अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 31 अगस्त 2026
मौतों का आंकड़ा 788 तक पहुंचा
नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के अनुसार रविवार, 30 अगस्त तक बाढ़ और भूस्खलन में 788 लोगों की मौत हो चुकी थी। आठ प्रभावित जिलों से लगातार शव बरामद किए जा रहे हैं, इसलिए मृतकों की संख्या और बढ़ने की आशंका बनी हुई है। वहीं 2,502 लोग अभी भी लापता हैं। राहत और बचाव दल अब भी उन इलाकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जहां बाढ़ और मलबे के कारण संपर्क टूट गया है। अब तक 9,435 लोगों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला जा चुका है। कई परिवारों के सामने सबसे बड़ी चिंता अपने लापता परिजनों की जानकारी हासिल करना है।
पहचान के बिना मिले शवों का अंतिम संस्कार नहीं, सुरक्षित दफन
बाढ़ ने नेपाल के चितवन जिले में एक और बेहद दर्दनाक स्थिति पैदा कर दी है। बड़ी संख्या में ऐसे शव बरामद हुए हैं जिनकी पहचान अभी नहीं हो पाई है। प्रशासन ने डीएनए नमूने लेने और शवों की पहचान दर्ज करने के बाद कुछ शवों को सामूहिक रूप से दफनाना शुरू किया है। नेपाल में आम तौर पर अंतिम संस्कार दाह संस्कार के जरिए किया जाता है, इसलिए यह व्यवस्था मुख्य रूप से शवों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाई जा रही है, ताकि भविष्य में परिजन पहचान होने पर उन्हें वापस ले सकें। अधिकारियों के अनुसार शवों को सुरक्षित रखने के लिए बड़ी संख्या में फ्रीजर की जरूरत है और नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील की है।
सुरंगों में फंसे मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश
बाढ़ के सबसे मुश्किल बचाव अभियानों में हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे मजदूरों को निकालना शामिल है। नेपाल सरकार के अनुसार 100 से अधिक कर्मचारी अब भी कई सुरंगों में फंसे हो सकते हैं। बचाव दल भारी मशीनों से मलबा हटाने के साथ ड्रिलिंग कर रहे हैं। Trishuli 3A और 3B हाइड्रोपावर परियोजनाओं के आसपास बचाव अभियान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार चार जगहों पर ड्रिलिंग का काम पूरा किया जा चुका है और सुरंग के भीतर सीधे पहुंचकर खोज एवं बचाव अभियान आगे बढ़ाने की तैयारी की गई है। बारिश और नदी के बढ़ते पानी के कारण बचावकर्मियों के लिए हर कदम बेहद जोखिम भरा बना हुआ है।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल की मुश्किल घड़ी में भारत ने राहत और बचाव अभियान में सहायता बढ़ाई है। भारतीय दूतावास के अनुसार भारत ने 68.5 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी है। इसके अलावा तकनीकी विशेषज्ञ, सुरंग बचाव विशेषज्ञ, फोरेंसिक टीम और जरूरी उपकरण भी भेजे गए हैं। 19 सदस्यीय भारतीय फोरेंसिक टीम ने काठमांडू में डीएनए नमूनों के विश्लेषण और मृतकों की पहचान में सहायता शुरू कर दी है। यह मदद ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब बड़ी संख्या में शवों की पहचान करना नेपाल के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत ने सुरंगों में फंसे लोगों को बचाने के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई है।
275 भारतीय भी लापता
नेपाल की आपदा का असर भारतीय नागरिकों पर भी पड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 275 भारतीयों के लापता होने की सूचना सामने आई है। दूसरी ओर चीन की तरफ मौजूद भारतीय नागरिकों को लेकर भी लगातार जानकारी जुटाई जा रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार 403 भारतीय नागरिक सुरक्षित रूप से चीन की ओर से नेपाल पहुंच चुके थे और करीब 500 भारतीय नागरिक चीन की तरफ सुरक्षित बताए गए थे। अलग-अलग राज्यों से भी अपने नागरिकों को वापस लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। असम के आठ लोगों को सुरक्षित बचाया गया है, जबकि राज्य के कुछ अन्य लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। तमिलनाडु से गए यात्रियों में भी कई लोग अब तक संपर्क से बाहर बताए गए हैं।
बाढ़ का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ
नेपाल में बचाव अभियान के बीच खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। NDRRMA ने Bhotekoshi नदी का जलस्तर फिर बढ़ने की चेतावनी दी है। वहीं Trishuli नदी में आई नई बाढ़ ने एक सस्पेंशन ब्रिज को बहा दिया, जिससे कई स्थानीय इलाकों का मुख्य सड़क मार्ग से संपर्क प्रभावित हुआ। भारत के उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में भी प्रशासन ने नेपाल की नदियों में बढ़ते पानी को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों ने लोगों से नदी के किनारे जाने से बचने और किसी भी आपात स्थिति में प्रशासन के निर्देशों का पालन करने को कहा है।
हजारों लोग राहत शिविरों में
बाढ़ से बच निकले लोगों की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई है। हजारों लोग अब अस्थायी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। रासुवा और नुवाकोट में राहत शिविर बनाए गए हैं और स्कूलों तथा सामुदायिक भवनों में भी लोगों के लिए अस्थायी व्यवस्था की गई है। करीब 3,500 विस्थापित लोगों के लिए अस्थायी ठिकाने बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। कई परिवारों के पास कपड़े, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरी चीजें तक नहीं बची हैं। यानी पानी उतरने के बाद भी उनके लिए जिंदगी सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने इस आपदा को हिंदूकुश हिमालय की संवेदनशीलता की गंभीर याद दिलाने वाला बताया है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और स्थानीय समुदाय लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतीय इलाकों में जोखिम बढ़ रहा है। गर्म होता वातावरण ग्लेशियरों और पहाड़ी क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है, जिससे ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ता है। नेपाल की मौजूदा त्रासदी इसलिए केवल राहत और बचाव का मामला नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा और भविष्य की तैयारी का सवाल भी है।
नेपाल के सामने अब लंबी लड़ाई
नेपाल में फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों को ढूंढना, सुरंगों में फंसे मजदूरों को बचाना और मृतकों की पहचान करना है। लेकिन इसके बाद देश के सामने बर्बाद सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं, घरों और आजीविका को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती होगी। 788 मौतें और 2,502 लोगों का लापता होना इस आपदा की भयावहता दिखाता है। बचाव अभियान जारी है और हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीद और चिंता दोनों बढ़ रही हैं। नेपाल के लिए यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि ऐसी मानवीय त्रासदी है जिसके असर से उबरने में वर्षों लग सकते हैं।




