Home » Business » भारत में कृषि क्षेत्र की वृद्धि और चुनौतियां

भारत में कृषि क्षेत्र की वृद्धि और चुनौतियां

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

लेखक: आलोक रंजन, वरिष्ठ पत्रकार  | नई दिल्ली 2 सितंबर 2025 | झींगा उद्योग पर संकट की आहट

भारतीय कृषि से जुड़े झींगा (श्रिम्प) उद्योग पर अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ का गहरा असर पड़ सकता है। यह चिंता का विषय है क्योंकि बीते वर्षों में इस क्षेत्र ने तेज़ी से प्रगति की है और अब सवाल यह है कि इन टैरिफ का कितना बड़ा प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, भारतीय झींगा उद्योग में इतनी क्षमता है कि यह मुश्किलों से उबर सकता है।

वैश्विक स्तर पर भारत की उपलब्धियाँ

भारत आज गर्व से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्यपालन उत्पादक, तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और चौथा सबसे बड़ा समुद्री खाद्य निर्यातक है। भारत का योगदान वैश्विक समुद्री खाद्य उत्पादन में 10 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि उन लाखों किसानों और परिवारों की ज़िंदगी से जुड़ा है, जो ग्रामीण और तटीय इलाकों में इस उद्योग पर निर्भर हैं। यही कारण है कि अमेरिकी सरकार का यह निर्णय भारत के लिए चिंता का विषय है।

मत्स्यपालन में भारत की बढ़त

आज दुनिया में जितनी भी मछलियाँ खाई जाती हैं, उनमें से हर दो में से एक मछली ज़मीन से (फार्मिंग से) आती है। भारत में यह अनुपात और भी आगे है—लगभग तीन में से दो मछलियाँ फार्मिंग से प्राप्त होती हैं। यह दर्शाता है कि भारत केवल कदम से कदम नहीं मिला रहा, बल्कि इस क्षेत्र में नेतृत्व कर रहा है। भारत का समुद्री खाद्य निर्यात हर साल 8 अरब डॉलर से अधिक की कमाई करता है, जो इसे देश की अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बनाता है।

चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ

बावजूद इसके, भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र को कई बुनियादी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। किसान कम उत्पादकता, उत्पादन की ऊँची लागत, तालाब प्रबंधन की समस्याएँ और बीमारियों के प्रकोप जैसी दिक़्क़तों से जूझ रहे हैं, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। भारत के मत्स्यपालन की खासियत यह है कि इसका झींगा उत्पादन निर्यात-उन्मुख है, जबकि मछली उत्पादन मुख्य रूप से घरेलू बाज़ार के लिए होता है। झींगा का निर्यात अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान और वियतनाम जैसे देशों में होता है, जबकि भारतीय लोग रोहू, कतला, मृगल, तिलापिया और रूपचंद जैसी मछलियाँ अधिक खाते हैं।

मुनाफ़े में कमी और बाज़ार की समस्याएँ

झींगा उद्योग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसानों को मिलने वाली कीमतें पिछले पाँच वर्षों से लगभग स्थिर हैं, जबकि उत्पादन लागत में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है। इसका सीधा असर उनके मुनाफ़े पर पड़ रहा है। इसके अलावा, बाज़ार तक सीधी पहुँच और प्रभावी नेटवर्क की कमी उद्योग की प्रगति को रोक रही है।

परंपरागत मत्स्यपालन की भूमिका

भारत में मत्स्यपालन कोई नया काम नहीं है। यह हमारी परंपराओं और संस्कृति का हिस्सा रहा है। प्राचीन काल में नदी किनारे बसे गाँवों में लोग तालाबों और नहरों के सहारे मछलियाँ पालते थे। ऋग्वेद से लेकर चरक संहिता तक में मछली पालन और जल आधारित आजीविका का उल्लेख मिलता है। कई स्थानों पर यह सामुदायिक गतिविधि रही, जहाँ गाँव के लोग मिलकर तालाबों का रखरखाव करते और उत्पादन बाँटते थे। यही परंपरा आधुनिक मत्स्यपालन के लिए नींव का काम कर रही है।

