महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों पर मंडरा रहा संकट अब और गंभीर हो गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के भावी मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि आरक्षण की 50% सीमा को किसी भी स्थिति में पार न किया जाए। अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि “न लें हमारा इम्तिहान”, यह संकेत देते हुए कि यदि राज्य ने संवैधानिक सीमा की अनदेखी की, तो न्यायपालिका कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। यह चेतावनी केवल शब्दों का प्रहार नहीं, बल्कि राज्य प्रशासन को सीधे-सीधे दायरे में खड़ा करने वाला संवैधानिक अलर्ट है, क्योंकि कई जिलों में स्थानीय निकायों के वार्ड आरक्षण का प्रतिशत 50% से ऊपर जाकर 60% तक रिकॉर्ड किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी की जड़ में वह प्री-पोल डेटा है जिसने खुलकर यह बताया कि महाराष्ट्र के 59 से अधिक निकायों में आरक्षण 50% की सीमा को लांघ चुका है, जबकि पिछला स्पष्ट न्यायिक सिद्धांत—इंदिरा साहनी केस—कहता है कि किसी भी रूप में कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता। यह सीमा केवल तकनीकी दायित्व नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल ढांचे की सुरक्षा है। अदालत ने मेरे शब्दों में नहीं, बल्कि सख्त चेतावनी की भाषा में कहा है कि यदि राज्य राजनीतिक लाभ या प्रशासनिक लापरवाही के चलते इस सीमा को तोड़ता रहा, तो अदालत को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ेगा, जो राज्य के लिए एक बड़ा संस्थागत झटका साबित होगा।
महाराष्ट्र सरकार और राज्य चुनाव आयोग पहले से ही स्थानीय निकाय चुनावों में देरी, डिलिमीटेशन की उलझनों और OBC आरक्षण की पुनर्स्थापना को लेकर दबाव में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया है कि चुनाव चार महीने के भीतर कराए जाएं और नोटिफिकेशन चार सप्ताह में जारी किया जाए। पर जब यह सामने आया कि कई निकायों में आरक्षण का प्रतिशत 50% सीमा से ऊपर है, तो अदालत ने इसे “संवैधानिक आदेश की अवहेलना” माना। यह स्थिति न केवल चुनाव प्रक्रिया को खतरे में डालती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि यदि राज्य ने इसे तुरंत नहीं सुधारा, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया रद्द हो सकती है या कोर्ट की निगरानी में करानी पड़ सकती है—जो किसी भी लोकतांत्रिक राज्य के लिए शर्मनाक स्थिति होगी।
इस चेतावनी के गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। एक ओर राज्य सरकार OBC और सामाजिक न्याय के नाम पर अधिक आरक्षण देने की राजनीतिक बाध्यता में फंसी है, वहीं दूसरी ओर अदालत की 50% सीमा उसे रोक रही है। यह टकराव केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि राजनीति बनाम संविधान की सीधी भिड़ंत है। आरक्षण को बढ़ाने के दबाव, वोट बैंक की मांग और स्थानीय समीकरण—इन सबको संतुलित करते हुए राज्य लगातार फंसता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सामाजिक न्याय महत्वपूर्ण है, लेकिन संवैधानिक मर्यादाओं की कीमत पर नहीं।
अब सवाल यह है कि महाराष्ट्र सरकार अदालत की चेतावनी को गंभीरता से लेती है या टकराव का रास्ता चुनती है। लेकिन अदालत ने जो संदेश दिया है, वह बिल्कुल दो टूक है—“संविधान के खिलाफ जाकर कोई भी सरकार नहीं चल सकती… आरक्षण सीमा तोड़ी, तो परिणाम भुगतने होंगे।” यह चेतावनी न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के लिए संकेत है कि न्यायपालिका आरक्षण कानूनों की सीमा को हल्के में नहीं लेगी।





