राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली: चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि आज के समय में ‘रील मेकर’ और स्वतंत्र पत्रकार के बीच अंतर करना मुश्किल है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह टिप्पणी उन आरोपों के संदर्भ में की, जिनमें SIR विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा कथित यौन उत्पीड़न किए जाने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को इन मामलों पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने करीब 32 याचिकाएं थीं। इन याचिकाओं में पुलिस की कथित ज्यादतियों, SIR की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों से जुड़े विभिन्न मुद्दे उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार और प्रदर्शन के दौरान उनके अधिकारों का सवाल भी चर्चा के केंद्र में रहा।
महिला पत्रकारों के आरोपों पर केंद्र का पक्ष
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोपों पर केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कहा कि यह पहचानना कठिन है कि कौन रील बनाने वाला व्यक्ति है और कौन स्वतंत्र पत्रकार है।
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद समाचार जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। आज कई पत्रकार मोबाइल फोन और छोटे कैमरों की मदद से घटनास्थल पर रिपोर्टिंग करते हैं। वहीं, सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने वाले लोग भी घटनाओं को रिकॉर्ड करके साझा करते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति की भूमिका और उसकी पत्रकारिता की प्रकृति को लेकर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, केवल वीडियो बनाने या सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने के आधार पर किसी व्यक्ति की वास्तविक भूमिका का अंतिम निर्धारण नहीं किया जा सकता।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से यह टिप्पणी महिला पत्रकारों के साथ पुलिसकर्मियों के कथित व्यवहार के संदर्भ में की गई। लेकिन इस बयान के विस्तृत संदर्भ, सरकार की ओर से प्रस्तुत अन्य दलीलों और इस विशेष मुद्दे पर अदालत की अंतिम टिप्पणी की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
करीब 32 याचिकाओं पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में जिन याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उनका दायरा केवल पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार तक सीमित नहीं है। इनमें SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग से संबंधित विवाद और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
SIR को लेकर राजनीतिक दलों और अन्य पक्षों की ओर से विभिन्न आपत्तियां सामने आई हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम, उनकी पात्रता और सूची की शुद्धता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। वहीं, इस प्रक्रिया के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका और प्रदर्शनकारियों के साथ उसके व्यवहार पर भी सवाल उठे हैं।
इन सभी मामलों में अदालत के सामने अलग-अलग याचिकाओं और आरोपों पर विचार किया जा रहा है। किसी आरोप का उल्लेख होना अपने आप में उसके साबित हो जाने के बराबर नहीं है। संबंधित पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही न्यायिक निष्कर्ष निकाला जाएगा।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जवाबदेही का सवाल
इस सुनवाई में सामने आया बयान पत्रकारिता की पहचान और स्वतंत्र रिपोर्टिंग से जुड़े व्यापक सवाल को भी सामने लाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों का काम घटनाओं की जानकारी जुटाना, सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को सामने लाना और सत्ता तथा संस्थाओं से जुड़े मामलों पर सवाल पूछना है। इसके लिए उन्हें सुरक्षित माहौल और कानून के तहत उपलब्ध संरक्षण मिलना आवश्यक है।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर सामग्री तैयार करने वाले लोगों और पेशेवर पत्रकारों की भूमिकाएं हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। फिर भी, किसी व्यक्ति के पत्रकार होने या न होने का फैसला केवल उसके उपकरण, सोशल मीडिया अकाउंट या वीडियो बनाने के तरीके से करना उचित आधार नहीं होगा। किसी विवाद की स्थिति में घटनास्थल पर उसकी भूमिका, गतिविधियों और उपलब्ध तथ्यों को देखना महत्वपूर्ण होता है।
महिला पत्रकारों के साथ कथित यौन उत्पीड़न के आरोप विशेष रूप से गंभीर हैं। ऐसे मामलों में शिकायतों की निष्पक्ष जांच, संबंधित लोगों की सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच भी तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए।
अब अदालत की सुनवाई पर नजर
सुप्रीम कोर्ट में करीब 32 याचिकाओं पर चल रही सुनवाई का महत्व इस कारण भी है कि इसमें चुनावी प्रक्रिया, विरोध प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों की स्वतंत्रता जैसे विषय एक साथ सामने आए हैं। केंद्र सरकार की ओर से ‘रील मेकर’ और स्वतंत्र पत्रकार के बीच अंतर करने में कठिनाई का बयान इसी व्यापक बहस का हिस्सा है।
आगे की न्यायिक कार्यवाही में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित आरोपों पर पक्षकार क्या दलीलें देते हैं और अदालत किन तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस टिप्पणी को केंद्र सरकार के पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि मामले में किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में। यह मामला पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्र रिपोर्टिंग और कानून के निष्पक्ष पालन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न सामने लाता है।



