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कावेरी जल विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तमिलनाडु ने कर्नाटक से मांगा 17.604 TMC पानी

तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। तमिलनाडु सरकार ने अदालत से कर्नाटक को 17.604 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) पानी जारी करने का निर्देश देने की मांग की है। राज्य का कहना है कि कावेरी डेल्टा के किसान अपने हिस्से के पानी की कमी से गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। तमिलनाडु ने यह भी मांग की है कि कर्नाटक 26 अगस्त से 8 सितंबर के बीच प्रतिदिन 9,000 क्यूसेक पानी छोड़े। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 31 अगस्त को सुनवाई करेगा।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अगस्त 2026

तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार

तमिलनाडु सरकार ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त हलफनामा दाखिल कर कावेरी नदी से जुड़े जल बंटवारे को लेकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। राज्य के अनुसार 27 अगस्त तक कर्नाटक की ओर से छोड़े जाने वाले पानी में 17.604 TMC का बकाया रह गया है। तमिलनाडु चाहता है कि अदालत कर्नाटक को यह पानी जारी करने का निर्देश दे, ताकि कावेरी डेल्टा के किसानों को राहत मिल सके। राज्य सरकार का कहना है कि पानी की कमी का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है और किसानों को अपने हिस्से का पानी नहीं मिल पा रहा है।

9,000 क्यूसेक पानी छोड़ने की मांग

तमिलनाडु ने केवल जमा बकाया पानी की मांग नहीं की है, बल्कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण यानी CWMA के निर्देश को लागू कराने की भी अपील की है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि कर्नाटक को 26 अगस्त से 8 सितंबर के बीच प्रतिदिन 9,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया जाए। यह निर्देश CWMA की 56वीं बैठक में दिया गया था। तमिलनाडु का कहना है कि निर्धारित मात्रा में पानी मिलने से कावेरी डेल्टा में खेती और किसानों की आजीविका को राहत मिल सकती है।

कावेरी डेल्टा के किसान क्यों परेशान?

कावेरी नदी तमिलनाडु के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए नदी के पानी पर निर्भर हैं। जब नदी में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता तो खेती का पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है। धान जैसी फसलों के लिए समय पर पानी मिलना बेहद जरूरी होता है। तमिलनाडु का तर्क है कि मौजूदा स्थिति में किसानों को उनके हिस्से का पानी नहीं मिल रहा है और इससे कृषि गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ रहा है। इसी वजह से राज्य सरकार चाहती है कि पानी छोड़ने के मुद्दे पर जल्द फैसला हो।

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विवाद की जड़ में पानी का बंटवारा

कावेरी जल विवाद नया नहीं है। कावेरी नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु की ओर बहती है और इसके पानी पर दोनों राज्यों की बड़ी निर्भरता है। मानसून, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और खेती की जरूरत के आधार पर दोनों राज्यों के बीच अक्सर मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। तमिलनाडु का मौजूदा आरोप है कि उसके हिस्से के पानी की कमी को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया।

CWRC और CWMA की भूमिका पर सवाल

तमिलनाडु ने अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि कावेरी जल विनियमन समिति यानी CWRC और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण यानी CWMA ने पानी के जमा बकाये को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा। राज्य का कहना है कि केवल मौजूदा जल प्रवाह को देखकर फैसला नहीं किया जा सकता, बल्कि पहले से बने पानी के बकाये को भी गणना में शामिल करना चाहिए। इसी आधार पर तमिलनाडु ने 17.604 TMC पानी जारी करने की मांग की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस दलील और संबंधित जल प्रबंधन संस्थाओं के फैसलों को किस तरह देखता है।

कर्नाटक के लिए भी चुनौती आसान नहीं

कावेरी का पानी कर्नाटक के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य में किसानों और शहरों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कावेरी बेसिन के जल संसाधनों पर निर्भरता है। इसलिए जब तमिलनाडु अधिक पानी छोड़ने की मांग करता है, तो कर्नाटक के सामने अपने जलाशयों और स्थानीय जरूरतों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती होती है। यही कारण है कि कावेरी का पानी लंबे समय से दोनों राज्यों के बीच संवेदनशील राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा रहा है।

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31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की 31 अगस्त की सुनवाई पर है। तमिलनाडु चाहता है कि अदालत कर्नाटक को बकाया 17.604 TMC पानी जारी करने और CWMA के 9,000 क्यूसेक प्रतिदिन पानी छोड़ने के निर्देश का पालन करने को कहे। दूसरी ओर कर्नाटक की स्थिति और उपलब्ध जल संसाधनों को भी सुनवाई के दौरान महत्व मिलना तय है। अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों की जरूरत, जलाशयों की स्थिति और पहले से तय जल-बंटवारे के नियमों के बीच संतुलन बनाने की होगी।

पानी का सवाल, किसानों की जिंदगी का सवाल

कावेरी विवाद सिर्फ दो राज्यों के बीच पानी के आंकड़ों का मामला नहीं है। इसके पीछे लाखों किसानों की खेती, उनकी आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। बारिश और जलाशयों की स्थिति हर साल अलग होती है, लेकिन पानी की जरूरत बनी रहती है। इसलिए कावेरी जैसे विवादों का स्थायी समाधान केवल तत्काल पानी छोड़ने के आदेशों में नहीं, बल्कि पारदर्शी आंकड़ों, बेहतर जल प्रबंधन और दोनों राज्यों के बीच लगातार संवाद में है। फिलहाल तमिलनाडु की 17.604 TMC पानी की मांग और 9,000 क्यूसेक दैनिक प्रवाह की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह तय होगा कि इस मौसम में कावेरी जल विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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