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महंगा पेट्रोल, सस्ता कच्चा तेल: मनमोहन मॉडल बनाम मोदी मॉडल की आर्थिक पड़ताल

विश्लेषण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर बहस नई नहीं है, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद आम जनता को राहत नहीं मिलती, तो स्वाभाविक रूप से सरकार की नीतियों पर सवाल उठते हैं। यही तुलना आज सबसे अधिक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल के बीच की जा रही है। यह तुलना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों, कर ढांचे और आम नागरिक पर पड़ने वाले प्रभाव की भी है।

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कई वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहीं। यहां तक कि एक समय 138 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इसके बावजूद यूपीए सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उपभोक्ताओं का बोझ कम रखने के लिए सब्सिडी और कर नीति का सहारा लिया। उस दौर में तेल विपणन कंपनियों पर अंडर-रिकवरी का बोझ बढ़ा, सरकार को भारी सब्सिडी देनी पड़ी और राजकोष पर दबाव भी आया। इसके बावजूद आम उपभोक्ता को अंतरराष्ट्रीय कीमतों का पूरा बोझ सीधे नहीं उठाना पड़ा। यही कारण था कि ऊंचे कच्चे तेल के बावजूद खुदरा कीमतों में अपेक्षाकृत नियंत्रित वृद्धि देखने को मिली।

इसके विपरीत, 2014 के बाद एक लंबा दौर ऐसा आया जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से काफी नीचे आ गईं। कई बार यह 70 डॉलर, 60 डॉलर और महामारी के दौरान इससे भी नीचे पहुंची। स्वाभाविक अपेक्षा थी कि इसका लाभ सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। लेकिन इसी अवधि में केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कई चरणों में उल्लेखनीय वृद्धि की। इससे केंद्र सरकार को लाखों करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ। बाद के वर्षों में कुछ कटौतियां अवश्य की गईं, लेकिन उपभोक्ताओं को उस स्तर की राहत नहीं मिली जिसकी अपेक्षा कम अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर की जा रही थी।

सरकार का पक्ष यह रहा है कि पेट्रोलियम करों से प्राप्त राजस्व का उपयोग राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे, रक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया गया। सरकार यह भी कहती रही है कि महामारी, वैश्विक आर्थिक संकट और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में इसी अतिरिक्त राजस्व ने अर्थव्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, विपक्ष और कई स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का पर्याप्त लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचाया गया और ऊंचे करों के कारण परिवहन लागत, महंगाई तथा रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि आर्थिक वृद्धि के साथ सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का भी विस्तार हुआ। सूचना का अधिकार, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, खाद्य सुरक्षा कानून और आधार जैसी कई महत्वपूर्ण नीतियां उसी दौर में शुरू हुईं। वैश्विक वित्तीय संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही और भारत को दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता रहा। हालांकि उस सरकार को बढ़ती सब्सिडी, राजकोषीय घाटे और भ्रष्टाचार के आरोपों का भी सामना करना पड़ा, जिनकी राजनीतिक कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी।

नरेंद्र मोदी सरकार ने दूसरी ओर बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) और बड़े पैमाने पर पूंजीगत निवेश को अपनी आर्थिक उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन इसके साथ-साथ बेरोजगारी, महंगाई, बढ़ते सरकारी कर्ज, आय असमानता और ईंधन पर ऊंचे कर लगातार राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बने हुए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने की बजाय कर संग्रह को प्राथमिकता दी।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें पहले की तुलना में कम रहीं, तो क्या जनता को उसी अनुपात में राहत मिली? यही वह सवाल है जिसका उत्तर आज भी करोड़ों वाहन मालिक, किसान, परिवहन क्षेत्र और मध्यम वर्ग तलाश रहे हैं। आर्थिक दृष्टि से यह स्पष्ट है कि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होती; इसमें केंद्र और राज्यों के कर, रिफाइनिंग, परिवहन, विपणन लागत और विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी कर नीति पर सरकार की प्राथमिकताएं अंतिम कीमत को निर्णायक रूप से प्रभावित करती हैं।

तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो मनमोहन सिंह सरकार ने ऊंचे अंतरराष्ट्रीय तेल मूल्यों के दौर में उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी आधारित मॉडल अपनाया, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपेक्षाकृत कम अंतरराष्ट्रीय कीमतों के दौर में कर आधारित राजस्व मॉडल को प्राथमिकता दी। दोनों मॉडलों के अपने-अपने आर्थिक लाभ और चुनौतियां थीं, लेकिन आम नागरिक के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न वही है—उसे पेट्रोल पंप पर कितना भुगतान करना पड़ा और उसकी आय पर उसका क्या प्रभाव पड़ा।

आर्थिक नीतियों का अंतिम मूल्यांकन केवल सरकारी राजस्व या जीडीपी के आंकड़ों से नहीं होता, बल्कि इस बात से भी होता है कि उनका लाभ आम नागरिक के जीवन में कितना महसूस हुआ। यही कारण है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें आज भी भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था के सबसे संवेदनशील मुद्दों में बनी हुई हैं।

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