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सत्ता के डर पर खुला वार : अखिलेश यादव की अपील, पत्रकार सच के लिए खड़े हों

अनिल यादव  | लखनऊ 17 नवंबर 2025

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार को एक लम्बे पोस्ट के माध्यम से उन पत्रकारों को सराहा, जिनकी पहचान उनकी ज़मीनी समझ और सतह के नीचे दबे सच को उजागर करने की क्षमता के लिए होती है। लेकिन इस सराहना के साथ उन्होंने पत्रकारिता जगत को एक कड़ा संदेश भी दिया—कि सिर्फ छिपे हुए सच को उजागर करना ही नहीं, बल्कि जो अन्याय दिनदहाड़े सबके सामने हो रहा है, उसे बिना डर, बिना दबाव और बिना किसी राजनीतिक व्यापार के सामने लाने का साहस भी दिखाएं। अखिलेश ने कहा कि पत्रकारिता तभी सच में जनहित के साथ खड़ी दिखेगी जब वह उन मुद्दों पर भी बोल सके जिन पर बोलना आज के दौर में सत्ता से टकराना माना जाता है। उन्होंने साफ लिखा कि ऐसी “ईमानदार और दायित्वपूर्ण पत्रकारिता” ही शोषित, वंचित और प्रताड़ित जनता की असली आवाज़ बन सकती है—न कि वह पत्रकारिता जो धनबल और सत्ता-पोषित एजेंडा पर चलकर “जिसका दाना, उसका गाना” गाती फिरती है।

अखिलेश यादव ने उन मुद्दों की लंबी सूची भी पेश की जिन्हें वह “सरेआम, सबकी आँखों के सामने होने वाले अन्याय” बताते हैं, लेकिन जिन पर मुख्यधारा का मीडिया चुप है या बहुत सीमित रूप में बोलता है। उन्होंने खुले तौर पर कहा कि देश में फ़र्ज़ी मुठभेड़ें और फ़ेक एनकाउंटर, बुलडोज़र की नाइंसाफ़ी, ज़मीनों पर क़ब्ज़े, अवैध खनन और वन कटाई जैसी घटनाएँ कोई रहस्य नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हकीकत हैं, फिर भी इन पर निर्णायक पत्रकारिता कम दिखाई देती है। यादव ने कहा कि भ्रष्टाचार हर स्तर पर फैल चुका है—चाहे वह फ़ाइल चलाने का कमीशन हो, निवेश मंजूरी के नाम पर वसूली हो, थानों में लाखों की दैनिक कमाई हो या हिरासत में मौतें। उनका आरोप है कि सत्ता संरचना झूठे दावों और बेशर्म प्रचार से अपनी असफलताओं को ढक रही है और मीडिया का एक वर्ग इस ढकोसले को बढ़ाने का काम कर रहा है।

उन्होंने आगे लिखा कि संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने की साज़िश, आरक्षण को खत्म करने की चालबाज़ी, भर्ती व नौकरियों में लगातार बढ़ती धांधली, चुनावी प्रक्रिया में मनमानी, पैसे बांटकर चुनाव लड़ने का चलन—ये सब विषय जनता की आँखों के सामने हो रहे हैं, मगर कई पत्रकार इन पर बोलने से डरते हैं या बोलना नहीं चाहते। अखिलेश यादव ने कहा कि खुली साम्प्रदायिक भाषणबाज़ी और पीडीए (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) वर्गों पर लगातार बढ़ते अत्याचारों पर भी सच्चाई से बात करने की ज़रूरत है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यदि पत्रकारिता इन मुद्दों पर चुप रहती है, तो लोकतंत्र की रीढ़ टूट जाएगी क्योंकि सत्ता का भय और भ्रष्टाचार सच्चाई को निगल जाएगा। अखिलेश ने अंत में कहा कि अब वक्त है कि पत्रकार तय करें—वे जनता की आवाज़ बनेंगे या सत्ता के दरबार का हिस्सा।

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