लेखक: विजय पाठक, एडिटर, जगत विजन
लाल आतंक का सबसे दुर्दांत और रहस्यमयी चेहरा माडवी हिडमा उर्फ देवा आखिरकार ढेर हो गया, लेकिन उसकी मौत ने जितनी राहत सुरक्षा एजेंसियों को दी है, उससे कहीं अधिक गहरे सवाल राजनीति, पुलिस व्यवस्था और नक्सल उन्मूलन रणनीति के सामने खड़े कर दिए हैं। हिडमा सिर्फ एक नक्सली कमांडर नहीं था; वह बस्तर और आसपास के जंगलों में पिछले 25 वर्षों से फैली लाल विचारधारा का प्रतीक था—एक ऐसा प्रतीक जो आदिवासी समाज के भोलेपन और जंगलों की दुर्गमता का फायदा उठाकर पूरे राज्य पर आतंक का साया फैलाने में सफल रहा। उसके नाम पर 150 से अधिक सुरक्षा कर्मियों की हत्या, कई बड़े हमले, विस्फोटक निर्माण, अपहरण और पुलिस बलों पर घात लगा कर हमलों के आरोप हैं। ऐसे व्यक्ति का जीवित पकड़ा जाना भारत के नक्सल उन्मूलन अभियान में सबसे बड़ा मील का पत्थर हो सकता था। लेकिन जो हुआ, उसने पूरी कहानी को संदेहों में घेर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, हिडमा न सिर्फ आत्मसमर्पण के करीब था बल्कि तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सुरक्षा एजेंसियों के बीच उसने बातचीत भी शुरू कर दी थी। बस्तर रेंज के आईजी सुन्दराज ने उसे छत्तीसगढ़ में सरेंडर के लिए लगभग तैयार कर लिया था। इतना ही नहीं, पिछले कुछ दिनों में आंध्रप्रदेश पुलिस ने इंटेलिजेंस इनपुट्स के आधार पर बड़ी संख्या में रेड्स चलाईं, जिसमें 50 से अधिक नक्सली कैडर गिरफ्तार किए गए। इन कार्रवाइयों से हिडमा पर दबाव बढ़ा और उसके सरेंडर की संभावना मजबूत हुई। लेकिन तभी सुकमा के चिंतागुफा थाना क्षेत्र से यह खबर आई कि हिडमा एक एनकाउंटर में मारा गया। यहाँ से सवाल उठते हैं—क्या यह वास्तव में मुठभेड़ थी या एक नियोजित कार्रवाई, जिसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी हो?
सबसे बड़ा संदेह इस बात से पैदा होता है कि हिडमा को कमर के ऊपर गोली मारी गई, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई घिर चुका हो या आत्मसमर्पण की स्थिति में हो, तो पुलिस प्राणघातक हिस्सों पर फायर करने से बचती है। कई जमीनी सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि हिडमा को ‘घेराबंदी’ के नाम पर नहीं, बल्कि ‘नियंत्रित परिस्थितियों’ में मार गिराया गया। यदि वह वास्तव में आत्मसमर्पण करने वाला था तो उसकी जानकारी और नेटवर्क तक पहुँच सबसे बड़ी उपलब्धि होती—लेकिन शायद यही बात कई शक्तियों को असहज कर रही थी। उसके जिंदा रहने से माओवादियों की मनी ट्रेल, विदेशी फंडिंग, राजनीतिक संरक्षण, हथियार आपूर्ति और झीरम घाटी जैसे बड़े मामलों की परतें खुलतीं। यह भी संभव है कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि हिडमा बोले—क्योंकि उसकी आवाज़ कई गुप्त रिश्तों को उजागर कर सकती थी।
राजनीति ने इस मामले को और ज्यादा जटिल बना दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने खुलकर सरकार से सवाल किया कि अगर सुरक्षा बलों ने हिडमा को घेर लिया था, तो आत्मसमर्पण का मौका क्यों नहीं दिया गया? क्या सरकार का उद्देश्य एक बड़ी इंटेलिजेंस सफलता हासिल करना था, या सिर्फ एक “विजय समारोह” आयोजित करना? यह आरोप भी तेजी से फैल रहा है कि राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा ने केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर गृह मंत्री अमित शाह के सामने वाहवाही लूटने के लिए इस ऑपरेशन को जल्दबाज़ी में अंजाम दिया। आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ पुलिस ऑपरेशन नहीं, बल्कि राजनीतिक स्क्रिप्ट का हिस्सा था—और इसी कारण हिडमा की मौत को लेकर रहस्य और गहराता जा रहा है।
बस्तर के आदिवासी समाज में भी यह खबर सहजता से स्वीकार नहीं की जा रही। वर्षों से नक्सलियों द्वारा बरगलाए गए आदिवासी अब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की नीतियों के कारण तेज़ी से मुख्यधारा की ओर लौट रहे हैं। 4000 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, और हिडमा जैसे पोस्टर बॉय का सरेंडर इस परिवर्तन को स्थायी बना देता। यदि हिडमा जीवित पकड़ा जाता, तो बस्तर का लाल इतिहास एक झटके में बदल सकता था—नक्सलियों की कमर टूट जाती, लाल आतंक का नेटवर्क ध्वस्त हो जाता, और झीरम घाटी सहित फोर्स पर हुए सभी बड़े हमलों का सच सामने आ जाता। यह भी स्पष्ट होता कि देश के दुश्मन, विदेशी संगठन और आंतरिक एजेंट कौन हैं जो वर्षों से इस लाल हिंसा को पैसे और हथियारों से पोषित करते रहे।
लेकिन अब, जब हिडमा मर चुका है, तो उसके साथ ही सैकड़ों सच भी दफन हो गए हैं—सच जो भारत के लिए निर्णायक साबित हो सकते थे। यही वजह है कि सवालों की लपटें शांत होने का नाम नहीं ले रहीं। क्या यह एक सच्चा एनकाउंटर था? क्या यह राजनीतिक फैसला था? क्या भारत ने अपने इतिहास के सबसे बड़े सुरक्षा अवसर को खो दिया? और क्या अब बीजेपी आलाकमान गृहमंत्री विजय शर्मा से इन सवालों का जवाब लेगा? इन सवालों का जवाब भविष्य तय करेगा—और बस्तर का कल किस दिशा में जाएगा, यह भी इसी पर निर्भर करेगा।





