- आराम हराम है
- जय जवान, जय किसान
- गरीबी हटाओ
- संपूर्ण क्रांति लाओ
- 21वीं सदी का भारत
- हर व्यक्ति को उसका हक़
- आर्थिक सुधार – आत्मनिर्भर भारत की ओर
- जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान
- भारत तेज़ी से बढ़ रहा है
- कनपटी पर कट्टा रखकर
भारत की राजनीति सिर्फ़ सरकारों का इतिहास नहीं है। यह एक अमर गाथा है। यह गाथा नेतृत्व की सोच को नारों में बताती थी। स्वतंत्रता के बाद नारे एक पवित्र शपथ थे। नेहरू का “आराम हराम है” श्रमसाध्य राष्ट्र की नींव था। शास्त्री का “जय जवान, जय किसान” सुरक्षा और अन्नदाता का सम्मान था। इंदिरा गांधी का “गरीबी हटाओ” आर्थिक न्याय की लड़ाई थी। मुरारजी का “संपूर्ण क्रांति लाओ” व्यवस्था परिवर्तन का आह्वान था।
बाद के नारे भी आशा और विज़न से भरे थे। “21वीं सदी का भारत” या “आर्थिक सुधार” में स्पष्ट दृष्टि थी। हर नारा जनता की उम्मीदों को अभिव्यक्त करता था। राजनीति की भाषा प्रेरणा और जन-संवाद की थी।
लेकिन अब यह तस्वीर बदल गई है। यह संवैधानिक विरासत एक अशुभ मोड़ पर है। आशा की भाषा पूरी तरह मर चुकी है। उसकी जगह धमकी और दादागीरी की भाषा आ गई है। यह बदलाव एक जहरीला संकेत है। सत्ता का अहंकार लोकतंत्र के संवाद को समाप्त कर रहा है।
चुनावी मंचों से “कनपटी पर कट्टा रखकर…” जैसे शब्द सुनाई देते हैं। इससे संवैधानिक मर्यादा का क्षरण होता है। नैतिक अनुशासन पूरी तरह खत्म हो चुका है। देश के लोकतंत्र में विमर्श की जगह आतंक स्थापित हो रहा है। यह उस नींव को खोखला कर रहा है जिस पर देश को गर्व है।
लोकतांत्रिक अनुशासन का क्षरण और भय के अखाड़े में मतदाता का संत्रास
यह भाषाई बदलाव महज़ वाक्पटुता की गिरावट या जुबान फिसलने का मामला नहीं है; यह भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति के मौलिक अनुशासन का एक क्रूर और जानबूझकर किया गया क्षरण है, जहाँ विचारधारा की जगह हिंसा का प्रतीक ले लेता है और बहस की जगह भय को उपकरण बना दिया जाता है।
जब किसी नेता की जुबान पर यह भाषा आती है कि “हम तुम्हारे लिए संघर्ष करेंगे” के बजाय अब “कनपटी पर कट्टा रखकर…” काम होगा, तो यह केवल एक बयान नहीं रहता—यह सत्ता द्वारा अपने विरोधियों को डराने, दबाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को एकतरफा बनाने की घिनौनी और खुली घोषणा बन जाती है।
यह शब्दावली इस बात की पुष्टि करती है कि चुनावी मंच अब उम्मीदों के मंदिर नहीं, बल्कि डर और धमकी के अखाड़े बन चुके हैं, जहाँ मतदाता को विकास का विज़न या नीतिगत बहस सुनकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं मिलती, बल्कि उसे हथियार की छाया महसूस करके निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जाता है।
लोकतंत्र से जनता का भरोसा अब जनमत की शक्ति से नहीं, बल्कि एक हथियार की धमकी से जोड़ दिया गया है, जो हमारी राजनीति को एक ऐसे अंधेरे युग में धकेल रहा है जहाँ डर ही सबसे बड़ी चुनावी संपत्ति बन जाएगा। यह एक संवैधानिक विश्वासघात है, एक ऐसा अस्वीकार्य सांस्कृतिक क्षरण जो उस देश के लिए शर्म की बात है जिसने अपने संविधान को संवाद, समानता और स्वतंत्रता जैसे महान मूल्यों पर खड़ा किया था।
बिहार चुनाव 2025 इस विषाक्त राजनीतिक संस्कृति के लिए एक प्रयोगशाला बनने जा रहा है, और यह प्रश्न अब अत्यंत तीखेपन से देश के सामने खड़ा है: क्या हमारी राजनीति प्रेरणा की शक्ति से निकलकर धमकी और ज़बरदस्ती की बर्बरता तक आ चुकी है? क्या सत्ता की भाषा का यह विनाशकारी बदलाव भारतीय लोकतंत्र की पहचान को मौलिक रूप से बदलने की शुरुआत है, जहाँ भविष्य में चुनाव केवल शक्ति प्रदर्शन के आधार पर जीते जाएँगे, न कि जनता के समर्थन से?
क्या मतदाता अब डर महसूस करके निर्णय लेने के लिए विवश कर दिए गए हैं? यह समय केवल राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों को चुनने का नहीं है—यह उस भाषा, उस संस्कृति और उस नैतिक ताने-बाने का चुनाव करने का है जिस पर हम अपने राष्ट्र का भविष्य टिकाना चाहते हैं। क्योंकि लोकतंत्र केवल इस बात से नहीं चलता कि कौन सत्ता में है, बल्कि इस बात से चलता है कि सत्ता कैसे बोलती है और कैसे बर्ताव करती है।
आज, सत्ता की यह भाषा, जो हिंसा और धमकी से भरी है, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक सीधी चुनौती है। इसलिए, हर जागरूक नागरिक के लिए अब यह प्रश्न पूछना ही सबसे बड़ी और सच्ची देशभक्ति है, और इस तात्कालिक खतरे के सामने खड़े होकर यह उद्घोष करना आवश्यक है: कनपटी पर कट्टा रखकर लोकतंत्र न तो चलता है और न ही चल सकता है! इस घोर कलजुग में, इस क्रूर संस्कृति को अस्वीकार करना ही संविधान और राष्ट्र के प्रति हमारा अंतिम कर्त्तव्य है।




