अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/अंकारा | 8 अप्रैल 2026
भारत और भारत तथा तुर्किये के बीच हाल ही में आयोजित उच्चस्तरीय “Foreign Office Consultations (FOC)” ने दोनों देशों के रिश्तों को एक नई दिशा देने का संकेत दिया है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक मतभेदों और वैश्विक समीकरणों के चलते संबंधों में आई ठंडक के बावजूद इस बातचीत में दोनों पक्षों ने व्यावहारिक सहयोग को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संदेश दिया। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है और ऊर्जा, व्यापार तथा सुरक्षा जैसे मुद्दे देशों की विदेश नीति के केंद्र में हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत और तुर्किये का फिर से संवाद की राह पर लौटना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में क्षेत्रीय संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।
बैठक के दौरान सबसे अधिक जोर आर्थिक सहयोग को बढ़ाने पर दिया गया, जिसमें व्यापार और निवेश को नई गति देने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने माना कि द्विपक्षीय व्यापार अभी अपनी वास्तविक क्षमता से काफी नीचे है और इसे कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है। मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को तलाशने पर सहमति बनी। भारत की विशाल बाजार क्षमता और तुर्किये की भौगोलिक स्थिति—जो यूरोप और एशिया के बीच एक सेतु का काम करती है—दोनों देशों के लिए आर्थिक साझेदारी को बेहद लाभकारी बना सकती है। इस संदर्भ में निवेश को आसान बनाने, व्यापारिक बाधाओं को कम करने और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हुई, जिससे भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों का आर्थिक आधार और मजबूत हो सके।
ऊर्जा क्षेत्र भी इस बातचीत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा, जहां दोनों देशों ने पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। तेल और गैस आपूर्ति, ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी जैसे मुद्दों पर साझा रणनीति विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और तुर्किये, जो ऊर्जा ट्रांजिट का एक अहम केंद्र बनता जा रहा है—इन दोनों के बीच सहयोग भविष्य में एक मजबूत ऊर्जा साझेदारी का रूप ले सकता है। साथ ही, सौर और पवन ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी आदान-प्रदान और संयुक्त परियोजनाओं की संभावनाओं पर भी सकारात्मक चर्चा हुई, जो जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है।
सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर भी दोनों देशों ने गंभीरता से विचार-विमर्श किया और यह स्वीकार किया कि आतंकवाद आज भी वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार का दोहरापन नहीं होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना जरूरी है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का सामना करता रहा है, जबकि तुर्किये भी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझता रहा है—ऐसे में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम माना जा रहा है। इस मुद्दे पर सहमति यह दर्शाती है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा सुरक्षा चिंताओं पर दोनों देश साथ आ सकते हैं।
इसके अलावा, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें पर्यटन, शिक्षा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अकादमिक सहयोग को विस्तार देने की बात कही गई। दोनों देशों ने माना कि केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि समाज के स्तर पर भी रिश्तों को मजबूत करना जरूरी है, ताकि दीर्घकालिक भरोसा और समझ विकसित हो सके। भारतीय पर्यटकों के लिए तुर्किये एक लोकप्रिय गंतव्य रहा है, वहीं तुर्किये के नागरिकों में भी भारत की संस्कृति और शिक्षा के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। ऐसे में वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाने, छात्र विनिमय कार्यक्रमों को बढ़ाने और सांस्कृतिक आयोजनों को प्रोत्साहित करने जैसे कदम रिश्तों को नई ऊंचाई दे सकते हैं।
हालांकि, इस सकारात्मक संवाद के बावजूद यह भी स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच कुछ संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे अब भी मौजूद हैं, जिनमें कश्मीर पर तुर्किये के बयान और पाकिस्तान के साथ उसके संबंध शामिल हैं। इन मतभेदों ने अतीत में द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया है, लेकिन हालिया बातचीत से यह संकेत मिला है कि दोनों देश इन मुद्दों को अलग रखते हुए सहयोग के क्षेत्रों को आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रहे हैं। यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है, जिसमें टकराव की बजाय संतुलन और संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है।
इस उच्चस्तरीय बातचीत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत और तुर्किये अब अपने रिश्तों को नई गति देने के लिए तैयार हैं, जहां व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में ठोस प्रगति की संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह कूटनीतिक पहल कितनी स्थायी साबित होती है और क्या दोनों देश अपने मतभेदों को सीमित रखते हुए सहयोग की इस नई दिशा को आगे बढ़ा पाते हैं।




