शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अक्टूबर 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर 18 दिनों तक चले आंदोलन की कहानी सिर्फ नारों, धरनों और प्रशासन के साथ टकराव तक सीमित नहीं रही। इस संघर्ष में छात्राओं ने संगठन, नेतृत्व और एकजुटता की ऐसी भूमिका निभाई, जिसने आंदोलन को लगातार मजबूती दी। मीडिया के सामने छात्रों की बात रखने से लेकर आंदोलनकारियों के लिए पानी और भोजन जुटाने तक, हर मोर्चे पर छात्राएं सक्रिय रहीं।
इस आंदोलन में नौशीन फारूक, हनीना बिन्त उमर और रिदा नौशाद खान जैसी छात्राओं की भूमिका खास तौर पर सामने आई। किसी ने आंदोलन की रणनीति और संवाद की जिम्मेदारी संभाली, किसी ने मुश्किल परिस्थितियों में प्रदर्शनकारियों तक जरूरी सामान पहुंचाया, तो किसी ने भूख हड़ताल पर बैठकर अपनी मांगों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई।
मीडिया के सामने छात्रों की आवाज बनीं नौशीन
27 अक्टूबर को शाम करीब चार बजे केंद्रीय कैंटीन के पास नौशीन फारूक मीडिया से बातचीत की तैयारी कर रही थीं। उनके हाथ में नोट्स थे और वह अपने संबोधन के प्रमुख बिंदुओं को दोहरा रही थीं। उनके आसपास मौजूद साथी छात्राएं और छात्र उन्हें तैयार कराने में जुटे थे। किसी ने माइक ठीक किया तो किसी ने बातचीत के बिंदुओं को लेकर चर्चा की।
यह दृश्य बताता है कि आंदोलन के दौरान छात्राओं ने केवल प्रदर्शन में भागीदारी नहीं की, बल्कि छात्रों की मांगों को सार्वजनिक मंच पर मजबूती से रखने की जिम्मेदारी भी उठाई।
हनीना ने संभाली पानी और भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी
दूसरी ओर हनीना बिन्त उमर भूगोल विभाग से राजनीति विज्ञान विभाग की ओर पानी के गैलन लेकर जा रही थीं। उनके साथ दूसरे छात्र भी पानी और खाने के पैकेट लेकर चल रहे थे। परिसर में लगाए गए नुकीले अवरोधों वाली दीवार के पार आंदोलनकारियों तक जरूरी सामान पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी।
18 दिनों तक चले आंदोलन में ऐसी छोटी-छोटी जिम्मेदारियां बेहद महत्वपूर्ण थीं। जब कैंपस बंद था और निषेधाज्ञा जैसी पाबंदियां लागू थीं, तब प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती थी।
रिदा ने आठ दिन तक जारी रखी भूख हड़ताल
इस आंदोलन में रिदा नौशाद खान की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। वह उन सात छात्रों में शामिल थीं, जिन्होंने भूख हड़ताल शुरू की थी। रिदा ने लगातार आठ दिनों तक अनशन किया।
भूख हड़ताल आंदोलन का सबसे कठिन और जोखिमपूर्ण हिस्सा था। इसके जरिए छात्राओं और छात्रों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि छात्रसंघ की बहाली और अपने अधिकारों की मांग उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
लड़ाई सिर्फ छात्रसंघ चुनाव की नहीं थी
छात्रों की प्रमुख मांग जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लंबे समय से बंद पड़े छात्रसंघ को बहाल करना और चुनाव कराना था। लेकिन आंदोलन के दौरान मुद्दे का दायरा इससे आगे बढ़ गया।
छात्र प्रतिनिधित्व की कमी, कैंपस की परिस्थितियां, प्रशासनिक फैसलों में विद्यार्थियों की भागीदारी और महिलाओं के अधिकार भी इस संघर्ष के महत्वपूर्ण विषय बने। छात्राओं के लिए यह आंदोलन विश्वविद्यालय में अपनी आवाज और हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की लड़ाई भी था।
18 दिनों के आंदोलन के बाद जुलाई 2027 की समय-सीमा
लगातार चले विरोध प्रदर्शन के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जुलाई 2027 तक छात्रसंघ चुनाव कराने की समय-सीमा तय की है। यह आंदोलन की प्रमुख मांगों पर हुई प्रगति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, छात्रों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि घोषित समय-सीमा के अनुसार चुनाव की प्रक्रिया वास्तव में पूरी होती है या नहीं।
छात्र राजनीति में महिलाओं की मजबूत भागीदारी
जामिया के इस आंदोलन ने एक बार फिर दिखाया कि छात्र आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका केवल समर्थन तक सीमित नहीं होती। वे संगठन बनाती हैं, रणनीति तैयार करती हैं, नेतृत्व करती हैं और जरूरत पड़ने पर सबसे कठिन जिम्मेदारियां भी उठाती हैं।
नौशीन, हनीना और रिदा की भागीदारी इस संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। 18 दिनों तक चले आंदोलन की कहानी में उनकी भूमिका यह याद दिलाती है कि विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग के साथ महिलाओं की आवाज, सम्मान और बराबरी का सवाल भी गहराई से जुड़ा हुआ है।



