एबीसी नेशनल न्यूज | 16 जनवरी 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक बार फिर ग्रीनलैंड पर दावा जताने की महत्वाकांक्षा सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बयान के बाद नाटो देशों में बेचैनी साफ नजर आ रही है। खास बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब अमेरिका की ओर से वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़ने से जुड़े सैन्य अभियान की चर्चा हुई और उसके तुरंत बाद ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी पुरानी सोच को दोहराया। इसके चलते नाटो के सदस्य देश इस सवाल से जूझ रहे हैं कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर अमेरिका की आलोचना का जवाब कैसे दिया जाए। ग्रीनलैंड भले ही डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ती जा रही है। अमेरिका का तर्क है कि जैसे-जैसे रूस और चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और दिलचस्पी बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे ग्रीनलैंड की सुरक्षा पश्चिमी देशों के लिए और ज्यादा जरूरी हो जाती है। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए सामरिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद अहम है, हालांकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड के स्थानीय नेतृत्व ने इस दावे को बार-बार खारिज किया है।
नाटो देशों की चिंता इस बात को लेकर है कि अमेरिका ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर दबाव की राजनीति कर सकता है और इसे एक बड़े भू-राजनीतिक मुद्दे के तौर पर आगे बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियां—खासकर आर्कटिक के खनिज संसाधनों, ऊर्जा भंडार और उभरते समुद्री मार्गों को लेकर—पश्चिमी देशों के लिए नई रणनीतिक चुनौती बन गई हैं। आर्कटिक अब सिर्फ बर्फीला इलाका नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का अहम केंद्र बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का ग्रीनलैंड पर दोबारा जोर देना केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की बड़ी रणनीति का हिस्सा है। नाटो के भीतर इस बात पर गंभीर चर्चा चल रही है कि आर्कटिक में सामूहिक सुरक्षा ढांचे को कैसे मजबूत किया जाए, ताकि अमेरिका की आलोचना का जवाब भी दिया जा सके और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित भी किया जा सके।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन—सभी की नजरें इस क्षेत्र पर टिकी हैं। आने वाले वर्षों में आर्कटिक न केवल जलवायु परिवर्तन और संसाधनों का मुद्दा बनेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संघर्ष का सबसे बड़ा अखाड़ा साबित हो सकता है।




