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बिहार से बंगाल तक वोटर लिस्ट में खामोशी से बड़ा खेल

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आलोक कुमार | नई दिल्ली 23 नवंबर 2025

बिहार से लेकर बंगाल तक मतदाता सूची में हो रहे बदलावों ने देशभर में राजनीतिक भूचाल ला दिया है। चुनाव आयोग द्वारा लागू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने लोकतंत्र की जड़ों पर ऐसा प्रहार किया है जिसे अब विपक्ष ही नहीं, जनता का बड़ा वर्ग भी “खामोशी में हो रहा सबसे बड़ा चुनावी खेल” कह रहा है। आरोप सीधे-सीधे सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग की ओर इशारा कर रहे हैं कि यह सिर्फ मतदाता सूची की सफाई नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से वोटर बेस बदलने और चुनावी गणित को पलटने की साजिश है। सवाल बड़े हैं—क्या सरकार और चुनाव आयोग मिलकर लोकतंत्र की सबसे अहम नींव, यानी मताधिकार, को कमजोर कर रहे हैं? क्या यह पूरा अभियान सत्ता के अनुकूल मतदाता तैयार करने का गुप्त राजनीतिक हथियार बन चुका है?

बिहार में तो स्थिति इतनी भयावह है कि लाखों लोगों के नाम एक झटके में मतदाता सूची से गायब पाए गए। बताया जा रहा है कि 65 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जिनमें सबसे अधिक प्रभावित वे क्षेत्र हैं जहाँ अल्पसंख्यक, दलित और गरीब तबके के मतदाता बड़ी संख्या में रहते हैं। सीमांचल जैसे इलाकों में 7 से 12 प्रतिशत तक नाम काटे जाने ने यह संदेह और गहरा कर दिया है कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बेहद शातिर तरीके से तैयार किया गया राजनीतिक ऑपरेशन है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर संशोधन का बोझ BLOs और आम नागरिकों पर क्यों लादा गया? क्यों लोगों को अपनी नागरिकता और अस्तित्व साबित करने पर मजबूर किया जा रहा है? क्या यह वोटरों को थकाकर बाहर करने की रणनीति है?

वहीं बंगाल में माहौल और भी खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है। मतुआ समुदाय, दलित समूह और सीमावर्ती क्षेत्रों के मतदाता इस डर में जी रहे हैं कि कहीं उनके नाम सूची से हटाकर उन्हें “संदिग्ध नागरिक” करार न दे दिया जाए। कई लोग यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि उन्हें मतदाता सूची से हटाने के बाद NRC और पहचान विवादों में घसीटा जा सकता है। इतना ही नहीं, 24 परगना जिले में एक ऐसा मामला सामने आया जहां 28 साल से लापता और मृत घोषित व्यक्ति केवल इसलिए वापस आया कि कहीं उसका नाम वोटर लिस्ट से न काट दिया जाए—यह उदाहरण दिखाता है कि SIR प्रक्रिया ने लोगों को किस हद तक भयभीत कर दिया है।

इस बीच चुनाव आयोग और सरकार की चुप्पी और ढीला रवैया सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। आयोग दावा करता है कि यह सुधार प्रक्रिया है, लेकिन सुधार के नाम पर लाखों नाम काट दिए जाएँ और प्रभावित लोगों को कोई जानकारी तक न मिले, तो क्या यह सुधार कहलाएगा या सुनियोजित बहिष्कार? जब कार्यालयों को 24 घंटे खुला रखने के आदेश दिए जाते हैं, BLOs पर असहनीय दबाव डाला जाता है, और अफसर तनाव में मौत तक का शिकार हो रहे हैं, तो यह साफ झलकता है कि इस अभियान की जड़ें प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक हैं। सरकार और आयोग की यह खामोश कार्यप्रणाली लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे बड़ा हमला बनती जा रही है।

अब स्थिति यह है कि पूरे देश में अविश्वास का वातावरण बन चुका है। जनता पूछ रही है—क्या चुनाव आयोग अब निष्पक्ष संस्था नहीं रहा? क्या सरकारी दबाव में वह सत्ता के लिए “अनुकूल मतदाता” चुनने में लगा है? क्या वोटर लिस्ट संशोधन के नाम पर लोकतंत्र का असली खेल मैदान ही बदला जा रहा है? यदि वोटर लिस्ट को मनमाने ढंग से बदला जा सकता है, लाखों नागरिकों को बाहर किया जा सकता है, और यह सब बिना शोर-शराबे खामोशी से होता रहे—तो यह सिर्फ प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे बड़े स्तर पर छेड़छाड़ है। आगे आने वाले चुनावों पर इसका असर गहरा और खतरनाक हो सकता है। अब देश को जवाब चाहिए, और सत्ता तथा आयोग को पारदर्शिता से अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी—वरना यह आरोप इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक घोटाला साबित हो सकता है।

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