कुछ दर्शकों के लिए उनकी स्थापित छवि से अलग अनुभव हो सकता है। हालांकि, इसे फिल्म के फ्लॉप होने का प्रमाणित कारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसी फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता या असफलता कई कारकों पर निर्भर करती है। दिलचस्प बात यह है कि निर्देशक राजकुमार संतोषी ने खुद शबाना आजमी के इस आकलन से असहमति जताई है और सवाल किया है कि क्या आज भारतीय दर्शक किसी बड़े अभिनेता को दूसरे समुदाय के किरदार में स्वीकार करने की क्षमता खो चुके हैं।
राजकुमार संतोषी ने Variety India से बातचीत में शबाना आजमी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदी सिनेमा के इतिहास का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने अमिताभ बच्चन की ‘Coolie’ का उल्लेख करते हुए कहा कि अमिताभ ने उस फिल्म में मुस्लिम नायक इकबाल की भूमिका निभाई थी और दर्शकों ने उसे स्वीकार किया था। संतोषी ने यह भी याद दिलाया कि मनमोहन देसाई की कई फिल्मों में मुस्लिम नायकों और मुस्लिम पात्रों को प्रमुखता मिली थी। उनका सवाल था कि अगर भारतीय दर्शक पहले किसी बड़े स्टार को उसकी वास्तविक धार्मिक पहचान से अलग एक मुस्लिम किरदार के रूप में स्वीकार कर सकते थे, तो आज ऐसा करना मुश्किल क्यों होना चाहिए। उनके मुताबिक किसी अभिनेता को उसके वास्तविक धर्म और उसके द्वारा निभाए जा रहे काल्पनिक किरदार के बीच अंतर करके देखा जाना चाहिए। उनके तर्क का मूल यही है कि अभिनय की दुनिया में अभिनेता की व्यक्तिगत पहचान और किरदार की पहचान एक नहीं होती।
शबाना आजमी की बात ने क्यों छेड़ी बहस?
शबाना आजमी की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह खुद फिल्म में एक केंद्रीय हिंदू किरदार ‘माई’ की भूमिका निभा रही हैं। फिल्म की कहानी विभाजन के बाद के पाकिस्तान की पृष्ठभूमि में है, जहां सनी देओल का किरदार सिकंदर मिर्जा एक ऐसे घर में पहुंचता है, जो उसे विभाजन के बाद आवंटित किया गया है। वहां उसे पता चलता है कि उस घर में एक हिंदू महिला पहले से रह रही है। इसके बाद सिकंदर मिर्जा उस महिला को धार्मिक कट्टरपंथियों से बचाने की कोशिश करता है। यानी कहानी का केंद्रीय संघर्ष केवल हिंदू-मुस्लिम पहचान का नहीं, बल्कि विभाजन की हिंसा के बीच इंसानियत और दूसरे समुदाय के व्यक्ति की रक्षा करने का भी है।
यही वजह है कि संतोषी शबाना की व्याख्या को स्वीकार करने के बजाय फिल्म के मूल संदेश की तरफ ध्यान खींचते हैं। उनके मुताबिक यदि कहानी एक मुस्लिम व्यक्ति को एक हिंदू महिला की रक्षा करते हुए दिखाती है, तो केवल इस आधार पर फिल्म को खारिज करना कि किरदार मुस्लिम है और अभिनेता की पहचान अलग है, सिनेमा की मूल प्रकृति को सीमित कर देगा। उनके अनुसार दर्शकों को यह देखने की जरूरत है कि कहानी क्या कह रही है और लेखक तथा निर्देशक उस किरदार के जरिए क्या संदेश देना चाहते हैं।
संतोषी ने कहा- समाज पहले से कम सहिष्णु हुआ?
इसी बातचीत में राजकुमार संतोषी ने आज के सामाजिक माहौल को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि समाज पहले की तुलना में कम tolerant और कम inclusive हुआ है। उन्होंने अपनी 2001 की फिल्म ‘Lajja’ का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि क्या आज का समाज उस तरह की धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को उसी सहजता से स्वीकार करेगा, जिस तरह पहले करता था। संतोषी के मुताबिक लोगों की सोच अधिक कठोर और बंद होती जा रही है और इसका असर कला तथा सिनेमा पर भी दिखाई दे सकता है।
हालांकि, संतोषी की बात का अर्थ यह नहीं है कि किसी फिल्म की आलोचना नहीं होनी चाहिए। उनका जोर इस बात पर है कि किसी फिल्म या किरदार का मूल्यांकन उसकी कहानी और मंशा के आधार पर होना चाहिए, न कि अभिनेता की निजी धार्मिक पहचान के आधार पर। उन्होंने खुद कहा कि वह हिंदू हैं, मंदिर जाते हैं और उनके बेटे का नाम राम है, लेकिन इसके साथ ही वह दूसरे धर्मों की अच्छी शिक्षाओं को भी स्वीकार करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने धर्म की मूल भावना को समानता और समावेशिता से जोड़ते हुए कहा कि किसी आस्था का सम्मान करना दूसरे धर्म के प्रति विरोध नहीं है।
‘Coolie’ का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?
