अंतरराष्ट्रीय डेस्क 8 जनवरी 2026
सऊदी अरब अपनी वायुसेना को नई दिशा देने की तैयारी में है। वह एक साथ दुनिया के सबसे आधुनिक स्टील्थ फाइटर F-35 और किफायती लेकिन भरोसेमंद JF-17 जैसे बिल्कुल अलग स्तर के लड़ाकू विमान हासिल करने की कोशिश कर रहा है। यह कदम सिर्फ हथियारों की खरीद नहीं है, बल्कि सऊदी अरब की सुरक्षा रणनीति, कूटनीति और भविष्य की जंग की सोच को दिखाता है। अगर ये सौदे पूरे होते हैं, तो सऊदी वायुसेना दुनिया की सबसे विविध और लचीली एयर फोर्स में गिनी जा सकती है।
पहले बात करते हैं F-35 की। यह अमेरिका द्वारा बनाया गया पाँचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है, जो रडार से बचने, दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखने और आधुनिक युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है। सऊदी अरब लंबे समय से इस विमान को खरीदने में रुचि दिखा रहा है। अगर अमेरिका इसकी मंज़ूरी देता है, तो यह सऊदी अरब के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि अब तक मध्य-पूर्व में इस स्तर के विमान सीमित देशों के पास ही हैं। F-35 सऊदी अरब को ईरान जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले तकनीकी बढ़त दे सकता है।
दूसरी तरफ है JF-17, जो पाकिस्तान और चीन का संयुक्त रूप से विकसित हल्का लड़ाकू विमान है। यह F-35 जितना हाई-टेक नहीं है, लेकिन कम लागत, आसान रखरखाव और रोज़मर्रा के सैन्य अभियानों के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ इस विमान को लेकर बातचीत कर रहा है। खबरों के मुताबिक, यह सौदा सिर्फ विमानों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसमें पाकिस्तान के कुछ कर्ज़ को माफ करने जैसे आर्थिक समझौते भी शामिल हो सकते हैं। इससे दोनों देशों के रक्षा और रणनीतिक रिश्ते और मज़बूत होंगे।
इन दोनों विमानों को एक साथ खरीदने की सोच अपने आप में खास है। आमतौर पर देश या तो बहुत उन्नत और महंगे विमान चुनते हैं या फिर सस्ते और सीमित क्षमता वाले। लेकिन सऊदी अरब दोनों का संतुलन बना रहा है। F-35 जैसे विमान खास मिशनों, गहरी स्ट्राइक और आधुनिक युद्ध के लिए होंगे, जबकि JF-17 सीमा सुरक्षा, गश्त और सामान्य सैन्य जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इससे हर छोटे-बड़े मिशन में महंगे विमानों का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा।
यह रणनीति सऊदी अरब को आर्थिक और सैन्य दोनों स्तर पर फायदा देती है। एक तरफ वह अमेरिका जैसे बड़े सहयोगी के साथ रिश्ते मजबूत रखता है, दूसरी तरफ पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के साथ भी रक्षा साझेदारी बढ़ाता है। इसका मतलब यह भी है कि सऊदी अरब किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए कई विकल्प खुले रखना चाहता है।
क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज़ से भी यह कदम अहम है। मध्य-पूर्व पहले से ही तनाव और संघर्ष का इलाका रहा है। ऐसे में सऊदी अरब का यह फैसला साफ संकेत देता है कि वह भविष्य की किसी भी चुनौती के लिए खुद को पूरी तरह तैयार करना चाहता है। विविध लड़ाकू विमान बेड़ा उसे लचीलापन, ताकत और रणनीतिक आत्मनिर्भरता देता है। सऊदी अरब अब सिर्फ ताकत दिखाने के लिए नहीं, बल्कि समझदारी से ताकत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। F-35 जैसे अत्याधुनिक विमान और JF-17 जैसे व्यवहारिक विमान मिलकर उसकी वायुसेना को हर हालात में काम आने वाली एक मजबूत शक्ति बना सकते हैं। यह फैसला आने वाले वर्षों में न सिर्फ सऊदी अरब, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की सैन्य तस्वीर को प्रभावित कर सकता है।




