एबीसी नेशनल न्यूज | 15 जनवरी 2026
भोपाल/जबलपुर। मध्य प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के अवैध उपयोग, कब्ज़े और राजनीतिक दबाव में हुए फैसलों को लेकर पुराने लेकिन बेहद गंभीर सरकारी और कानूनी दस्तावेज़ सामने आए हैं। इन दस्तावेज़ों से साफ होता है कि वक्फ बोर्ड, कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों की वक्फ ज़मीन कौड़ियों के भाव निजी लोगों को सौंप दी गई, वह भी कानून की खुली अवहेलना करते हुए।


उच्च न्यायालय से सरकार तक पहुँचा मामला
मध्य प्रदेश शासन के पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा 27 अगस्त 2010 को जारी पत्र में उल्लेख है कि यह मामला माननीय उच्च न्यायालय में दायर याचिका क्रमांक 13895/2008 से जुड़ा है। इसमें वक्फ संपत्तियों को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की गई थी।
सरकारी पत्र में यह स्वीकार किया गया कि वक्फ बोर्ड ने वर्ष 2001, 2003 और 2006 में ऐसे प्रस्ताव पारित किए, जिनके तहत वक्फ की भूमि पर रह रहे लोगों को किरायेदार मान लिया गया, जबकि वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 56 के अनुसार अधिकतम 3 वर्ष से अधिक का अस्थायी आवंटन ही संभव था। इसके बावजूद न तो विधिवत किरायेदारी बनाई गई और न ही अवधि समाप्त होने के बाद कब्ज़ा हटाया गया।
अवैध कब्ज़े को संरक्षण, कार्रवाई शून्य
दस्तावेज़ बताते हैं कि 26 दिसंबर 2006 के बाद अवधि समाप्त हो जाने के बावजूद अतिक्रमणकारियों के खिलाफ न तो धारा 54 के तहत बेदखली की कार्रवाई शुरू की गई और न ही धारा 55 के तहत मामला कलेक्टर को भेजा गया। इसका सीधा नुकसान वक्फ बोर्ड को राजस्व के रूप में हुआ, जबकि अवैध रूप से रह रहे लोगों को लाभ मिलता रहा।
सरकारी नोट में यह भी कहा गया है कि वक्फ बोर्ड ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं किया और जानबूझकर कार्रवाई टालता रहा।
औकाफ़-ए-शाही भोपाल का खुलासा
औकाफ़-ए-शाही भोपाल के कार्यालय द्वारा भेजे गए पत्र में बताया गया कि विधानसभा में उठाए गए प्रश्न क्रमांक 4596 के जवाब में स्पष्ट है कि चोला रोड, भोपाल स्थित वक्फ मस्जिद बिलकिस जहाँ और वक्फ नुज़हत अफ़ज़ा की जमीन खसरा नंबर 127/128, 181/127, 182/127 और 183/127 पर स्थित है, कुल रकबा करीब 41.83 एकड़।
इस जमीन पर बिना औकाफ़-ए-शाही की अनुमति के कब्ज़े किए गए और कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा इसका व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया गया। पत्र में साफ कहा गया कि ऐसे लोग कभी भी वैध किरायेदार नहीं बनाए गए, इसलिए वे सीधे तौर पर अतिक्रमणकारी हैं।
राजनीतिक दबाव और परिवार को फायदा
21 जनवरी 2007 को जबलपुर से अधिवक्ता एम. ए. हंफी द्वारा वक्फ बोर्ड के चेयरमैन/सीईओ को लिखे गए पत्र में और भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पत्र में कहा गया है कि वक्फ की जमीन रे.1 रुपये और 5 पैसे प्रति वर्गफुट जैसी नाममात्र दर पर अतिक्रमणकारियों को दे दी गई।
इस पूरे फैसले के पीछे तत्कालीन वक्फ बोर्ड के एक सदस्य का प्रभाव बताया गया, जो उस समय मंत्री भी थे और उसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। आरोप है कि बैठक में न तो विधिवत एजेंडा जारी हुआ, न कोरम पूरा था और न ही उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए गए। इसके बावजूद सर्वसम्मति का झूठा दावा कर निर्णय थोप दिया गया।
कानून की खुलेआम अवहेलना
पत्र में यह भी याद दिलाया गया कि 7 अप्रैल 2001 और 18 अक्टूबर 2001 की बैठकों में लगभग 49 एकड़ वक्फ भूमि को भोपाल के हृदय स्थल—काली परेड, चोला, बेरसिया रोड—पर कौड़ियों के भाव सौंप दिया गया, जो वक्फ संपत्तियों को निजी हाथों में देने का सीधा उदाहरण है।
सवाल जो अब भी खड़े हैं
इन दस्तावेज़ों के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल उठते हैं—
1. वर्षों तक अतिक्रमण के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
2. किसके दबाव में वक्फ बोर्ड ने कानून को नजरअंदाज किया?
3. क्या वक्फ संपत्तियों की लूट में राजनीतिक संरक्षण मिला?
4. क्या अब इन फैसलों की समीक्षा और जमीन की वापसी होगी?
सरकारी पत्र, औकाफ़-ए-शाही की रिपोर्ट और अधिवक्ता के पत्र से यह साफ है कि वक्फ संपत्तियों के साथ योजनाबद्ध तरीके से अन्याय हुआ। यह केवल जमीन का मामला नहीं, धार्मिक और सामाजिक ट्रस्ट की संपत्ति के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण है। अब निगाहें इस पर हैं कि क्या शासन और न्यायपालिका इस ऐतिहासिक लूट पर निर्णायक कार्रवाई करती है या फाइलों में दबे ये सच फिर धूल खा जाएंगे।