संतोषी द्वारा ‘Coolie’ का उदाहरण दिया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिंदी सिनेमा के उस दौर की याद दिलाता है, जब बड़े सितारे धार्मिक और सामाजिक पहचान से अलग-अलग तरह के किरदार निभाते थे। अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार का मुस्लिम किरदार निभाना उस समय दर्शकों के लिए असामान्य नहीं बना। दर्शकों ने अभिनेता को अभिनेता और किरदार को किरदार की तरह देखा। इसी तरह मनमोहन देसाई के लोकप्रिय सिनेमा में हिंदू-मुस्लिम पात्रों के बीच दोस्ती, भाईचारा और साझी संस्कृति को कहानी का हिस्सा बनाया गया।
संतोषी इसी इतिहास के आधार पर आज की स्थिति पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर सिनेमा में एक अभिनेता को पुलिस अधिकारी, सैनिक, मजदूर, राजा, अपराधी, डॉक्टर या किसी दूसरे सामाजिक वर्ग के व्यक्ति का किरदार निभाने की स्वतंत्रता है, तो धार्मिक पहचान वाले किरदारों को लेकर भी वही रचनात्मक स्वतंत्रता होनी चाहिए। सनी देओल का मुस्लिम किरदार निभाना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है; असली सवाल यह है कि वह किरदार कहानी में कितना विश्वसनीय है और दर्शक उससे भावनात्मक रूप से कितना जुड़ पाते हैं।
क्या सचमुच मुस्लिम किरदार ही फिल्म की असफलता की वजह बना?
यह सवाल अभी खुला हुआ है। शबाना आजमी ने इसे एक संभावित वजह के तौर पर रखा है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि ‘Batwara 1947’ केवल इसलिए फ्लॉप हुई क्योंकि सनी देओल ने मुस्लिम किरदार निभाया। बॉक्स ऑफिस पर किसी फिल्म की सफलता में पटकथा, निर्देशन, कहानी की गति, प्रचार, रिलीज का समय, दूसरी फिल्मों से प्रतिस्पर्धा, समीक्षाएं, दर्शकों की शुरुआती प्रतिक्रिया और स्टार की लोकप्रियता समेत अनेक चीजें भूमिका निभाती हैं।
सनी देओल की लोकप्रियता निश्चित रूप से उनकी एक खास स्क्रीन इमेज से जुड़ी है। लंबे समय से दर्शक उन्हें मजबूत, आक्रामक और एक्शन प्रधान भूमिकाओं में देखते आए हैं। ऐसे में एक संवेदनशील, मानवीय और मुस्लिम चरित्र में उन्हें देखना कुछ दर्शकों के लिए उनकी पुरानी छवि से अलग अनुभव हो सकता है। लेकिन यह मान लेना कि पूरी जनता ने उन्हें मुस्लिम किरदार में इसलिए नकार दिया, उपलब्ध जानकारी से साबित नहीं होता। यह एक संभावित व्याख्या है, निर्णायक तथ्य नहीं।
फिल्म की कहानी में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते का संदेश
‘Batwara 1947’ की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि विभाजन के दौरान धर्म के नाम पर पैदा हुई हिंसा के बीच भी इंसानियत के रिश्ते कायम रह सकते हैं। सिकंदर मिर्जा मुस्लिम है और माई हिंदू महिला, लेकिन दोनों के बीच का संबंध केवल धार्मिक पहचान से तय नहीं होता। जब कट्टरपंथी ताकतें माई के लिए खतरा बनती हैं, तो सिकंदर उसकी रक्षा करने के लिए खड़ा होता है। इस तरह फिल्म विभाजन की त्रासदी को केवल दो समुदायों के संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि उस दौर में इंसानियत की परीक्षा के रूप में भी प्रस्तुत करने की कोशिश करती है।
यही वह पहलू है जिसे राजकुमार संतोषी अपनी टिप्पणी के जरिए रेखांकित करना चाहते हैं। उनके मुताबिक अगर फिल्म का संदेश दो समुदायों के बीच नफरत बढ़ाना नहीं बल्कि एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान की रक्षा करना है, तो दर्शकों को उस संदेश को भी देखना चाहिए। उनके लिए किसी कलाकार की निजी धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण किरदार का उद्देश्य और कहानी का संदेश है।
असली सवाल: सनी देओल की छवि या फिल्म की कहानी?
‘Batwara 1947’ को लेकर उठी बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिल्म की असफलता को किस नजर से देखा जाए—क्या सनी देओल की स्थापित ‘एक्शन हीरो’ छवि मुस्लिम किरदार के साथ टकराई, या फिर फिल्म से जुड़े दूसरे रचनात्मक और व्यावसायिक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण रहे? शबाना आजमी की टिप्पणी पहली संभावना की ओर इशारा करती है, जबकि राजकुमार संतोषी इससे असहमत हैं और इसे भारतीय दर्शकों की स्वीकार्यता तथा समाज में बढ़ती असहिष्णुता से जोड़कर देखते हैं।
फिलहाल उपलब्ध बयानों से इतना जरूर स्पष्ट है कि फिल्म का कमजोर प्रदर्शन अब केवल बॉक्स ऑफिस की चर्चा नहीं रह गया है, बल्कि इसने भारतीय सिनेमा में धार्मिक पहचान, स्टार इमेज, अभिनय की स्वतंत्रता और हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की प्रस्तुति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। शबाना आजमी की राय और राजकुमार संतोषी की असहमति इस बहस के दो अलग-अलग पक्ष सामने रखती है। अंतिम निष्कर्ष यही होगा कि दर्शकों ने फिल्म को क्यों नकारा—यह जानने के लिए केवल सनी देओल के मुस्लिम किरदार को जिम्मेदार ठहराने के बजाय फिल्म की कहानी, प्रस्तुति और दर्शकों की वास्तविक प्रतिक्रिया को व्यापक रूप से देखना होगा।




