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I-PAC रेड विवाद पर ED सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँची: ममता बनर्जी पर जांच में दखल का आरोप, केंद्र-राज्य टकराव गहराया

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एबीसी नेशनल न्यूज 10 जनवरी 2026

नई दिल्ली / कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल लाने वाला I-PAC (Indian Political Action Committee) मामला अब संवैधानिक टकराव के स्तर तक पहुँच गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर मनी लॉन्ड्रिंग जांच में सीधे हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। ED ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य की शीर्ष राजनीतिक और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल कर जांच को बाधित किया गया, जिससे न सिर्फ़ कानून का उल्लंघन हुआ बल्कि केंद्रीय एजेंसी की स्वतंत्रता पर भी सीधा हमला हुआ।

8 जनवरी की रेड से शुरू हुआ पूरा घटनाक्रम

यह विवाद 8 जनवरी 2026 को तब शुरू हुआ, जब ED ने कोलकाता में I-PAC के मुख्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की। यह कार्रवाई Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत चल रही कोयला तस्करी (coal pilferage scam) से जुड़ी जांच का हिस्सा थी। ED का दावा है कि इस घोटाले से हुई करोड़ों रुपये की अवैध कमाई को हवाला चैनलों के ज़रिये I-PAC तक पहुँचाया गया और इसका एक हिस्सा 2022 के गोवा विधानसभा चुनाव में Trinamool Congress (TMC) के लिए दी गई चुनावी सेवाओं के भुगतान में इस्तेमाल हुआ।

ED का आरोप: CM ने खुद मौके पर पहुँचकर सबूत हटाए

ED की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। एजेंसी का कहना है कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं I-PAC कार्यालय और प्रतीक जैन के घर पहुँचीं और वहाँ से महत्वपूर्ण दस्तावेज़, लैपटॉप, मोबाइल फोन और हार्ड डिस्क अपने साथ ले गईं। ED का आरोप है कि राज्य पुलिस की मदद से जांच अधिकारियों को काम करने से रोका गया, जिससे यह मामला केवल प्रशासनिक दखल नहीं, बल्कि “obstruction of justice” और “राज्य मशीनरी के दुरुपयोग” का उदाहरण बन गया।

ED का दावा: यह चुनावी रणनीति नहीं, मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा

ED ने TMC के इस आरोप को सिरे से खारिज किया है कि एजेंसी पार्टी की चुनावी रणनीति चुराना चाहती थी। ED का कहना है कि जिन दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ को जब्त किया जाना था, वे मनी लॉन्ड्रिंग के पैसों की ट्रेल, भुगतान विवरण और संदिग्ध लेन-देन से जुड़े थे। एजेंसी के मुताबिक, छापेमारी पूरी तरह कानूनी, सबूत-आधारित और न्यायिक अनुमति के तहत की गई थी, इसमें कोई राजनीतिक बदले की भावना नहीं थी।

कलकत्ता हाई कोर्ट में अव्यवस्था, सुनवाई टली

इस पूरे घटनाक्रम के अगले ही दिन, 9 जनवरी 2026 को ED ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया। एजेंसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अन्य के खिलाफ CBI जांच और FIR दर्ज करने की मांग की। लेकिन हाई कोर्ट में उस दिन हालात बेहद असामान्य रहे। कोर्टरूम में भारी भीड़, वकीलों के बीच धक्का-मुक्की और अव्यवस्था के चलते जस्टिस सुव्रा घोष ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया और अदालत छोड़ दी। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 14 जनवरी 2026 के लिए तय कर दी गई।

तत्काल राहत न मिलने पर ED सुप्रीम कोर्ट पहुँची

हाई कोर्ट में सुनवाई टलने और तत्काल राहत न मिलने के बाद ED ने 10 जनवरी 2026 को सीधे सुप्रीम कोर्ट में Article 32 के तहत याचिका दाखिल की। इसमें ED ने कहा कि यह मामला केवल एक रेड या एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर हमला है। एजेंसी ने शीर्ष अदालत से मांग की है कि वह राज्य सरकार द्वारा जांच में दखल को रोके और संवैधानिक ढांचे की रक्षा के लिए तत्काल हस्तक्षेप करे।

बंगाल सरकार का पलटवार: सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर दी है, ताकि ED की याचिका पर कोई भी आदेश राज्य का पक्ष सुने बिना न दिया जाए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उन्होंने कोई सबूत नहीं छीने, बल्कि TMC के आंतरिक दस्तावेज़ और चुनावी रणनीति को बचाया, क्योंकि ED BJP के इशारे पर पार्टी की गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रही थी।

ममता की रैली और राजनीतिक संदेश

मामले के बीच 9 जनवरी को ममता बनर्जी ने कोलकाता में एक बड़ी रैली निकाली, जिसमें TMC समर्थकों के साथ-साथ बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के कई कलाकार भी शामिल हुए। ममता ने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया और कहा कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले TMC को डराने और कमजोर करने की साजिश रची जा रही है। TMC का दावा है कि I-PAC पार्टी की अधिकृत रणनीतिक एजेंसी है और उस पर छापा लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला है।

केंद्र-राज्य टकराव और संवैधानिक महत्व

यह मामला केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी को और तीखा बना रहा है। एक तरफ़ केंद्र का दावा है कि कानून अपना काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ़ TMC इसे केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक दुरुपयोग बता रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ़ इस मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि केंद्रीय जांच एजेंसियों की सीमा, राज्य सरकारों की शक्तियों और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे बड़े संवैधानिक सवालों पर भी दूरगामी असर डालेगा।

आगे क्या?

फिलहाल, कलकत्ता हाई कोर्ट में 14 जनवरी 2026 को सुनवाई तय है, लेकिन ED की सुप्रीम कोर्ट याचिका के बाद मामला और जटिल हो गया है। अब देश की सबसे बड़ी अदालत को तय करना होगा कि यह जांच में हस्तक्षेप का मामला है या राजनीतिक टकराव का, और संविधान की कसौटी पर किसका पक्ष टिकता है।

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