राष्ट्रीय / ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 जून 2026
भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रही है। आज़ादी के बाद भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि वह किसी भी महाशक्ति के दबाव में अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से भारत को ऐसी पहचान दी, जहां राष्ट्रीय हित किसी भी शक्ति-संतुलन से ऊपर थे। इंदिरा गांधी ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिकी दबाव और सातवें बेड़े की धमकियों की परवाह किए बिना निर्णायक नेतृत्व दिखाया। राजीव गांधी ने भारत की वैश्विक भूमिका को नई दिशा दी, जबकि पी.वी. नरसिम्हा राव ने आर्थिक उदारीकरण के दौर में भी विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बनाए रखा। डॉ. मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौता किया, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता अक्षुण्ण रहे। यही कारण था कि विश्व मंच पर भारत को एक आत्मविश्वासी, स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में देखा जाता था।
विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विदेश नीति का यह स्वरूप बदलता दिखाई देता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति संस्थागत कूटनीति से अधिक व्यक्तित्व-आधारित कूटनीति की ओर बढ़ी है। आलोचकों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्यक्तिगत संबंधों, सार्वजनिक आयोजनों और प्रतीकात्मक छवियों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन जब राष्ट्रीय हितों से जुड़े कठिन और संवेदनशील प्रश्न सामने आए, तब सरकार अपेक्षित दृढ़ता नहीं दिखा सकी। विपक्ष का दावा है कि भारत की विदेश नीति पहले की तुलना में अधिक प्रतिक्रियात्मक और कम स्वतंत्र दिखाई देती है।
राहुल गांधी और कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत छवि निर्माण को राष्ट्रीय कूटनीति का पर्याय बना दिया है। उनके अनुसार अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध रखना भारत के हित में है, लेकिन मित्रता और राष्ट्रीय सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। विपक्ष का कहना है कि व्यापारिक समझौतों, टैरिफ विवादों, वीजा नीतियों, मानवाधिकार संबंधी टिप्पणियों और वैश्विक संकटों पर भारत का सार्वजनिक रुख कई बार अपेक्षा से अधिक नरम दिखाई दिया। आलोचकों का तर्क है कि यही कारण है कि अमेरिकी नेतृत्व बार-बार भारत से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बयान देता है, जबकि नई दिल्ली की प्रतिक्रिया अक्सर सीमित और संयमित नजर आती है।
विपक्ष विशेष रूप से हाल के उन घटनाक्रमों की ओर संकेत करता है जिनमें भारतीय नागरिकों, नाविकों और आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा। उनका सवाल है कि यदि किसी अन्य देश की कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की जान जाती है या भारत के रणनीतिक हित प्रभावित होते हैं, तो क्या भारत उतनी ही दृढ़ता से प्रतिक्रिया देता है जितनी पहले देता था? कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि मोदी सरकार कई बार सार्वजनिक रूप से कठोर रुख अपनाने से बचती है ताकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यही कारण है कि राहुल गांधी और विपक्ष के कई नेता प्रधानमंत्री को “कॉम्प्रोमाइज्ड” नेतृत्व का प्रतीक बताते हुए सवाल उठाते हैं कि आखिर भारत की आवाज पहले जैसी मुखर क्यों नहीं सुनाई देती।
आलोचक 2013 के देवयानी खोबरागड़े प्रकरण का भी उल्लेख करते हैं। उस समय अमेरिका में भारतीय राजनयिक के साथ हुए व्यवहार पर भारत के राजनीतिक वर्ग ने एकजुट होकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने कहा था कि भारत कोई “Banana Republic” नहीं है और अमेरिका को बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए। विपक्ष का दावा है कि आज यदि भारतीय नागरिकों या राष्ट्रीय हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो वैसी राजनीतिक दृढ़ता और कूटनीतिक आक्रामकता दिखाई नहीं देती। उनके अनुसार वर्तमान विदेश नीति में प्रतीकों और आयोजनों पर अधिक जोर है, जबकि राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित राजनीतिक इच्छाशक्ति कम दिखाई देती है।
हालांकि सरकार और उसके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि मोदी सरकार के दौरान भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। भारत ने जी-20 की सफल अध्यक्षता की, क्वाड जैसे महत्वपूर्ण मंचों में अपनी भूमिका मजबूत की, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान स्वतंत्र रुख अपनाया और वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में अपनी पहचान बनाई। सरकार समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक कूटनीति केवल टकराव का नाम नहीं है, बल्कि संतुलन, संवाद और व्यावहारिकता का भी नाम है। उनके अनुसार अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ समानांतर रूप से मजबूत संबंध बनाए रखना ही आज की सफल विदेश नीति का प्रमाण है।
इसके बावजूद बहस समाप्त नहीं हुई है। विपक्ष का मानना है कि विदेश नीति का वास्तविक मूल्यांकन विदेश यात्राओं, बड़े आयोजनों और वैश्विक सम्मेलनों से नहीं, बल्कि संकट के समय लिए गए निर्णयों से होना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका का मित्र है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत आज भी उतनी ही स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ अपनी बात कह पा रहा है, जितना वह नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह के दौर में कहता था।
यही वह प्रश्न है जो आज भारतीय राजनीति में विदेश नीति की बहस के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। एक पक्ष इसे सफल कूटनीति और वैश्विक प्रभाव का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे रणनीतिक स्वायत्तता में कमी के रूप में देखता है। लोकतंत्र में इस बहस का होना स्वाभाविक है, क्योंकि अंततः किसी भी विदेश नीति की सफलता का पैमाना यही होता है कि वह राष्ट्रीय हितों, नागरिकों की सुरक्षा और देश के सम्मान की रक्षा कितनी प्रभावी ढंग से कर पाती है।