सफल राज्य स्तरीय मॉडल

भारत के कुछ राज्यों ने मत्स्यपालन को सफल व्यावसायिक मॉडल में बदल दिया है।

  1. आंध्र प्रदेश: यहाँ झींगा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। आधुनिक तकनीक, निर्यात-उन्मुख नीतियाँ और निजी निवेश ने इसे “श्रिम्प हब” बना दिया है।
  1. पश्चिम बंगाल: यहाँ रोहू, कतला और मृगल जैसी मछलियों की खेती परंपरागत और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर सफल रही है। बंगाल की मछली संस्कृति ने यहाँ के किसानों को आत्मनिर्भर बनाया है।
  1. केरल और तमिलनाडु: बैकवाटर और तटीय क्षेत्रों में मिश्रित मछलीपालन (पॉलीकल्चर) और झींगा-धान खेती का अनोखा मॉडल अपनाया जाता है, जिसने उत्पादन और आय दोनों बढ़ाए हैं।

ये मॉडल दिखाते हैं कि अगर सही तकनीक, सरकारी सहयोग और किसानों की भागीदारी मिले तो मत्स्यपालन न सिर्फ़ घरेलू बाज़ार बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सफलता की कहानी लिख सकता है।

आर्थिक आँकड़े और भविष्य की संभावनाएं

भारत का मत्स्यपालन और झींगा उद्योग आने वाले वर्षों में बहु-अरब डॉलर का क्षेत्र बनने की क्षमता रखता है। वर्तमान में यह क्षेत्र हर साल लगभग 8 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है, और विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर उत्पादन क्षमता, अनुसंधान और निर्यात ढांचे में सुधार हो, तो यह आँकड़ा अगले पाँच वर्षों में 15 से 18 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। इसके अलावा, मत्स्यपालन क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सीधा योगदान देता है—करीब 1.5 करोड़ किसान और मजदूर इस पर निर्भर हैं। घरेलू बाजार में मछली की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे पोषण सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है और प्रोटीन की सस्ती उपलब्धता भी हो रही है। इस तरह यह क्षेत्र न केवल किसानों के लिए रोज़गार और आय का साधन है, बल्कि देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता और पोषण नीति में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

सरकार की पहल और भविष्य की राह

भारत आज ब्लू रिवॉल्यूशन 2.0 की तैयारी कर रहा है, ताकि उत्पादन को दोगुना किया जा सके। इसके लिए सरकार कई प्रगतिशील कदम उठा रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) जैसी योजनाओं के तहत आधुनिक अवसंरचना, अनुसंधान और तकनीकी सुधार में निवेश किया जा रहा है। इन प्रयासों से उम्मीद है कि मत्स्यपालन क्षेत्र की समस्याओं को दूर किया जा सकेगा और इसे वैश्विक स्तर पर और मज़बूत बनाया जा सकेगा।

सुझाव और सिफारिशें

  1. तकनीकी नवाचार: किसानों को आधुनिक तालाब प्रबंधन, जैव सुरक्षा और रोग-नियंत्रण तकनीक से जोड़ना आवश्यक है।
  1. मूल्य स्थिरीकरण: झींगा और मछलियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसे ढांचे पर विचार करना चाहिए।
  1. बाज़ार नेटवर्क: किसानों को सीधे वैश्विक खरीदारों से जोड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और ई-मार्केटिंग को बढ़ावा देना होगा।
  1. अनुसंधान एवं प्रशिक्षण: मत्स्यपालन विश्वविद्यालयों और संस्थानों को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाकर किसानों को प्रशिक्षित करना ज़रूरी है।
  1. परंपरागत ज्ञान का उपयोग: स्थानीय स्तर पर सफल रहे मॉडल को अन्य राज्यों में अपनाकर उत्पादन और आजीविका बढ़ाई जा सकती है।

भारतीय कृषि का यह महत्वपूर्ण हिस्सा केवल निर्यात और आँकड़ों का प्रतीक नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अगर परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक को मिलाकर आगे बढ़ा जाए तो भारत आने वाले वर्षों में न केवल विश्व बाजार में अपनी स्थिति मज़बूत करेगा, बल्कि किसानों के जीवन में भी बड़ा बदलाव ला पाएगा।

 

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments